और देस के बसत ही, अधिक भजन जो होय।
इहि सम नहिं पूजत तऊ, वृन्दावन रहै सोय।।52।।
अन्य देशों में निवास करते हुए चाहे विशाल भजन होता हो परन्तु
वह वृंदावन में सोते रहने के समान भी नहीं है।
आज के विचार ( प्रीत की यह कैसी नई रीत है.....) !! बृज रस- भाग 3 !! ************************* प्रेम सीधी चाल चलता कहाँ हैं ! ....प्रेम की ...