Friday, June 26, 2026

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आज  के  विचार

( प्रीत  की यह कैसी नई रीत है.....)

!! बृज रस- भाग 3 !!



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प्रेम सीधी चाल चलता कहाँ हैं ! ....प्रेम की नदी सीधी बहती कहाँ है !

प्रेम नगरी में रोना,  हँसनें को कहते हैं........और हँसना यानि रोना ।

प्रेम पन्थ में "ना" यानि "हाँ".....और हाँ का मतलब "ना"  ।

प्रेम कुञ्ज में प्रगाढ़ मिलन यानि विरह, और विरह में मिलन की अनुभूति।

ये लीलाएं चल रही हैं  निकुञ्ज में......निकुञ्ज यानि श्रीधाम वृन्दावन ।

वृन्दावन यानि  'युग्मतत्व" की  विहार स्थली ........जहाँ  सत्य और आनन्द  मिल रहे हैं .........केलि चल रही है ..........

कब से ? 

   ये प्रश्न व्यर्थ है.........सृष्टी कब से ?    इसका हिसाब फिर भी लगाया जा सकता है .........ब्रह्मा विष्णु  शंकर  कब से हैं ?    इसका भी हिसाब शायद कोई लगा ले ........पर  ये  ब्रह्म और आल्हादिनी की यह प्रेम केलि कब से ?....सत्य और आनन्द की ये केलि कब से ? .......इसका कोई पता नही ....अनादि काल से चल ही रही है .........और चलती ही रहेगी ......महाप्रलय कितनें हुए ......ब्रह्मा विष्णु महेश कितनें आये और कितनें गए ......पर   युगल  की ये प्रेम लीला अनवरत चल ही रही है ।

नही नही ....अवतार काल में भी  जब पृथ्वी में   श्रीराधारानी और श्याम सुन्दर  लीला करनें  गये थे ........तब भी ये निकुञ्ज की लीलाएं चल ही रही थीं ......ये   कभी रूकती नही हैं  ।

हाँ हाँ .....एक बात तो  सुनो ......"मिले रहत मानों कबहुँ मिले ना"  ।

दोनों मिले हैं ......मिले ही रहते हैं .....फिर भी प्यास कम नही होती ।

अद्भुत है  ये प्रेम केलि  इन युगल की   ।

छोड़िये  इन गम्भीर  चर्चा को .......चलिये -  ध्यान में बैठते हैं ..........

और चलते हैं  उसी नित्य निकुञ्ज में ......जहाँ  बहुत कुछ चल रहा है ।

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श्रीधाम वृन्दावन प्रेम का एक कमल पुष्प है .......उस कमल में जो पीले पीले केशर हैं .......वो  सखियाँ हैं .......उन केशरों में जो पराग है ....वह  श्री कृष्ण हैं ........और उन पराग  में जो मकरन्द है ......वो  श्रीराधारानी हैं  ।     इस तरह   दिव्य ध्यान कीजिये .........आहा  !

प्रातः होनें में  कुछ ही समय शेष है.........दिव्य श्रीधाम वृन्दावन है ......प्रेम महल में   दोनों युगलवर शयन किये हैं .......

पर ये क्या  !   एकाएक  श्री श्याम सुन्दर   कोई सपना देख - उठे  ।

आँखें उनकी मुदीं हुयी हैं ........पर  जोर से जोर से  पुकार रहे हैं  -

हे श्रीराधे !  हे प्राणेश्वरी ! हे प्रियतमें !   आप कहाँ हो ?   मुझे छोड़ कर आप कहाँ गयीं  ?    मेरे प्राण आप में ही बसते हैं ......ये जानते हुए भी आपनें मुझे कैसे छोड़ दिया.....हिलकियाँ छूट गयीं  श्याम सुन्दर की ।

मेरे प्राण तड़फ़ रहे हैं.......आप  आओ......आप आओ ! 

बैठ गए हैं  श्याम सुन्दर .....उनके कमल नयन से अश्रु गिर रहे हैं.........

पर  जैसे ही  अपनें समीप में  देखा........श्रीजी  तो यहीं हैं ........श्रीराधा रानी को  अपनें पास में देखकर  उनके आनन्द की सीमा नही रही .......अरे !     मन ही मन  हँसे .........अब तक जो दुःख के आँसू बह रहे थे  वे    आनन्दाश्रु  के रूप में फिर बहनें लगे थे........".मैं भी बाबरो है  गयो ...........मेरी प्यारी ....मेरी प्राण बल्लभा  तो यहीं हैं" ।

अपलक देखनें लगे थे........अपनी श्रीराधा रानी को    ।

पर  श्याम सुन्दर के नेत्रों का ताप  अत्यन्त कोमलांगी श्रीराधारानी  कैसे सह लेतीं ......उनकी नींद खुल गयी   ।

अरे ! प्यारे !   आप उठ गए  ?   क्या रात बीत गयी ?     और हे श्याम सुन्दर ! आप  बैठे क्यों हो  ?      फिर आपके नेत्रों से ये अश्रु ? 

 श्रीराधा रानी भी उठकर बैठ जाती हैं .....और बड़े प्रेम से  कज्जल मिश्रित  श्याम सुन्दर के अश्रुओं को अपनें  आँचल से पोंछ देती हैं  ।

हाँ ......रात्रि  तो बीत गयी............बड़ी जल्दी बीत गयी रात्रि !  

श्रीश्याम सुन्दर  श्रीजी  के कपोलों को चूमते हुए बोले थे  ।

मेरी  राधे !    मैनें एक सपना देखा.........बहुत बुरा सपना था ......

मैने सपना देखा -   कि आप मुझ से दूर चली गई हो .......बहुत दूर ......मैं पुकारता हुआ  आपके पीछे जा रहा हूँ ...........पर आप  बस चली जा रही हो .....मेरी और देखती भी नही  हो ..........

इतना कहते हुये फिर  श्याम सुन्दर  अपनी श्रीजी को  हृदय से लगा लेते हैं ........पर  ..........श्रीराधा रानी ये सब सुनकर हँसती हैं .........

आप हँस रही हो  ?   मेरे  हृदय  की धड़कन तो  देखो   !    

श्रीजी का हाथ लेकर  अपनें वक्ष से लगाते हैं  श्याम सुन्दर  ।

पर  आप ऐसा सपना क्यों देखते हो !........आप और हम कोई अलग तो हैं नहीं ........जैसे - जल और तरंग अलग नही हैं ....जैसे - अग्नि और ताप अलग नही है .....जैसे - दूध और उसकी सफेदी अलग नही हैं....ऐसे ही हम दोनों   भी कहाँ अलग हैं  ?  

अच्छा बताओ !    क्या  जल और तरंग को कोई अलग कर सकता है ?

श्रीराधा जी जब पूछती हैं .....तब   श्याम सुन्दर बड़े ही  मासूमियत से अपना सिर  "नही"  में हिलाते हैं  ।

पर मैं आपका मुखचन्द्र बिना देखे  रह नही सकता .........मुझे लगता है ....मैं आपको देखता रहूँ .......बस देखता रहूँ ........पर  हाँ,   एक बात और.......ये जो पलक हैं ना ....यही विघ्न डालते हैं ..........ये  जब गिरते हैं  उस क्षण में मुझे ऐसा लगता है  कि घनें अन्धकार नें मुझे घेर लिया है .......फिर  एकाएक  हिलकियों से श्याम सुन्दर रो पड़े ......मेरी आपसे बस एक प्रार्थना है ...........प्यारी !    ये मुख चन्द्र मेरे नयनों के आगे ही रहे ........बस मुझे यही चाहिये  ।

पर ये क्या !    प्यारे !  ये क्या कर रहे हो आप  ?       

श्रीराधा जी नें  हाथ पकड़ लिया  श्याम सुन्दर का .........

पर  ये तो  रसिक शिरोमणि हैं........ऐसे कहाँ मानते ..........चरण पकड़ लिये   श्री राधा रानी के ............चरणों में टप् टप् टप् आँसू गिरनें लगे  ............हे मेरी प्राण बल्लभा  श्रीराधा !    मेरी एक ही कामना है  कि इन चरणारविन्द का मुझे दास बनाकर  कभी छोड़ना नहीं  ।

इस सेवक को अपना मान कर कभी त्यागना नहीं  ।

इतना सुनते ही  श्रीराधा रानी नें   श्याम सुन्दर को अपनें हृदय से लगा लिया ....और प्रगाढ़ आलिंगन में बांध लिया  ।

"पुलकि प्रिया लियें लाए हिये सों !
ढरकी जुरावनि वदन वदन की, यह छबि नित रहू लागी जिये सों !!
सिचनि सुधा भुजनि की भीचनि, निरखि नगीचनि भाव भिये सों !!
"श्रीहरिप्रिया" पोष परिपागे,  अनुरागे रस दिये लिए सों !! "

शेष "रस चर्चा" कल -
आज  के  विचार

( सुख देना प्रेम है,  सुख माँगना प्रेम नही )

!! बृज रस - भाग - 4  !! 

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साधकों !   "जीवन मिला है  दूसरों को सुख देनें के लिये......सुख लेनें के लिये नही".......बस  इतनी सी बात अगर समझ में आजाये ....तो  ये "रसोपासना"  आपके समझ में आजायेगी  ।

"सखीभाव"  का यही सिद्धान्त है......अपनें प्रियतम को अगर आपनें अपनें सुख का साधन बना लिया है......तो प्रेम आपको प्राप्त नही होगा ........वह प्रेम मोह का रूप ले लेगा.......फिर मोह के दलदल में  ऐसे फंस जाओगे  कि  आये दिन  शिकायत  और दुःख से कराहते ही रहोगे .....जो इस संसार में सर्वत्र देखनें को मिलता ही रहता है  ।

क्यों प्रेम सरोवर में विहार नही करते ?   क्यों मोह के कीचड़ में लथपथ रहते हो ........क्यों भिखारी की भाँति  हाथ फैलाकर अपनें प्रियतम के आगे खड़े रहते हो .......बादशाह क्यों नही बनते ?   मेरी बात मानों,  देनें में मस्त हो जाओ .....सुख बाँटनें में  मस्ती का अनुभव करो ......लेनें के पीछे मत पड़ो ......अपनें प्रियतम के हृदय पात्र में  बस अपनी आत्मीयता का दान करते जाओ ........उन्हें तुमसे सुख मिल रहा है ना ?  इस बात का ध्यान रखो .......स्वयं को सुख  मिले  इस बात को त्याग दो ....यही सच्चा प्रेम है ........नही तो  मोह  को ही  प्रेम समझ बैठोगे  तुम  ।

"रसोपासना"  इसी सिद्धान्त पर चलती है ........सच पूछो तो सखियों का अनुपम प्रेम ही युगल सरकार को तृप्ति देती है .....और युगल सरकार की तृप्ति  और आनन्द ही सखियों का  लक्ष्य है ......यही इन्हें पाना है .........स्वसुख की इच्छा सखियों के मन में उठती ही नही है .....बस ये युगलवर प्रसन्न रहें ..........इसी कामना से ये सब करती हैं  ।

है ना  विलक्षण उपासना ?     केश काटने नही हैं ........वल्कल  पहननें नही हैं ....इत्र फुलेल   सब लगाना है ....वस्त्र सुन्दर लगानें हैं ......क्यों ?   क्यों की युगल   देखें  तो उनके नेत्रों को अच्छा लगे ......ये  सब अपनें लिये नही ......प्रियतम के लिये  ।

उफ़  !   

चलो .......ध्यान में  बैठिये .......आँखें बन्द कीजिये ....और चलिये  उस नित्य निकुञ्ज में .......जहाँ सखियाँ  प्रातः के समय स्नान कर रही हैं .....और ध्यान से सुनिये उनकी प्रेम पूर्ण बातों को ....इन्हीं की बातों में  रसोपासना के गूढ़ सिद्धान्त निहित हैं   ।

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यमुना के जल में सखियाँ स्नान कर रही हैं........अपनें सुन्दर केशों में सुरभित खली लगाती हैं......और मलमल कर उन्हें धोती हैं ......अपनें स्वर्ण के समान चमकते हुये  अंगों में  उबटन मलती हैं .......ताकि देह और चमक उठे......यमुना के सलिल में  मींड़ मींड़ के  अपनें देह को  धोती हैं......."श्रीराधा श्रीराधा श्रीराधा"......का नामोच्चारण करती हुयी जल से बाहर आती हैं ........और  स्वच्छ वसन से  अपनें अंगों को पोंछती हैं ...........श्रीराधारानी की प्रसादी इत्र फुलेल सबके पास है .......उन प्रसादी  इत्र फुलेल को अपनें अंगों में  लगाती हैं ........आहा !  पूरा वातावरण  युगल के प्रसादी इत्र से  सुगन्धित हो उठा है  ।  

"ये नीली साडी मुझे "श्रीजी" नें कल दी थी...........चहकती हुयी श्री रंगदेवी  नें अन्य सखियों को बताया ............रंगदेवी सखी के गौर अंग में वह नीली साडी बहुत  सुन्दर लग रही है ............

आप  नीली साडी ही क्यों पहनती हैं  ?     इन्दुलेखा सखी नें पूछा था ।

क्यों की  मुझे  एक बार श्रीजी नें  कहा .......रंगदेवी !  तुम  नीली साडी में अच्छी लगती हो .....बस  ......मेरी श्रीजी को अच्छी लगे  तो मैं  वही पहनूँगी ..........अच्छा ! इन्दु !  तू मुझे पूछ रही है ......तू बता  तू लाल साडी ही क्यों पहनती है  ?   ये सुनकर   खिलखिलाके हँसी  इन्दुलेखा ।

मुझे तो  युगल सरकार नें ही कहा है ......कि तुम लाल साड़ी  ही पहनों ........अब उन्हें  जो प्रिय है ....वही हमें प्रिय है ...........उनको जो अच्छा लगे वही करना   हमारे लिये   साधना है.........इन्दु नें कहा   ।

मेरा जूड़ा बना दो सुदेवी !       आज बन नही रहा ............ललिता सखी नें कहा ......सुदेवी  नें पीले रँग की साड़ी पहनी है .......पहन ली है  ।

हाँ  अभी बना देती हूँ....जूड़ा बनानें ललिता सखी के निकट आईँ सुदेवी ।

जूड़ा बनाती सुदेवी से पूछा  ललिता सखी नें .....तुम्हे  श्याम सुन्दर ज्यादा प्रिय हैं ....या  श्रीजी  ?      हँसती बहुत है  सुदेवी ललिता सखी का प्रश्न सुनकर.......बोलती कम हैं  और हँसती ज्यादा हैं । 

ये कैसा प्रश्न है आपका ?      श्याम सुन्दर  हमारी प्रिया श्रीराधा रानी को प्रिय हैं ...........तो  हमारी स्वामिनी  को जो प्रिय हों .......वह हमें भी प्रिय हैं  हीं  ।  सुदेवी कम शब्दों में बहुत कुछ बोलती हैं ...........नही ......सुदेवी !   तुम्हे हमनें  "श्याम  श्याम"   कहते हुये ही  सुना है ना  !  इसलिये पूछ रही हैं  ललिता ।    चित्रा सखी नें ये बात कही थी   ।

फिर  जूड़ा बनाते हुए  छोड़कर  हँसनें लगीं   सुदेवी ।

अच्छा !  ज्यादा मत हँसो सुदेवी !  जूड़ा जल्दी बना दो .......नही तो युगल की सेवा में बिलम्ब होजायेगा  । ललिता सखी नें कहा  ।

जूड़ा तो बन गया  ललिता जु ! ....पर एक बात से हँसी आगयी........सुदेवी नें  कहा  ।

 .....अब जल्दी बता भी  दे ..........रँग देवी नें  सुदेवी से कहा ......रंगदेवी की ये छोटी बहन हैं   ।

"श्री जी"  एक दिन कुञ्ज में अकेली अनमनी सी बैठी थीं.........मैं उनके पास थी .......श्याम सुन्दर से कोई बात हो गयी थी शायद ।

उदास सी बैठी थीं ..........मैं उनके चरणों को देख रही थी  लाल लाल रँग के उनके चरण .......और बैठी बैठी उनके चरण चिन्हों को गिन रही थी .........बज्र , अंकुश, ध्वजा , यव,  लता , स्वस्तिक ............तभी मुझे  पता नही क्यों जम्हाई आगयी .......मैने  मुँह में हाथ रखा  और  दूसरी  तरफ मुड़ते,   जम्हाई लेते हुये  मेरे मुँह से निकल गया .......हे श्याम !   

बस ये "श्याम" नाम सुनते ही .......श्रीजी का मुखमण्डल तो खिल गया .....वो प्रसन्नता से चहक उठीं .............और मुझ  से बोलीं ....सुदेवी !  तू   मेरे सामनें यही नाम लिया कर  मुझे प्रसन्नता होती है  ।

अब बताओ .......मैं अपनी प्रसन्नता देखूँ  कि श्रीजी की  ?   

तो मेरे मन नें कहा ......नही ...........श्रीजी की प्रसन्नता में ही हम सब की प्रसन्नता है ...........सुदेवी की बात सुनकर  सब सखियाँ प्रसन्न हो गयीं .........बोलीं ..........तभी तो  हम सब युगल नाम का आश्रय लेती हैं .....क्यों की श्याम सुन्दर को श्रीजी  का नाम प्रिय है ...और श्री जी  को श्याम सुन्दर का .......इसलिये हम  सब युगल  नाम जपती हैं ......

राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे !
राधे श्याम राधे श्याम श्याम  श्याम राधे राधे !! 

सब सखियाँ फिर शुरू हो गयीं ......आहा ! गाती जा रही हैं  और सजती जा रही हैं..........आँखों में अंजन लगाया है .....मोटा अंजन लगाया है ...........फिर भाल में  श्रीजी की प्रसादी  श्याम बिन्दु,   दोनों  भौहों के मध्य में लगाया ....और  रोली का टीका  जो श्याम सुन्दर की प्रसादी है  उसे  अपनें भाल पर लगाया  ।

रोली श्रीजी का  श्याम सुन्दर लगाते हैं .........और श्याम बिन्दु भाल पर  श्रीजी    लगाती हैं .............आहा !  

मणि - आभूषण सखियों नें धारण किये ........मोतियों की लड़ी  अपनें गले  में धारण की ..........ये सब प्रसादी है   युगल की  ।

बस इसके बाद सब ......अपनें कुञ्ज में आईँ ...........कुञ्ज से  सुवर्ण की थाल ली ..........उसमें भाँति भाँति की वस्तुएँ रखीं ......और  चलीं   अब  युगल सरकार को  जगानें..........दिव्य वृन्दावन है .......सखियों को सज धज कर जाते हुए जब देखा  पक्षियों नें......तो सब  कलरव करनें लगे ......मोर नाचनें लगे .....सखियाँ  हँसती हैं  इन सबको देखकर ।

मोहन मन्दिर चौक में ,  मिली सब सखी समाज !
बीन बजावहिं गावहीं,  मधुर मधुर सुर साज !!

शेष "रसचर्चा" कल ......

बृज रस 3

आज  के  विचार

( प्रीत  की यह कैसी नई रीत है.....)

!! बृज रस - भाग 3 !!

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प्रेम सीधी चाल चलता कहाँ हैं ! ....प्रेम की नदी सीधी बहती कहाँ है !

प्रेम नगरी में रोना,  हँसनें को कहते हैं........और हँसना यानि रोना ।

प्रेम पन्थ में "ना" यानि "हाँ".....और हाँ का मतलब "ना"  ।

प्रेम कुञ्ज में प्रगाढ़ मिलन यानि विरह, और विरह में मिलन की अनुभूति।

ये लीलाएं चल रही हैं  निकुञ्ज में......निकुञ्ज यानि श्रीधाम वृन्दावन ।

वृन्दावन यानि  'युग्मतत्व" की  विहार स्थली ........जहाँ  सत्य और आनन्द  मिल रहे हैं .........केलि चल रही है ..........

कब से ? 

   ये प्रश्न व्यर्थ है.........सृष्टी कब से ?    इसका हिसाब फिर भी लगाया जा सकता है .........ब्रह्मा विष्णु  शंकर  कब से हैं ?    इसका भी हिसाब शायद कोई लगा ले ........पर  ये  ब्रह्म और आल्हादिनी की यह प्रेम केलि कब से ?....सत्य और आनन्द की ये केलि कब से ? .......इसका कोई पता नही ....अनादि काल से चल ही रही है .........और चलती ही रहेगी ......महाप्रलय कितनें हुए ......ब्रह्मा विष्णु महेश कितनें आये और कितनें गए ......पर   युगल  की ये प्रेम लीला अनवरत चल ही रही है ।

नही नही ....अवतार काल में भी  जब पृथ्वी में   श्रीराधारानी और श्याम सुन्दर  लीला करनें  गये थे ........तब भी ये निकुञ्ज की लीलाएं चल ही रही थीं ......ये   कभी रूकती नही हैं  ।

हाँ हाँ .....एक बात तो  सुनो ......"मिले रहत मानों कबहुँ मिले ना"  ।

दोनों मिले हैं ......मिले ही रहते हैं .....फिर भी प्यास कम नही होती ।

अद्भुत है  ये प्रेम केलि  इन युगल की   ।

छोड़िये  इन गम्भीर  चर्चा को .......चलिये -  ध्यान में बैठते हैं ..........

और चलते हैं  उसी नित्य निकुञ्ज में ......जहाँ  बहुत कुछ चल रहा है ।

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श्रीधाम वृन्दावन प्रेम का एक कमल पुष्प है .......उस कमल में जो पीले पीले केशर हैं .......वो  सखियाँ हैं .......उन केशरों में जो पराग है ....वह  श्री कृष्ण हैं ........और उन पराग  में जो मकरन्द है ......वो  श्रीराधारानी हैं  ।     इस तरह   दिव्य ध्यान कीजिये .........आहा  !

प्रातः होनें में  कुछ ही समय शेष है.........दिव्य श्रीधाम वृन्दावन है ......प्रेम महल में   दोनों युगलवर शयन किये हैं .......

पर ये क्या  !   एकाएक  श्री श्याम सुन्दर   कोई सपना देख - उठे  ।

आँखें उनकी मुदीं हुयी हैं ........पर  जोर से जोर से  पुकार रहे हैं  -

हे श्रीराधे !  हे प्राणेश्वरी ! हे प्रियतमें !   आप कहाँ हो ?   मुझे छोड़ कर आप कहाँ गयीं  ?    मेरे प्राण आप में ही बसते हैं ......ये जानते हुए भी आपनें मुझे कैसे छोड़ दिया.....हिलकियाँ छूट गयीं  श्याम सुन्दर की ।

मेरे प्राण तड़फ़ रहे हैं.......आप  आओ......आप आओ ! 

बैठ गए हैं  श्याम सुन्दर .....उनके कमल नयन से अश्रु गिर रहे हैं.........

पर  जैसे ही  अपनें समीप में  देखा........श्रीजी  तो यहीं हैं ........श्रीराधा रानी को  अपनें पास में देखकर  उनके आनन्द की सीमा नही रही .......अरे !     मन ही मन  हँसे .........अब तक जो दुःख के आँसू बह रहे थे  वे    आनन्दाश्रु  के रूप में फिर बहनें लगे थे........".मैं भी बाबरो है  गयो ...........मेरी प्यारी ....मेरी प्राण बल्लभा  तो यहीं हैं" ।

अपलक देखनें लगे थे........अपनी श्रीराधा रानी को    ।

पर  श्याम सुन्दर के नेत्रों का ताप  अत्यन्त कोमलांगी श्रीराधारानी  कैसे सह लेतीं ......उनकी नींद खुल गयी   ।

अरे ! प्यारे !   आप उठ गए  ?   क्या रात बीत गयी ?     और हे श्याम सुन्दर ! आप  बैठे क्यों हो  ?      फिर आपके नेत्रों से ये अश्रु ? 

 श्रीराधा रानी भी उठकर बैठ जाती हैं .....और बड़े प्रेम से  कज्जल मिश्रित  श्याम सुन्दर के अश्रुओं को अपनें  आँचल से पोंछ देती हैं  ।

हाँ ......रात्रि  तो बीत गयी............बड़ी जल्दी बीत गयी रात्रि !  

श्रीश्याम सुन्दर  श्रीजी  के कपोलों को चूमते हुए बोले थे  ।

मेरी  राधे !    मैनें एक सपना देखा.........बहुत बुरा सपना था ......

मैने सपना देखा -   कि आप मुझ से दूर चली गई हो .......बहुत दूर ......मैं पुकारता हुआ  आपके पीछे जा रहा हूँ ...........पर आप  बस चली जा रही हो .....मेरी और देखती भी नही  हो ..........

इतना कहते हुये फिर  श्याम सुन्दर  अपनी श्रीजी को  हृदय से लगा लेते हैं ........पर  ..........श्रीराधा रानी ये सब सुनकर हँसती हैं .........

आप हँस रही हो  ?   मेरे  हृदय  की धड़कन तो  देखो   !    

श्रीजी का हाथ लेकर  अपनें वक्ष से लगाते हैं  श्याम सुन्दर  ।

पर  आप ऐसा सपना क्यों देखते हो !........आप और हम कोई अलग तो हैं नहीं ........जैसे - जल और तरंग अलग नही हैं ....जैसे - अग्नि और ताप अलग नही है .....जैसे - दूध और उसकी सफेदी अलग नही हैं....ऐसे ही हम दोनों   भी कहाँ अलग हैं  ?  

अच्छा बताओ !    क्या  जल और तरंग को कोई अलग कर सकता है ?

श्रीराधा जी जब पूछती हैं .....तब   श्याम सुन्दर बड़े ही  मासूमियत से अपना सिर  "नही"  में हिलाते हैं  ।

पर मैं आपका मुखचन्द्र बिना देखे  रह नही सकता .........मुझे लगता है ....मैं आपको देखता रहूँ .......बस देखता रहूँ ........पर  हाँ,   एक बात और.......ये जो पलक हैं ना ....यही विघ्न डालते हैं ..........ये  जब गिरते हैं  उस क्षण में मुझे ऐसा लगता है  कि घनें अन्धकार नें मुझे घेर लिया है .......फिर  एकाएक  हिलकियों से श्याम सुन्दर रो पड़े ......मेरी आपसे बस एक प्रार्थना है ...........प्यारी !    ये मुख चन्द्र मेरे नयनों के आगे ही रहे ........बस मुझे यही चाहिये  ।

पर ये क्या !    प्यारे !  ये क्या कर रहे हो आप  ?       

श्रीराधा जी नें  हाथ पकड़ लिया  श्याम सुन्दर का .........

पर  ये तो  रसिक शिरोमणि हैं........ऐसे कहाँ मानते ..........चरण पकड़ लिये   श्री राधा रानी के ............चरणों में टप् टप् टप् आँसू गिरनें लगे  ............हे मेरी प्राण बल्लभा  श्रीराधा !    मेरी एक ही कामना है  कि इन चरणारविन्द का मुझे दास बनाकर  कभी छोड़ना नहीं  ।

इस सेवक को अपना मान कर कभी त्यागना नहीं  ।

इतना सुनते ही  श्रीराधा रानी नें   श्याम सुन्दर को अपनें हृदय से लगा लिया ....और प्रगाढ़ आलिंगन में बांध लिया  ।

"पुलकि प्रिया लियें लाए हिये सों !
ढरकी जुरावनि वदन वदन की, यह छबि नित रहू लागी जिये सों !!
सिचनि सुधा भुजनि की भीचनि, निरखि नगीचनि भाव भिये सों !!
"श्रीहरिप्रिया" पोष परिपागे,  अनुरागे रस दिये लिए सों !! "

शेष " बृज रस चर्चा" कल -

बृज रस 2

आज  के  विचार

( सखी ! ये रस की बातें हैं.. )

!! बृज रस- भाग 2 !! 

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यह प्रेम को पन्थ है.....रस को मारग  कठोर है ....तलवार की धारन में चलनो है ...शीश काट के गेंद खेलनो है......उफ़ ! 

तो क्या समझ लिया था   इस रसोपासना को ......कि  इस मार्ग में चलके  तुम्हारे "शनि राहू केतु" ठीक हो जायेंगें .......अजी !    राहू केतु ?  यहाँ तो भगवान भूत भावन शंकर को भी तभी प्रवेश मिलता है ......जब वो  गोपी बनकर आते हैं....और उनको  भी मात्र दर्शन ही  मिलते  हैं  ।

इसलिये  यह रसोपासना अगर समझ में नही आये ......तो कोई बात नही ......छोड़ दो  इसे .........क्यों की इस मार्ग में चलनें के लिये कलेजा चाहिये ........दूसरों को मारना सरल है .....पर स्वयं के अहंकार की बलि चढ़ाना  बहुत बड़ा काम है ........इस मार्ग में यही करना पड़ता है ।

तभी तो कहा .........प्रातः काल उठकर ध्यान में बैठो ......पर  सावधान !  ध्यान में बैठनें से पहले  "सखी भाव" से भावित हो जाओ ।

बताइये ! ..........जीवन भर  हम पुरुष ....हम  ब्राह्मण बनिया.......हम  विद्वान्....सोचते रहे ....कहते रहे......पर ये रसोपासना कहती है कि  ......नही ....ये सब मिथ्या है ......ब्रह्म  तुम्हारा प्रियतम है .....और तुम उनकी सखी हो .....बस  ।

(  साधकों !  सखी भाव का मतलब  अहंकार विसर्जित , पूर्ण समर्पण ...कोई  नारी भेष भूषा से इसका सम्बन्ध नही है )

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चलिये ध्यान कीजिये  -

प्रातः 5 बजे  हैं ........सबसे पहले श्रीरंगदेवी सखी उठती हैं.......

अपनी केशराशि को सम्भालती हैं ......बाँधती हैं .........

फिर  बड़े प्रेम से  "श्रीराधा श्रीराधा श्रीराधा"   नामोच्चारण करती हैं ।

जम्हाई लेती हुयी ........इधर उधर देखती हैं ............उनके देह से चन्दन की सुगन्ध आरही है .............युगल सरकार के प्रसादी इत्र फुलेल को अपनें देह में लगाकर ये सब सोती हैं.........इसलिए  .वातावरण  सुगन्धित हो रहा है 

सखियों !   उठो .......युगल सरकार को जगाना  भी है ...........देखो !  इस प्रकार सो कर  क्यों समय को खराब कर रही हो ........चलो !  कितना सुन्दर श्रीधाम वृन्दावन है .......देखो !   यमुना रसरानी  बड़ी ही प्रफुल्लता से बह रही हैं.........चलो स्नान करनें  ।

    श्रीरंगदेवी सखी नें  अन्य सखियों को उठाया  ।

सब सखियाँ उठ गयीं ..........और वह सखियों का कुञ्ज  "श्रीराधा नाम के उच्चारण  से  गूँज उठा ........पक्षियों नें कलरव करना शुरू किया ही था कि.......चुप !  कोयली !   तू बहुत बोलती है .....चुप !   युगल सरकार शयन कर रहे हैं........उनके नींद में विघ्न मत डाल .........और तू क्यों उठती है इतनी जल्दी ?   हमें  तो स्नान करना है ......फिर अपना श्रृंगार करना है .........तुझे न स्नान करना है  न  सजना है ।

 श्रीललिता सखी  ये कहते हुए हँसी ........तो सारी सखियाँ हँस पडीं ।

कोयली चुप हो गयी  ।

सब कुञ्जों से निकलीं.......अष्ट सखियाँ क्या निकलीं  .....प्रत्येक की अष्ट अष्ट सखियाँ भी अपनें अपनें कुञ्जों से  प्रकट होनें लगीं  ।

कहीं बिलम्ब न हो जाए ...........और हम से पहले युगल सरकार अगर जाग गए तो  ?       श्री रंगदेवी नें  श्री ललिता सखी से कहा ।

नही जागेगें.........चलो !  फिर भी मन में  सन्देह है  तो देख लो  ......निकुञ्ज का परदा हटा कर देख लें ?.....श्रीइन्दुलेखा नें पूछा  ।

और जैसे ही झीना परदा हटाया.........बड़ी गहरी नींद में सो रहे हैं "युगलवर" .........तुरन्त परदा लगा दिया ..........ताकि  बाहर के कलरव से ये युगलवर  जग न जाएँ ।

सखी ! चलो ....जल्दी चलो   और स्नान करके  आती हैं हम सब ।

सखियाँ  चलीं.........प्रातः की वेला है ..........श्रीधाम वृन्दावन की शोभा अलग ही दीख रही है ..........वृक्ष हैं  घनें ......मोरछली के ....तमाल के .....कदम्ब के ।.....शरद ऋतू है  इस समय ।

वैसे  श्रीधामवृन्दावन  में दो ही ऋतू रहती हैं.......एक वसन्त और दुसरा शरद ......... अन्य ऋतुएँ का आना जाना  सखियों की इच्छाओं  पर निर्भर करता है ....ये जिस ऋतू की कामना करें  श्रीधाम वृन्दावन उसी ऋतू को प्रकट कर देती है ..... श्री वृन्दावन भी  "वृन्दा सखी" के रूप में ही यहाँ  युगल सरकार की सेवा में रत हैं ।

नाना प्रकार के कुञ्ज हैं  इस श्रीधाम में.........कमल खिले हैं  छोटे छोटे सरोवरों  में ......कदली के कुञ्ज  है .......कमल कुञ्ज है ........यमुना जी का दर्शन होता है ........दिव्य निर्मल यमुना हैं ...........यमुना की बालुका ऐसी है  जैसे  कपूर और मोती को पीस कर किसी नें बिखेर दिया हो ।

लता पत्रों में  "श्रीराधा श्रीराधा" अंकित है ......और  वो सब दूर से ही चमक रहे हैं.........यमुना  गोलाकार हैं .......जैसे कंकण  के आकार की तरह ....मानों यमुना  जी  श्रीधाम वृन्दावन की परिक्रमा कर रही हों ।

मधुर  स्वर से  सब सखियाँ .....युगल नाम का गान करती हुयी चल रही हैं.........उनके मधुर स्वर से पूरा विपिन राज गुँजित हो रहा है   ।

राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे !
राधे श्याम राधे श्याम श्याम श्याम राधे राधे !!

अब ज्यादा देरी मत करो......हम सब को श्रृंगार भी तो करना है ।

श्री रंगदेवी सखी नें सब सखियों को सावधान किया ........क्यों की सब युगलनाम संकीर्तन करते हुए  अपनें देह भान को भूल गयीं थीं ।

सखियों !   सेवा में ये भी अपराध है .............स्वयं को आनन्द आरहा है कहकर  हम  युगल की सेवा  में  प्रमाद नही कर सकतीं .........हमें अपनें सुख की ओर तो ध्यान देना ही नही है .........युगल कैसे प्रसन्न हों .....बस .........."हमें तो  सुख देना है ........हमें सुख लेना नही हैं" ।

इतना कहते हुए  श्रीरंगदेवी सखी सर्वप्रथम  यमुना में उतरीं  ।

यहाँ कुछ जड़ नही हैं  सब कुछ चैतन्य हैं.........जितनी गहराई यमुना की चाहिये  स्नान के लिये सखियों को .....उतनी ही  गहरी यमुना हो जाती हैं.....सब  स्नान कर रही हैं ....यमुना का जल शीतल है ......सब सखियाँ  हृदय में युगल सरकार का ध्यान करती हुयीं  स्नान कर रही हैं .......

और गा रही हैं ..........बड़े प्रेम से गा रही हैं  .........

जय जय  वृन्दावन रजधानी !!

जहाँ विराजत मोहन राजा , श्रीराधा सी रानी !! 
सदा सनातन इक रस जोरी, महिमा निगम न जानीं !! 
श्रीहरिप्रिया हितू निज दासी,  रहति सदा अगवानी !!

यमुना की तरंगें भी नाच रही हैं......सखियों का गान सुनकर ।

शेष "रसचर्चा" कल ...

braj ras बृज रस 1

आज  के  विचार

( चलहुँ चलहुँ  चलिये निज देश....)

!! बृज रस - भाग 1 !! 


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प्रियतम तो सच्चे  "वही" हैं.......उन्हीं  प्रियतम की लगन में जो "खुदी" को जला दे ......वह सखी धन्य है ।

चलिये !    अपनें देश चलिये ......ये देश अपना नही है .....ये तो किसी का नही है ......अरे !  ये  है ही नही  ...ये तो भ्रम मात्र  है   ।

वो देश .......जहाँ प्रेम ही प्रेम है .......वह देश ......जहाँ   प्रेम के नरेश  श्रीश्यामसुन्दर और महारानी श्रीराधारानी विराजमान हैं ।

वह देश ......जहाँ  स्वसुख वान्छा  की  दूर दूर  तक गन्ध भी नही है ।

वह देश ....जो अपना है.......जहाँ सब अपनें हैं ।

वह देश .........जहाँ प्रेम की नदी सदा बहती रहती  है    ।

"प्रेम"   आहा !  कितना सुन्दर शब्द है.....मिश्री सी घुल जाती है ।

अनिर्वचनीय तत्व है ये......सच में  इसे पानें के बाद  कुछ और पानें की कामना ही नही रहती........ये मन बड़ा  लालची है ........पर प्रेम  में इतनी ताकत है कि  इस लालची मन को पूर्ण तृप्त करके ही ये दम लेता है ।

चलिये .......छोड़िये  इस देश को....कुछ नही रखा यहाँ ........उस देश में चलिये  जहाँ  रस ही रस है .......रस का  सिन्धु  उमड़ घुमड़ रहा  है.... ..रस के ही  घन  श्रीश्याम और श्रीराधा   जहाँ  छाई हुयी हैं.........सब कुछ जहाँ  रस है .........रस ही आकार लेकर लीला कर  रहा है ।

रस ही  सखियाँ ....रस ही   वन ....रस ही वृक्ष ....रस ही यमुना  ।

रस ही नाना रूपों में  दिखाई देता है यहाँ ......रस ही ....एक गौर और श्याम बन विराजमान है  ।

पर  ये दो नही ....एक हैं ........जैसे  जल और तरंग  ।

अब अगर व्याख्या करनी हो ....तो जल की   व्याख्या अलग होगी और  तंरग की अलग .......पर  क्या  जल और तंरग दो हैं  ? 

छोडो ......इस सब  गहरे  सिद्धान्त को .........तुम तो चलो  ।

जहाँ की पृथ्वी .........दिव्य सुवर्ण मय है ........मणि मण्डित के   जहाँ  दिव्य दिव्य   खम्भे लगे हैं .......हवा चलती है  तो  वहाँ की रज  कपूर की तरह उड़ती है.......यमुना  कंकण के आकार की हैं ........मध्य में  दिव्य  श्री वृन्दावन है ..........इसी को नित्य निकुञ्ज कहते हैं  ।

सब कुछ प्रेमपूर्ण है यहाँ .................

अकारण,  एकरस , अनुराग ही प्रमाणिक प्रेम कहलाता है ।

उस देश में  स्वाभाविक प्रेम है ........स्वार्थ रहित प्रेम है ......निश्चल प्रेम है ........वहाँ   सर्वत्र प्रेम ही प्रेम है   ।

चलिये  उस  देश में............प्रेम के देश में   ।

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आँखें बन्द कीजिये !

........दिव्य श्रीधाम वृन्दावन  है  ।

मणि माणिक्य से खचित भूमि है  यहाँ की............प्रणाम कीजिये  और  बड़े प्रेम से   बोलिये  -  श्री वृन्दावन  !      मन ही मन बोलिये  ।

नही नही ,    ऐसे कैसे प्रवेश मिलेगा  उस दिव्य श्रीधाम में  ।

वहाँ की नित्य सखियों  की पहले कृपा  आवश्यक है...........उनके बिना  आपका प्रवेश नही हो पायेगा ........वन्दन कीजिये  पहले सखियों को ।

युगल सरकार की अष्ट सखियाँ हैं........चलिये ध्यान करते हैं ।

सबसे पहले  -  "श्रीरंगदेवी जु" ..........इनकी कृपा प्राप्त हो ......इनके चरणों में प्रणाम कीजिये.........इनका  रँग गोरा  है .........ये  बहुत सुन्दर है ........नीली  साडी पहनती हैं ये .........ये  "श्रीजी" के  पक्ष की हैं ...........ये वीणा बहुत सुन्दर बजाती हैं   ...इनके साथ    इनकी भी   अष्ट सखियाँ हैं ........जो इनकी सेवा में रहती हैं .........इन सबको प्रणाम कीजिये ...........इनके चरण  रज को माथे से लगाइये  ।

अब दूसरी सखी हैं ......"श्री सुदेवी जु"........ये श्याम सुन्दर के पक्ष की हैं .......इनका रँग कुछ साँवला सा है ........ये  मृदंग बजानें में निपुण हैं ...........पीली रँग की ये साडी पहनती हैं.......इनके साथ भी इनकी अष्ट सखियाँ हैं  जो इनकी सेवा में रहती हैं  ......इनको भी प्रणाम कीजिये ।

तीसरी सखी हैं......"श्रीललिता जु" ........  दिव्य गोरोचन की तरह कांति हैं इनके मुखमण्डल में .........ये श्रीजी की निज सखी हैं ..........ये बड़े प्रेम से बाँसुरी वादन करती हैं ......और  प्रिया जु को रिझाती हैं  ।

इनकी भी अष्ट सखियाँ हैं.........जो इनकी सेवा में रहती हैं .......इन सब को प्रणाम कीजिये ।

चौथी सखी हैं ...  "श्रीविशाखा जु" .......ये  युगल सरकार के मन की बात को तुरन्त समझ जाती हैं.....विद्युत की तरह इनकी अंग कांति है ।

मृदंग ये बड़ा सुन्दर बजाती हैं......ये  श्यामसुन्दर की प्रिय सखी हैं ।

इनकी भी अष्ट सखियाँ हैं.....सबको प्रणाम कीजिये  ।

पांचवीं सखी हैं -  "श्रीचम्पकलता जु"....... आकाश की तरह  इनका रँग है ........ये  अत्यन्त सुन्दरी और शान्त सखी हैं ......विशेष इन्हें आनन्द आता है   युगल सरकार को चँवर ढुरानें में  ।

ये सारंगी बजाती हैं........श्रीजी को इनकी सारंगी बहुत प्रिय है  ।

इनकी भी अष्ट सखियाँ हैं .......इन्हें भी प्रणाम कीजिये   ।

छटी सखी हैं -   "श्रीचित्रा जु"....इनकी अंग कांति है ...केशर की तरह ।

ये सितार बजाती हैं........और चित्र बहुत सुन्दर काढती हैं  ।

इनकी भी अष्ट सखियाँ हैं  ......प्रेम से वन्दन कीजिये इन्हें ।

सातवीं सखी हैं  -   "श्रीतुंगविद्या जु".......इनका रँग श्रीजी की तरह ही है.......पीला परिधान पहनती हैं ये ........ये गाती बहुत मधुर हैं ।

अष्ट सखियाँ इनकी भी सेवा में निरन्तर लगी रहती हैं .......इनको प्रणाम कीजिये  ।

और आठवीं सखी हैं  -  "श्रीइन्दुलेखा जु"......इनको प्रिया प्रियतम दोनों का प्रेम प्राप्त है .......गौर वर्णी हैं ये.........मंजीरा बजाती हैं ......लाल रँग की साड़ी इन्हें प्रिय है .....क्यों की "श्रीजी" नें इन्हें एक बार कहा था  कि  लाल रँग का परिधान इन्दु !  तुम्हे सुन्दर लगता है .....बस उसी दिन से ये  लाल परिधान ही पहननें लग गयीं  ।

साधकों !     ये सखियाँ वेद की ऋचाएं हैं ....ये सखियाँ  चिद् शक्ति हैं ......चिदाम्बा शक्ति  ही ये सखियाँ ,  भिन्न भिन्न रूपों में  ब्रह्म और आल्हादिनी की सेवा में उपस्थित हैं .........इसलिये इनको प्रणाम करना आवश्यक है ........तभी इस दिव्य निकुञ्ज में प्रवेश आपको मिलेगा  ।

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सखी भाव  धारण कीजिये  ।

ये बहुत ऊँची वस्तु है .......सखी भाव  ।

वेदो  नें स्पष्ट कह दिया है ..........ब्रह्म ही एक मात्र पुरुष है ।

बाकी सब  उस "ब्रह्म पुरुष" की नारीयाँ हैं.....रसोपासना हमें बताती हैं कि  सखी भाव के बिना  उस प्रेम नगरी में  हमारा प्रवेश सम्भव नही है ।

अहंकार पुरुष है .....और समर्पण सखी..........सब कुछ  हमारे  प्रिया प्रियतम  जु हैं.........ये भाव..........हाँ  ये भाव  ही हमें  उस निकुञ्ज का अधिकारी बनाता है........क्यों की उस  "प्रेम देश"  में अहंकार का प्रवेश   वर्जित है  ।

ये अद्भुत रहस्यवाद है ..........इसको कृपा करके   बुद्धि का विषय मत बनाइये ..........आप का निज रूप सखी है ............यही सच्चाई है ......आपका निज देश  श्री वृन्दावन धाम है ......सनातन श्रीवृन्दावन .....नित्य श्री वृन्दावन ............जहाँ प्रेम नदी निरन्तर बह रही है .....हमें वहीं  जाना है ........क्यों की हम मूल वहीं के निवासी हैं  ।

सखी भाव धारण करके ध्यान कीजिये   ।

श्री वृन्दावन का ........प्रातः  के  श्रीधाम वृन्दावन  का  ।

शेष   "रस चर्चा"  कल .......

Monday, February 23, 2026

प्रेम की ओढ़नी: एक कथा भागवत

❤️ प्रेम की ओढ़नी: भक्त और भगवान के अटूट बंधन की कथा! ❤️

वृंदावन की पावन भूमि के समीप, यमुना किनारे बसे एक छोटे से गाँव में एक भोली-भाली ग्वालिन रहती थी, जिसे सब प्यार से ‘माई पंजीरी’ कहते थे। पंजीरी का जीवन अत्यंत सादा था, न कोई अपना था, न पराया। बस एक ही सहारा था—उसके ठाकुर मदनमोहन जी।
दूध बेचना ही उसकी जीविका थी, लेकिन उसका असली जीवन तो मंदिर की चौखट पर शुरू होता था।

नित्य नियम और विवशता:

माई का एक अटूट नियम था। वह प्रतिदिन सबसे पहले अपनी गैया का दूध दुहती और उसे मदनमोहन जी के लिए लेकर जाती। प्रभु भी अपनी इस भक्त से इतना प्रेम करते थे कि अक्सर उसके स्वप्न में आते और कभी माखन, कभी रबड़ी तो कभी गर्म दूध की मनुहार करते। पंजीरी भी उसी दिन वही बनाकर लाला को भोग लगाती।
किंतु, गरीबी का दुःख बड़ा निष्ठुर होता है।

मदनमोहन जी को दूध चढ़ाने के बाद जो बचता, उसे बेचकर पंजीरी का गुजारा मुश्किल से होता था। दो वक्त की रोटी भी नसीब न होती। विवश होकर, कभी-कभी मंदिर जाते समय वह यमुना जी के पावन जल की कुछ बूँदें दूध में मिला देती। मन ही मन कहती— "हे यमुना मैया, तू भी तो कृष्ण की पटरानी है, तेरे जल का दोष कैसा?"

फिर घर लौटकर वह अपने बाल-गोपाल के भजन-कीर्तन में ऐसी रमती कि उसे अपनी गरीबी और भूख का भी भान न रहता।

विपदा की घड़ी:

कहते हैं, ठाकुर जी अपने भक्तों की परीक्षा भी लेते हैं और लीला भी करते हैं।

एक दिन अनहोनी हो गई। यमुना जल मिलाते समय, अनजाने में एक नन्हीं सी मछली लोटे में आ गई। पंजीरी अपनी धुन में मगन मंदिर पहुंची और जैसे ही गर्भगृह में दूध उंड़ेलने लगी, वह मछली मदनमोहन जी के चरणों में जा गिरी।

यह दृश्य मंदिर के मुख्य गुसाईं (पुजारी) ने देख लिया।

उनका क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच गया। वे गरज उठे, "अरी पगली! यह क्या अनर्थ कर दिया? तूने मंदिर अपवित्र कर दिया। निकल जा यहाँ से!"

गुसाईं ने न केवल दूध वापस किया बल्कि पंजीरी को खूब खरी-खोटी सुनाई और मंदिर में उसके प्रवेश पर ही प्रतिबंध लगा दिया।

भक्त का हठ:

पंजीरी पर तो जैसे वज्रपात हो गया। वह रोती-बिलखती अपनी कुटिया में पहुँची। आज उसे गुसाईं की डांट का दुख नहीं था, दुख इस बात का था कि उसके कन्हैया ने आज दूध नहीं पिया।

उसने घर के कोने में रखे ठाकुर जी के चित्र के सामने बैठकर उलाहना देना शुरू किया:

> "ठाकुर! मुझसे अपराध हुआ, मैं मानती हूँ। पर पानी तो मैं रोज मिलाती हूँ, तुमसे क्या छिपा है? अगर जल न मिलाऊँ तो पेट कैसे पालूँ? और उस बेचारी मछली का क्या दोष? वह तो तेरे चरणों में ही आई थी।

> पर आज मुझे सबसे ज्यादा दुख इस बात का है कि गुसाईं मुझे अपमानित करता रहा और तू चुपचाप देखता रहा? जा, अगर तू मेरा चढ़ाया दूध नहीं पिएगा, तो मैं भी अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगी। यहीं तेरे वियोग में प्राण त्याग दूँगी।"
शाम ढल गई, रात गहराने लगी। पंजीरी भूखी-प्यासी, रोते-रोते निढाल हो गई।

छलिया का आगमन:

मध्यरात्रि का समय था। तभी कुटिया के बाहर से एक मधुर और कोमल स्वर सुनाई दिया— "माई... ओ माई!"

पंजीरी ने चौंककर दरवाजा खोला। सामने एक अत्यंत सुंदर, सलोना सा किशोर खड़ा था। शरीर पर धूल लगी थी, चेहरा थका हुआ सा था, पर आँखों में ऐसी चमक थी कि अँधेरी रात भी रोशन हो जाए।
 * पंजीरी: "कौन हो बेटा? इतनी रात गए यहाँ कैसे?"

 * बालक: "मैया, मैं ब्रजवासी हूँ। मदनमोहन के दर्शन करने आया था, पर मंदिर के पट बंद हो गए। बड़ी जोर की भूख लगी है, कुछ खाने को दे दे तो तेरा बड़ा उपकार होगा।"

बालक की आवाज़ में ऐसा जादू था कि पंजीरी का सारा दुख पल भर में ममता में बदल गया।

 * पंजीरी: "अरे लला! यह घर तेरा ही है। तू इतनी दूर से थका-हारा आया है, अभी तेरे लिए रोटियां सेक देती हूँ।"

 * बालक: "नहीं मैया! रसोई मत बना, बहुत समय लगेगा। मुझे तो बस थोड़ा सा दूध दे दे, वही पीकर सो जाऊँगा।"

दूध का नाम सुनते ही पंजीरी की आँखों में फिर आँसू आ गए।
 
* पंजीरी (हिचकिचाते हुए): "बेटा, दूध तो है... पर सवेरे का है। 
और... और उसमें थोड़ा पानी भी मिला है। तू बैठ, मैं गैया को सहलाकर ताज़ा दूध दुह लाती हूँ।"

 * बालक (मचलते हुए): "अरे नहीं मैया! अब नहीं रहा जाता। दूध का नाम लेकर तूने मुझे और अधीर कर दिया। तू वही सवेरे वाला दूध दे दे। अगर तूने अभी दूध नहीं दिया तो मेरे प्राण निकल जायेंगे।"
पंजीरी हैरान थी। यह कैसा बालक है जो पानी मिले बासी दूध के लिए इतना मचल रहा है? उसने हार मानकर वही लोटा भर दूध बालक को दे दिया।

बालक ने एक ही सांस में दूध पिया और तृप्ति की डकार ली।
"वाह मैया! ऐसा अमृत जैसा दूध तो मैंने आज तक नहीं पिया। तू तो व्यर्थ ही बहाने बना रही थी। अब मेरा पेट भर गया, मुझे नींद आ रही है।"

इतना कहकर वह बालक वहीं कुटिया के कोने में सिमट कर सो गया।

प्रेम की ओढ़नी:

पंजीरी ने देखा कि बालक ठिठुर रहा है। जाड़े की रात थी। माई के पास ओढ़ने को कुछ खास न था, बस एक फटी-पुरानी ओढ़नी थी जिसे वह खुद ओढ़ती थी। ममता के वशीभूत होकर उसने वह ओढ़नी बालक को ओढ़ा दी और खुद एक कोने में बैठकर प्रभु का स्मरण करने लगी।

भूखे पेट और थकान के कारण उसकी आँख लग गई।

स्वप्न में उसने देखा कि स्वयं ठाकुर मदनमोहन जी उसके सामने खड़े हैं। वे मुस्कुराते हुए बोले:

> "मैया! तू मुझे भूखा मारेगी क्या? गुसाईं की बातों का बुरा मानकर तूने खुद भी कुछ नहीं खाया? देख, मैं तो तेरा दूध पीकर तृप्त हो गया। और सुन, तू दूध में पानी मिलाती है तो क्या हुआ? अच्छा है, पतला दूध जल्दी हजम हो जाता है! अब उठ और भोजन कर, तेरे भूखे रहने से मुझे पीड़ा होती है।"
पंजीरी हड़बड़ा कर जागी।
"लला... ओ लला!" उसने आवाज दी, लेकिन कुटिया में कोई नहीं था। वह बालक गायब था।

पंजीरी का रोम-रोम पुलकित हो गया। उसे समझते देर न लगी कि वह कोई साधारण बालक नहीं, स्वयं उसका छलिया कन्हैया था।
उसने खुशी-खुशी उठकर भोजन बनाया और ठाकुर जी को भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण किया।

लीला का रहस्य:

सुबह हुई तो पंजीरी ने देखा कि जिस जगह वह बालक लेटा था, वहां उसकी फटी हुई ओढ़नी नहीं थी, बल्कि सोने के तारों से जड़ा हुआ रेशमी पीतांबर रखा था। ठाकुर जी अपनी निशानी छोड़ गए थे और भक्त की फटी गुदड़ी ले गए थे।

उधर, मंदिर में जैसे ही गुसाईं जी ने पट खोले, उनके होश उड़ गए।
सिंहासन पर विराजमान मदनमोहन लाल जी ने अपना कीमती पीतांबर नहीं, बल्कि एक फटी-पुरानी मैली सी ओढ़नी ओढ़ रखी थी। प्रभु के चेहरे पर ऐसी मंद मुस्कान थी जैसे संसार का सबसे बड़ा सुख उन्हें इसी गुदड़ी में मिल रहा हो।

गुसाईं जी अभी इस रहस्य को सुलझा ही रहे थे कि पंजीरी हाथ में पीतांबर लिए मंदिर के द्वार पर आ पहुँची।

 * पंजीरी (भोलेपन से): "गुसाईं जी! देखो मेरे लाला की लीला। कल रात मेरी कुटिया पर आए, दूध पिया और जाते-जाते अपना पीतांबर छोड़ गए और मेरी फटी ओढ़नी उठा लाए। ये लो इनका बागा।"
गुसाईं जी सब समझ गए। उनकी आँखों से पश्चाताप के आँसू बह निकले। वे दौड़कर आए और पंजीरी के चरणों में गिर पड़े।

 * गुसाईं जी: "माई! मुझे क्षमा कर दे। मैं मदनमोहन की मूर्ति की पूजा करता रह गया और तूने अपने प्रेम से साक्षात मदनमोहन को पा लिया। मैंने भक्त और भगवान के बीच दीवार बनकर बहुत बड़ा अपराध किया है।"

 * पंजीरी (मुस्कुराते हुए): "अरे गुसाईं जी! इसमें आपका क्या दोष? यह तो लाला की पुरानी आदत है। उसे राजसी पीतांबर से ज्यादा अपने भक्तों के प्रेम की गुदड़ी में ही सुख मिलता है।"

मंदिर का प्रांगण "बांके बिहारी लाल की जय" के उद्घोष से गूँज उठा। उस दिन सबको समझ आ गया कि प्रभु वस्तु के नहीं, भाव के भूखे हैं।
।। जय जय श्री राधे ।।

Tuesday, November 18, 2025

मानसिक चिंतन युगल की सखी 2

मानसिक रूप लीला चिंतन दिवस 2 

मे युगल की सखी 

🌹युगल सखी-दिवस 2 🌹

“आँखिनि मैं बसै, जिय मैं बसै, हिय मैं बसत निसि दिवस प्यारौ।
तन मैं बसै, मन मैं बसै, रसना हूँ मैं बसै नँदवारौ ॥"

वृंदावन  !!
फिर वही स्पंदन  !!
आहा !! जहाँ युगल नित्य विहार करते हैं।
वृंदा  !!

वृंदा अर्थात श्यामसुंदर जु की अर्धांगिनी एक सखी जिसने अपने पातिव्रत भाव से श्यामसुंदर को अपने पति के रूप में पाया।श्यामा जु जिन्हें पतिरूप पाने के लिए इन्हीं वृंदा देवी का ध्यान पूजनार्चन करतीं हैं।
श्यामा जु जो स्वयं अभिन्न हैं श्यामसुंदर जु से पर फिर भी उन्हें पाने के लिए वे अपनी ही कायव्यूहरूपा सखियों का सहारा लेतीं हैं।

क्यों  ??
सखियाँ जो श्यामा श्यामसुंदर जु की अद्भुत कृपा पात्रा हैं।स्वयं को तृणमात्र जान वे युगल के चरणों में अर्पित हो जातीं हैं ।पर प्रिय श्यामाश्याम जु ऐसे करूणामयी कि इन तृणों को जिन पर ये नंगे पाँव चलते हैं उन्हें अपनी शरण में आए जान अपने चरणों से कभी विलग नहीं करते।हृदय से लगा लेने को आतुर।कहने को चरणरज की अभिलाषिणी दास्तव चाहतीं हैं श्यामाश्याम जु के चरणों का पर उदार युगल की विलक्षण प्रीति इन्हें दासी नहीं अपितु सखी जान अपना लेती है और अपने भजन व निष्ठा जो कि प्रियाप्रियतम जु की ही कृपा वर्षा की बूँदें हैं इन प्यारी सखियों पर स्वयं प्रीति ही हो जातीं हैं।

 प्रीति !!
कहने को तो प्रेम जो दो में होता है पर एक अद्भुत गहनतम एहसास जो प्रेम से प्रेम में रची बसी श्यामाश्याम जु के मिलन से उपजी अभिन्न भावरूप तरंगें जो श्यामाश्याम जु में से अवतरित हो फिर फिर इनके सुख हेतू इन्हीं में समा जातीं हैं।स्वसुख की लेशमात्र भी गंध नहीं।होगी भी कैसे ये प्रीतिरूप समाई हैं युगल में और उनके मिलन क्षणों में उन्हें सुखी देखने के लिए उन्हें बिन छुए ही उनके एहसास को जान पूर्तिवत हर पल ललायित रहतीं हैं।

 प्रीतिरसरूपी चाशनी में डूबीं ये सखियाँ निकुंज की जीती जागती अनुराग प्रतिमाओं सी हैं जिनका युगल प्रेम में डूब कर अपना कोई भिन्न वजूद नहीं रहता।

तत्सुख भाव लिए ये इतना गहनतम डूब जातीं हैं कि श्यामाश्याम जु ही इनका जीवन श्वास रगों में दौड़ता लहू व हृदय की धड़कन है।इनके रोमछिद्र जैसे युगलरस से ही सराबोर हो अद्भुत महक से  आप्लावित व श्वासित होते हैं ताकि ये सुखरूप हो सकें युगल मिलन में।

ऐसी अनगिनत प्यारी युगल सखियाँ अनवरत सेविका बन रहतीं हैं वृंदावन के कुंज निकुंजों में।इनमें से कुछ ऐसी भी होतीं हैं जो युगलरस से लबालब भर युगलसुख के लिए चली आतीं हैं वृंदावन की वीथियों से बाहर रस विस्तार के लिए।विलक्षण प्रीतिरस रूप जिन्हें श्यामा श्यामसुंदर जु से वियोग के पल में देह तो प्रदान करता है पर भीतर उनके वही युगल एक आंतरिक वृंदावन लिए भावजगत सदा संग चलता है।
बलिहार  !!

धराधाम पर इन प्यारी सखियों का आगमन ही होता है और शरणागतों को प्रियाप्रियतम जु के चरणों में ले जाना।
अद्भुत समर्पण !!
असाधारण युगल की असाधारण प्रेमी सखियाँ !!

क्रमशः ( अगला भाग कल पोस्ट किया जाएगा ) 

जय युगल सखियों की !!

जय जय श्यामाश्याम !!

जय जय युगल सरकार!!🌹🌹
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Wednesday, October 15, 2025

युगल सखी लीला चिंतन दिवस 1

युगल सखी-1

“भले वृथा करि पचि मरौ,ज्ञान गरूर बढ़ाय।
बिना प्रेम फीको सबै,कोटिन कियो उपाय॥"

वृंदावन !!
लीला स्थल एक सुहाना स्वप्न या एक अद्भुत प्यारी अनुभूति एक भाव लहरी की !
नि:शब्द  !!

वृंदावन का नाम अधरों पर आते ही भाव झरने लगते हैं।एक स्पंदन एक कम्पन  !!
बैठी सोचती है सखी  !!

क्या सच है ऐसा कोई प्रेम देस जहाँ केवल सात्विक प्रेम दर्शन होता है।एक ऐसा लीला राज्य जहाँ केवल और केवल प्रेम की ही बुवाई होती है और प्रेम रस से ही सिंचाई होती है।प्रेम बेल उगती है और प्रेम पुष्प प्रेम ब्यार को महकाते व झरते प्रेम रस की ओस से भीगे आ गिरते हैं।

अर्पित हो जाते हैं ब्रह्मांड त्रैलोक्य माधुर्य रसरासेश्वर महाप्रेम पिपासु रसिकेश्वर शिरोमणि एकरूप अभिन्न युगल के चरणों में।रज में समाकर फिर एक नवनिर्मान करने को आतुर।क्या सच !!
सखी के प्रेम रसराज व रसराजरानी के सत्य वृंदावन की अद्भुत प्रेममयी स्मरणीय झाँकी  !!

 क्या करे इस पगली ने कभी दरस ही ना किया इस प्रेम राज्य का  !!
पर प्रेम की महक वृंदावन से जैसे आकर छू गई हो इसे।या यूँ कहो कि अद्भुत प्रेम देव ने ही चुन ली हो एक ऐसी राह जहाँ से वृंदावन की विथियों से महक आ गई हो इस भावसखी तक।
ना जाने कैसे कहने को तो इस अद्भुत प्रेम राज्य के प्रेमी जन बाहर आते ही नहीं वृंदावन की गलियों से पर जिन्हें श्यामा श्यामसुंदर जु ने चुन लिया हो ऐसी सखियों को कैसे भी कहीं से भी ढूँढ लाने को  !!बलिहार  !!
सच बलिहार ऐसी पूज्य पुण्यात्मजन सखियों की  !!

वृंदावन प्रेम राज्य का वास मिलने के बावजूद भी अपने युगल के सुख के लिए वे सखियाँ निकल ही आती हैं श्यामा श्यामसुंदर जु के प्रेम निकुंजों से।
बड़भागिनी सखी जिसे युगल रस ने ऐसा छुआ कि वह चल दी उस रस को अन्यत्र और सौभाग्यशाली सखियों को जो कहीं भी हों इस जगत में बंधी बिंधी अलौकिक प्रेम ढूँढती।उनको ढूँढ लेती हैं ये युगल सखियाँ जो असाधारण हैं प्रेममयी  !! 

तत्सुख भाव से लीला राज्य से बाहर आ जातीं किन्हीं प्रेम संगिनियों को संग ले जाने उनको उनके अलौकिक प्रेम से मिलाने।

 असाधारण प्रेम असाधारण नित्य व सत्य प्रेमी रसिक श्यामसुंदर असाधारण रससिंधु नित्य व सत्य रसिकेश्वरी श्यामा किशोरी जु और असाधारण प्रेम वर्षिणी नित्य सत्य संगिनी हर्षाती सखियाँ।
असाधारण वृंदावन प्रेम राज्य की असाधारण केलि कुंज निकुंजों की असाधारण अनुभूतियाँ।
असाधारण कृपा सागर की असाधारण प्रेम ओस बुँदे गिरती रहीं तो असाधारण प्रेम पर असाधारण वार्ता करेंगे और करते रहेंगे।

शेष क्रमशः अगले दिवस ....

जय युगल सखियों की !!
जय जय श्यामाश्याम !!
जय जय युगल सरकार!!🌹🌹

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आज  के  विचार ( प्रीत  की यह कैसी नई रीत है.....) !! बृज रस- भाग 3 !! ************************* प्रेम सीधी चाल चलता कहाँ हैं ! ....प्रेम की ...