Monday, February 23, 2026

प्रेम की ओढ़नी: एक कथा भागवत

❤️ प्रेम की ओढ़नी: भक्त और भगवान के अटूट बंधन की कथा! ❤️

वृंदावन की पावन भूमि के समीप, यमुना किनारे बसे एक छोटे से गाँव में एक भोली-भाली ग्वालिन रहती थी, जिसे सब प्यार से ‘माई पंजीरी’ कहते थे। पंजीरी का जीवन अत्यंत सादा था, न कोई अपना था, न पराया। बस एक ही सहारा था—उसके ठाकुर मदनमोहन जी।
दूध बेचना ही उसकी जीविका थी, लेकिन उसका असली जीवन तो मंदिर की चौखट पर शुरू होता था।

नित्य नियम और विवशता:

माई का एक अटूट नियम था। वह प्रतिदिन सबसे पहले अपनी गैया का दूध दुहती और उसे मदनमोहन जी के लिए लेकर जाती। प्रभु भी अपनी इस भक्त से इतना प्रेम करते थे कि अक्सर उसके स्वप्न में आते और कभी माखन, कभी रबड़ी तो कभी गर्म दूध की मनुहार करते। पंजीरी भी उसी दिन वही बनाकर लाला को भोग लगाती।
किंतु, गरीबी का दुःख बड़ा निष्ठुर होता है।

मदनमोहन जी को दूध चढ़ाने के बाद जो बचता, उसे बेचकर पंजीरी का गुजारा मुश्किल से होता था। दो वक्त की रोटी भी नसीब न होती। विवश होकर, कभी-कभी मंदिर जाते समय वह यमुना जी के पावन जल की कुछ बूँदें दूध में मिला देती। मन ही मन कहती— "हे यमुना मैया, तू भी तो कृष्ण की पटरानी है, तेरे जल का दोष कैसा?"

फिर घर लौटकर वह अपने बाल-गोपाल के भजन-कीर्तन में ऐसी रमती कि उसे अपनी गरीबी और भूख का भी भान न रहता।

विपदा की घड़ी:

कहते हैं, ठाकुर जी अपने भक्तों की परीक्षा भी लेते हैं और लीला भी करते हैं।

एक दिन अनहोनी हो गई। यमुना जल मिलाते समय, अनजाने में एक नन्हीं सी मछली लोटे में आ गई। पंजीरी अपनी धुन में मगन मंदिर पहुंची और जैसे ही गर्भगृह में दूध उंड़ेलने लगी, वह मछली मदनमोहन जी के चरणों में जा गिरी।

यह दृश्य मंदिर के मुख्य गुसाईं (पुजारी) ने देख लिया।

उनका क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच गया। वे गरज उठे, "अरी पगली! यह क्या अनर्थ कर दिया? तूने मंदिर अपवित्र कर दिया। निकल जा यहाँ से!"

गुसाईं ने न केवल दूध वापस किया बल्कि पंजीरी को खूब खरी-खोटी सुनाई और मंदिर में उसके प्रवेश पर ही प्रतिबंध लगा दिया।

भक्त का हठ:

पंजीरी पर तो जैसे वज्रपात हो गया। वह रोती-बिलखती अपनी कुटिया में पहुँची। आज उसे गुसाईं की डांट का दुख नहीं था, दुख इस बात का था कि उसके कन्हैया ने आज दूध नहीं पिया।

उसने घर के कोने में रखे ठाकुर जी के चित्र के सामने बैठकर उलाहना देना शुरू किया:

> "ठाकुर! मुझसे अपराध हुआ, मैं मानती हूँ। पर पानी तो मैं रोज मिलाती हूँ, तुमसे क्या छिपा है? अगर जल न मिलाऊँ तो पेट कैसे पालूँ? और उस बेचारी मछली का क्या दोष? वह तो तेरे चरणों में ही आई थी।

> पर आज मुझे सबसे ज्यादा दुख इस बात का है कि गुसाईं मुझे अपमानित करता रहा और तू चुपचाप देखता रहा? जा, अगर तू मेरा चढ़ाया दूध नहीं पिएगा, तो मैं भी अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगी। यहीं तेरे वियोग में प्राण त्याग दूँगी।"
शाम ढल गई, रात गहराने लगी। पंजीरी भूखी-प्यासी, रोते-रोते निढाल हो गई।

छलिया का आगमन:

मध्यरात्रि का समय था। तभी कुटिया के बाहर से एक मधुर और कोमल स्वर सुनाई दिया— "माई... ओ माई!"

पंजीरी ने चौंककर दरवाजा खोला। सामने एक अत्यंत सुंदर, सलोना सा किशोर खड़ा था। शरीर पर धूल लगी थी, चेहरा थका हुआ सा था, पर आँखों में ऐसी चमक थी कि अँधेरी रात भी रोशन हो जाए।
 * पंजीरी: "कौन हो बेटा? इतनी रात गए यहाँ कैसे?"

 * बालक: "मैया, मैं ब्रजवासी हूँ। मदनमोहन के दर्शन करने आया था, पर मंदिर के पट बंद हो गए। बड़ी जोर की भूख लगी है, कुछ खाने को दे दे तो तेरा बड़ा उपकार होगा।"

बालक की आवाज़ में ऐसा जादू था कि पंजीरी का सारा दुख पल भर में ममता में बदल गया।

 * पंजीरी: "अरे लला! यह घर तेरा ही है। तू इतनी दूर से थका-हारा आया है, अभी तेरे लिए रोटियां सेक देती हूँ।"

 * बालक: "नहीं मैया! रसोई मत बना, बहुत समय लगेगा। मुझे तो बस थोड़ा सा दूध दे दे, वही पीकर सो जाऊँगा।"

दूध का नाम सुनते ही पंजीरी की आँखों में फिर आँसू आ गए।
 
* पंजीरी (हिचकिचाते हुए): "बेटा, दूध तो है... पर सवेरे का है। 
और... और उसमें थोड़ा पानी भी मिला है। तू बैठ, मैं गैया को सहलाकर ताज़ा दूध दुह लाती हूँ।"

 * बालक (मचलते हुए): "अरे नहीं मैया! अब नहीं रहा जाता। दूध का नाम लेकर तूने मुझे और अधीर कर दिया। तू वही सवेरे वाला दूध दे दे। अगर तूने अभी दूध नहीं दिया तो मेरे प्राण निकल जायेंगे।"
पंजीरी हैरान थी। यह कैसा बालक है जो पानी मिले बासी दूध के लिए इतना मचल रहा है? उसने हार मानकर वही लोटा भर दूध बालक को दे दिया।

बालक ने एक ही सांस में दूध पिया और तृप्ति की डकार ली।
"वाह मैया! ऐसा अमृत जैसा दूध तो मैंने आज तक नहीं पिया। तू तो व्यर्थ ही बहाने बना रही थी। अब मेरा पेट भर गया, मुझे नींद आ रही है।"

इतना कहकर वह बालक वहीं कुटिया के कोने में सिमट कर सो गया।

प्रेम की ओढ़नी:

पंजीरी ने देखा कि बालक ठिठुर रहा है। जाड़े की रात थी। माई के पास ओढ़ने को कुछ खास न था, बस एक फटी-पुरानी ओढ़नी थी जिसे वह खुद ओढ़ती थी। ममता के वशीभूत होकर उसने वह ओढ़नी बालक को ओढ़ा दी और खुद एक कोने में बैठकर प्रभु का स्मरण करने लगी।

भूखे पेट और थकान के कारण उसकी आँख लग गई।

स्वप्न में उसने देखा कि स्वयं ठाकुर मदनमोहन जी उसके सामने खड़े हैं। वे मुस्कुराते हुए बोले:

> "मैया! तू मुझे भूखा मारेगी क्या? गुसाईं की बातों का बुरा मानकर तूने खुद भी कुछ नहीं खाया? देख, मैं तो तेरा दूध पीकर तृप्त हो गया। और सुन, तू दूध में पानी मिलाती है तो क्या हुआ? अच्छा है, पतला दूध जल्दी हजम हो जाता है! अब उठ और भोजन कर, तेरे भूखे रहने से मुझे पीड़ा होती है।"
पंजीरी हड़बड़ा कर जागी।
"लला... ओ लला!" उसने आवाज दी, लेकिन कुटिया में कोई नहीं था। वह बालक गायब था।

पंजीरी का रोम-रोम पुलकित हो गया। उसे समझते देर न लगी कि वह कोई साधारण बालक नहीं, स्वयं उसका छलिया कन्हैया था।
उसने खुशी-खुशी उठकर भोजन बनाया और ठाकुर जी को भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण किया।

लीला का रहस्य:

सुबह हुई तो पंजीरी ने देखा कि जिस जगह वह बालक लेटा था, वहां उसकी फटी हुई ओढ़नी नहीं थी, बल्कि सोने के तारों से जड़ा हुआ रेशमी पीतांबर रखा था। ठाकुर जी अपनी निशानी छोड़ गए थे और भक्त की फटी गुदड़ी ले गए थे।

उधर, मंदिर में जैसे ही गुसाईं जी ने पट खोले, उनके होश उड़ गए।
सिंहासन पर विराजमान मदनमोहन लाल जी ने अपना कीमती पीतांबर नहीं, बल्कि एक फटी-पुरानी मैली सी ओढ़नी ओढ़ रखी थी। प्रभु के चेहरे पर ऐसी मंद मुस्कान थी जैसे संसार का सबसे बड़ा सुख उन्हें इसी गुदड़ी में मिल रहा हो।

गुसाईं जी अभी इस रहस्य को सुलझा ही रहे थे कि पंजीरी हाथ में पीतांबर लिए मंदिर के द्वार पर आ पहुँची।

 * पंजीरी (भोलेपन से): "गुसाईं जी! देखो मेरे लाला की लीला। कल रात मेरी कुटिया पर आए, दूध पिया और जाते-जाते अपना पीतांबर छोड़ गए और मेरी फटी ओढ़नी उठा लाए। ये लो इनका बागा।"
गुसाईं जी सब समझ गए। उनकी आँखों से पश्चाताप के आँसू बह निकले। वे दौड़कर आए और पंजीरी के चरणों में गिर पड़े।

 * गुसाईं जी: "माई! मुझे क्षमा कर दे। मैं मदनमोहन की मूर्ति की पूजा करता रह गया और तूने अपने प्रेम से साक्षात मदनमोहन को पा लिया। मैंने भक्त और भगवान के बीच दीवार बनकर बहुत बड़ा अपराध किया है।"

 * पंजीरी (मुस्कुराते हुए): "अरे गुसाईं जी! इसमें आपका क्या दोष? यह तो लाला की पुरानी आदत है। उसे राजसी पीतांबर से ज्यादा अपने भक्तों के प्रेम की गुदड़ी में ही सुख मिलता है।"

मंदिर का प्रांगण "बांके बिहारी लाल की जय" के उद्घोष से गूँज उठा। उस दिन सबको समझ आ गया कि प्रभु वस्तु के नहीं, भाव के भूखे हैं।
।। जय जय श्री राधे ।।

Tuesday, November 18, 2025

मानसिक चिंतन युगल की सखी 2

मानसिक रूप लीला चिंतन दिवस 2 

मे युगल की सखी 

🌹युगल सखी-दिवस 2 🌹

“आँखिनि मैं बसै, जिय मैं बसै, हिय मैं बसत निसि दिवस प्यारौ।
तन मैं बसै, मन मैं बसै, रसना हूँ मैं बसै नँदवारौ ॥"

वृंदावन  !!
फिर वही स्पंदन  !!
आहा !! जहाँ युगल नित्य विहार करते हैं।
वृंदा  !!

वृंदा अर्थात श्यामसुंदर जु की अर्धांगिनी एक सखी जिसने अपने पातिव्रत भाव से श्यामसुंदर को अपने पति के रूप में पाया।श्यामा जु जिन्हें पतिरूप पाने के लिए इन्हीं वृंदा देवी का ध्यान पूजनार्चन करतीं हैं।
श्यामा जु जो स्वयं अभिन्न हैं श्यामसुंदर जु से पर फिर भी उन्हें पाने के लिए वे अपनी ही कायव्यूहरूपा सखियों का सहारा लेतीं हैं।

क्यों  ??
सखियाँ जो श्यामा श्यामसुंदर जु की अद्भुत कृपा पात्रा हैं।स्वयं को तृणमात्र जान वे युगल के चरणों में अर्पित हो जातीं हैं ।पर प्रिय श्यामाश्याम जु ऐसे करूणामयी कि इन तृणों को जिन पर ये नंगे पाँव चलते हैं उन्हें अपनी शरण में आए जान अपने चरणों से कभी विलग नहीं करते।हृदय से लगा लेने को आतुर।कहने को चरणरज की अभिलाषिणी दास्तव चाहतीं हैं श्यामाश्याम जु के चरणों का पर उदार युगल की विलक्षण प्रीति इन्हें दासी नहीं अपितु सखी जान अपना लेती है और अपने भजन व निष्ठा जो कि प्रियाप्रियतम जु की ही कृपा वर्षा की बूँदें हैं इन प्यारी सखियों पर स्वयं प्रीति ही हो जातीं हैं।

 प्रीति !!
कहने को तो प्रेम जो दो में होता है पर एक अद्भुत गहनतम एहसास जो प्रेम से प्रेम में रची बसी श्यामाश्याम जु के मिलन से उपजी अभिन्न भावरूप तरंगें जो श्यामाश्याम जु में से अवतरित हो फिर फिर इनके सुख हेतू इन्हीं में समा जातीं हैं।स्वसुख की लेशमात्र भी गंध नहीं।होगी भी कैसे ये प्रीतिरूप समाई हैं युगल में और उनके मिलन क्षणों में उन्हें सुखी देखने के लिए उन्हें बिन छुए ही उनके एहसास को जान पूर्तिवत हर पल ललायित रहतीं हैं।

 प्रीतिरसरूपी चाशनी में डूबीं ये सखियाँ निकुंज की जीती जागती अनुराग प्रतिमाओं सी हैं जिनका युगल प्रेम में डूब कर अपना कोई भिन्न वजूद नहीं रहता।

तत्सुख भाव लिए ये इतना गहनतम डूब जातीं हैं कि श्यामाश्याम जु ही इनका जीवन श्वास रगों में दौड़ता लहू व हृदय की धड़कन है।इनके रोमछिद्र जैसे युगलरस से ही सराबोर हो अद्भुत महक से  आप्लावित व श्वासित होते हैं ताकि ये सुखरूप हो सकें युगल मिलन में।

ऐसी अनगिनत प्यारी युगल सखियाँ अनवरत सेविका बन रहतीं हैं वृंदावन के कुंज निकुंजों में।इनमें से कुछ ऐसी भी होतीं हैं जो युगलरस से लबालब भर युगलसुख के लिए चली आतीं हैं वृंदावन की वीथियों से बाहर रस विस्तार के लिए।विलक्षण प्रीतिरस रूप जिन्हें श्यामा श्यामसुंदर जु से वियोग के पल में देह तो प्रदान करता है पर भीतर उनके वही युगल एक आंतरिक वृंदावन लिए भावजगत सदा संग चलता है।
बलिहार  !!

धराधाम पर इन प्यारी सखियों का आगमन ही होता है और शरणागतों को प्रियाप्रियतम जु के चरणों में ले जाना।
अद्भुत समर्पण !!
असाधारण युगल की असाधारण प्रेमी सखियाँ !!

क्रमशः ( अगला भाग कल पोस्ट किया जाएगा ) 

जय युगल सखियों की !!

जय जय श्यामाश्याम !!

जय जय युगल सरकार!!🌹🌹
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Wednesday, October 15, 2025

युगल सखी लीला चिंतन दिवस 1

युगल सखी-1

“भले वृथा करि पचि मरौ,ज्ञान गरूर बढ़ाय।
बिना प्रेम फीको सबै,कोटिन कियो उपाय॥"

वृंदावन !!
लीला स्थल एक सुहाना स्वप्न या एक अद्भुत प्यारी अनुभूति एक भाव लहरी की !
नि:शब्द  !!

वृंदावन का नाम अधरों पर आते ही भाव झरने लगते हैं।एक स्पंदन एक कम्पन  !!
बैठी सोचती है सखी  !!

क्या सच है ऐसा कोई प्रेम देस जहाँ केवल सात्विक प्रेम दर्शन होता है।एक ऐसा लीला राज्य जहाँ केवल और केवल प्रेम की ही बुवाई होती है और प्रेम रस से ही सिंचाई होती है।प्रेम बेल उगती है और प्रेम पुष्प प्रेम ब्यार को महकाते व झरते प्रेम रस की ओस से भीगे आ गिरते हैं।

अर्पित हो जाते हैं ब्रह्मांड त्रैलोक्य माधुर्य रसरासेश्वर महाप्रेम पिपासु रसिकेश्वर शिरोमणि एकरूप अभिन्न युगल के चरणों में।रज में समाकर फिर एक नवनिर्मान करने को आतुर।क्या सच !!
सखी के प्रेम रसराज व रसराजरानी के सत्य वृंदावन की अद्भुत प्रेममयी स्मरणीय झाँकी  !!

 क्या करे इस पगली ने कभी दरस ही ना किया इस प्रेम राज्य का  !!
पर प्रेम की महक वृंदावन से जैसे आकर छू गई हो इसे।या यूँ कहो कि अद्भुत प्रेम देव ने ही चुन ली हो एक ऐसी राह जहाँ से वृंदावन की विथियों से महक आ गई हो इस भावसखी तक।
ना जाने कैसे कहने को तो इस अद्भुत प्रेम राज्य के प्रेमी जन बाहर आते ही नहीं वृंदावन की गलियों से पर जिन्हें श्यामा श्यामसुंदर जु ने चुन लिया हो ऐसी सखियों को कैसे भी कहीं से भी ढूँढ लाने को  !!बलिहार  !!
सच बलिहार ऐसी पूज्य पुण्यात्मजन सखियों की  !!

वृंदावन प्रेम राज्य का वास मिलने के बावजूद भी अपने युगल के सुख के लिए वे सखियाँ निकल ही आती हैं श्यामा श्यामसुंदर जु के प्रेम निकुंजों से।
बड़भागिनी सखी जिसे युगल रस ने ऐसा छुआ कि वह चल दी उस रस को अन्यत्र और सौभाग्यशाली सखियों को जो कहीं भी हों इस जगत में बंधी बिंधी अलौकिक प्रेम ढूँढती।उनको ढूँढ लेती हैं ये युगल सखियाँ जो असाधारण हैं प्रेममयी  !! 

तत्सुख भाव से लीला राज्य से बाहर आ जातीं किन्हीं प्रेम संगिनियों को संग ले जाने उनको उनके अलौकिक प्रेम से मिलाने।

 असाधारण प्रेम असाधारण नित्य व सत्य प्रेमी रसिक श्यामसुंदर असाधारण रससिंधु नित्य व सत्य रसिकेश्वरी श्यामा किशोरी जु और असाधारण प्रेम वर्षिणी नित्य सत्य संगिनी हर्षाती सखियाँ।
असाधारण वृंदावन प्रेम राज्य की असाधारण केलि कुंज निकुंजों की असाधारण अनुभूतियाँ।
असाधारण कृपा सागर की असाधारण प्रेम ओस बुँदे गिरती रहीं तो असाधारण प्रेम पर असाधारण वार्ता करेंगे और करते रहेंगे।

शेष क्रमशः अगले दिवस ....

जय युगल सखियों की !!
जय जय श्यामाश्याम !!
जय जय युगल सरकार!!🌹🌹

Monday, September 29, 2025

निकुंज लीला 1

निकुञ्ज का एकान्त कक्ष। श्रीप्रियाजी मखमली सिंहासन पर अकेली बैठी हैं। उन्होंने धीरे से पुकारा- चित्रा!

अपना नाम सुनते ही श्रीचित्रा उपस्थित हो गयी। नयनों की भाषा में चित्रा पूछ रही थी कि क्या आदेश है? 

श्रीचित्रा पर दृष्टि जमाये श्रीप्रियाजी ने कहा- क्या तुम मेरा एक काम कर दोगी?

श्रीचित्रा ने विनम्र स्वर में कहा- मैंने कब किसी कार्य के लिये ना कहा है?

श्रीप्रियाजी- यह तो मैं जानती हूँ, पर आज जो कहूँगी, उसके लिये तुम आनाकानी तो नहीं करोगी?

श्रीचित्रा- तुम कहो तो सही। मैं न ना कहूँगी और न आनाकानी करूँगी।

श्रीचित्रा का कथन आदेश पालन की भावना से भरपूर था।श्रीप्रियाजी- मैं जो कहूँगी, उसके बीच में कोई प्रश्न मत करना और न इसकी चर्चा कहीं अन्यत्र करना। मैं जो कहूँ, वैसा कर देना। श्रीप्रियाजी ने जो कहा, उनके शब्द-शब्द से अपार प्यार झर रहा था। श्रीचित्रा की चित्तवृत्ति अत्युत्सुक थी कि श्रीप्रियाजी आज क्या अनोखी बात कहने वाली हैं। 

सुनने के लिये अति तत्परा चित्तवाली श्रीचित्रा से श्रीप्रियाजी ने कहा- तुम एक चित्र बना दो। सुन्दर चित्र, एक ललिता का, एक विशाखा का एक तुम अपना।

श्रीचित्राजी बीच में ही बोल पड़ीं- मेरा और मेरी बहिनों का चित्र क्यों बनवा रही हो?

श्रीप्रियाजी- देखो, देखो, तुम बीच में ही बोल पड़ी न? मैंने कहा था न कि बीच में कुछ प्रश्न मत करना।

श्रीचित्रा- ठीक है। उत्सुकतावशात् प्रमाद हो गया। अब मैं नहीं  पूछूंगी। श्रीचित्रा ने विश्वास दिलाया।

श्रीप्रियाजी- तुम ललिता, विशाखा, अपना, इन्दुलेखा, चम्पकलता, रंगदेवी, तुंगविद्या और सुदेवी इन सभी का एक-एक सुन्दर चित्र बना दो।

श्रीचित्रा ने कहा- जैसी आज्ञा। श्रीचित्रा ने एक-दो दिन में आठों बहिनों के आठ चित्र बनाकर दे दिये। श्रीप्रियाजी ने उन आठों चित्रों को चन्दन की मञ्जूषा में सहेजकर और सँभाल कर रख लिया। श्रीचित्रा के मन में बड़ी जिज्ञासा थी कि इन चित्रों को बनवाने का प्रयोजन क्या है? पूछने पर श्रीप्रियाजी बतलायेंगी नहीं और प्रयोजन जानने की उत्सुकता उत्तरोत्तर बढ़ती ही जा रही थी।

एक रात श्रीचित्राजी के उकसाये जाने पर मैंने बात को टटोलने का प्रयास किया। प्रयास सफल भी हो गया। निकुञ्ज के छिद्र-रन्ध्र से चुपचाप झाँककर मैंने जो देखा, उसे देखकर अपार विस्मय हुआ।

श्रीप्रियाजी ने चन्दन की मञ्जूषा से श्रीललिताजी का चित्र निकाला। उस चित्र को श्रीप्रियाजी ने प्रणाम किया, उसे छाती से लगाया, कपोलों से चिपकाया और फिर उसे निहारते हुए वे कहने लगीं- ललिते! जैसी तेरी सेवापरायणता है, उसके कणांश का भी उद्भव मेरे जीवन में कभी होगा क्या? मेरी बहिनि! तुम कितनी महान् हो, जो हम दोनों के लिये सतत और सर्वथा सर्वार्पण किये रहती हो। मैं तेरे चित्र को प्रणाम करती हूँ। शायद इसी से तेरा यह महान् सद्गुण प्रियसुख-संवर्धनशीलता मेरे अन्तर में भी संक्रमित हो जाय।

जिस प्रकार श्रीललिताजी के चित्र के प्रति वन्दन-निवेदन आदि श्रीप्रियाजी ने किया, वैसा ही अन्य बहिनों के चित्रों के प्रति भी किया।

मैं मन-ही-मन पुकार उठी- इस भाव-गरिमा की जय हो! जय हो!! मैं बलि-बलि जाऊँ।

Saturday, July 12, 2025

गो प्रेम गौ के श्याम 1

        
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         ━❀꧁ हरे कृष्ण ꧂❀━ 
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      *"कृष्ण का गऊ प्रेम”*  
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💫💫💫🏀🏀🏀✨✨✨                              

एक दिन कान्हा नन्दभवन से निकलकर सीधा गोशाला में पहुँच गये। वहाँ पर एक गाय उन्हें अपना दूध पिलाने के लिये उनकी प्रतिक्षा कर रही थी। वात्सल्य-स्नेह से उस गाय का दूध अपने आप झरता जा रहा था। वह वात्सल्य वश व बालक श्रीकृष्ण के दर्शन के हेतु एकटक दृष्टि नन्दभवन दरवाजे पर लगाये थी कि कब कान्हा बाहर निकले और वह उन्हें अपना दूध पिलाकर अपना जीवन सार्थक कर सके। 

अब कान्हा भी उसके पवित्र प्रेम की उपेक्षा भला कैसे करते ! वह नन्द भवन से निकलकर गोशाला में सीधे उस गाय के पास पहुँचे और उसके थन में मुँह लगाकर लगे उसका दूध पीने लगे। इधर कान्हा तो दुग्धपान का आनन्द ले रहे थे।  वहाँ नन्दभवन में मईया यशोदा बालक कृष्ण को ढूंढ़ कर परेशान हो रही थी। मईया यशोदा जी कन्हा को चारों तरफ़ देख रही थीं।  वे बार-बार कान्हा-कान्हा करके कान्हा को पुकार रही थीं। 

कान्हा ! ओ कान्हा ! तू कहाँ गया, अरे जल्दी से आ भी जा ! मैं कब से तेरी प्रतीक्षा कर रही हूँ, लेकिन जब कान्हा होता तब न सुनता, वह तो अपनी गाय का दूध पी रहा था। माता यशोदा उसे पुकारती हुई सोच रही थी, पता नही कन्हैया कहाँ चला गया। उसने अभी तक सुबह से कुछ खाया भी नही है। थक हारकर उन्होंने बालक कृष्ण को बाहर ढूंढ़ना शुरु किया। उन्होंने खिड़की से बाहर झांककर देखा, तो चकित होकर देखती ही रह गयीं। कान्हा तो अपनी गोमाता के थन में मुँह लगाकर दूध पी रहा है। गाय प्रेम व वात्सल्य से कन्हैया का सिर चाट रही है।
      
यशोदा मैया ने कहा कि हे गोमाता ! तू धन्य है !  मैं तो अभी तक अपने कान्हा के कलेवा की चिन्ता कर रही थी, और तूने तो उसे दूध भी पिला दिया। मैं तुम्हें शत-शत नमन करती हूँ। यहाँ कान्हा की अदभुत गौ प्रेम की लीला का अद्भुत और विलक्षण दृश्य है।
    
भगवान श्री कृष्ण ने भी गोमाता की पूजा की थी। पूजा का मन्त्र है–’ऊँ सुरभ्यै नम:


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हरे ......कृष्णा....हरे.....कृष्णा...कृष्णा..
कृष्णा.....हरे ....हरे....हरे....राम..हरे.....
राम......राम.......राम.....हरे.....हरे.....
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     ━❀꧁𝐻𝑎𝑟𝑒 𝐾𝑟𝑖𝑠ℎ𝑛𝑎꧂❀━
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Friday, July 11, 2025

गुरु पूर्णिमा का अर्थ ओर क्यों मनाते हे सनातनी यह पर्व जानिए इतिहास (gurupurnima meaning)


         ━❀꧁ हरे कृष्ण ꧂❀━ 

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       ☺ *”व्यास–गुरु पूर्णिमा”* ☺ 
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महर्षि वेदव्यास जी अमर हैं। महान विभूति वेदव्यास का जन्म आषाढ़ पूर्णिमा को लगभग 3000 ई. पूर्व में हुआ था। महर्षि व्यास का पूरा नाम कृष्णद्वैपायन है। उन्होंने वेदों का विभाग किया, इसलिए उनको व्यास या वेदव्यास कहा जाता है। उनके पिता महर्षि पराशर तथा माता सत्यवती है। 
           
भारत भर में गुरुपूर्णिमा के दिन गुरुदेव की पूजा के साथ महर्षि व्यास की पूजा भी की जाती है। महर्षि वेदव्यास भगवान विष्णु के कालावतार माने गए हैं। द्वापर युग के अंतिम भाग में व्यासजी प्रकट हुए थे। उन्होंने अपनी सर्वज्ञ दृष्टि से समझ लिया कि कलियुग में मनुष्यों की शारीरिक शक्ति और बुद्धि शक्ति बहुत घट जाएगी। इसलिए कलियुग के मनुष्यों को सभी वेदों का अध्ययन करना और उनको समझ लेना संभव नहीं रहेगा।
           
व्यासजी ने यह जानकर वेदों के चार विभाग कर दिए। जो लोग वेदों को पढ़, समझ नहीं सकते, उनके लिए महाभारत की रचना की। महाभारत में वेदों का सभी ज्ञान आ गया है। धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र, उपासना और ज्ञान-विज्ञान की सभी बातें महाभारत में बड़े सरल ढंग से समझाई गई हैं।
           
इसके अतिरिक्त पुराणों की अधिकांश कथाओं द्वारा हमारे देश, समाज तथा धर्म का पूरा इतिहास महाभारत में आया है। महाभारत की कथाएं बड़ी रोचक और उपदेशप्रद हैं। सब प्रकार की रुचि रखने वाले लोग भगवान की उपासना में लगें और इस प्रकार सभी मनुष्यों का कल्याण हो। इसी भाव से व्यासजी ने अठारह पुराणों की रचना की। ‘श्रीजी की चरण सेवा’ की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ को फॉलो तथा लाईक करें और अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें। इन पुराणों में भगवान के सुंदर चरित्र व्यक्त किए गए हैं। भगवान के भक्त, धर्मात्मा लोगों की कथाएं पुराणों में सम्मिलित हैं। इसके साथ-साथ व्रत-उपवास को की विधि, तीर्थों का माहात्म्य आदि लाभदायक उपदेशों से पुराण परिपूर्ण है।
           
वेदांत दर्शन के रचना करने वाले महर्षि वेदव्यास ने वेदांत दर्शन को छोटे-छोटे सूत्रों में लिखा गया है, लेकिन गंभीर सूत्रों के कारण ही उनका अर्थ समझने के लिए बड़े-बड़े ग्रंथ लिखे हैं। 
           
धार्मिक मान्यता के अनुसार ही गुरुपूर्णिमा पर गुरुदेव की पूजा के साथ ही महर्षि व्यास की पूजा भी की जाती है। हिन्दू धर्म के सभी भागों को व्यासजी ने पुराणों में भली-भांति समझाया है। महर्षि व्यास सभी हिन्दुओं के परम पुरुष हैं।
                                             
                      “ॐ श्रीगुरुवे नमः”

        
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Friday, July 4, 2025

चकित चकवा मानसिक रूप-लीला चिंतन

चकित चकवा
राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा.....

श्रीयुगल रसिकों के रास-विहार के दर्शन में विमुग्ध-विलुब्ध चकवे को पता ही नहीं चला कि मध्य रात्रि की बेला हो गयी। निशान्त बेला के उपरान्त श्रीयुगल रसिकों के सहनृत्य का शुभारम्भ हुआ था। नृत्य की अद्भुत गति ने सभी को विमोहित कर रखा था। किसी को भी समयका भान नहीं था। अपने अस्तित्व को भूले हुए सभी तादात्म्यभाव में निमग्न थे।

भाव के किञ्चित् शमित होने पर चकवे ने देखा कि मैं अपनी चकवी के पास वृक्ष की शाखा पर बैठा हुआ हूँ और मेरी चकवी मेरे पार्श्व में बैठी रास-विहार को देख रही है। चकवे को विस्मय हो रहा था कि रात हो गयी है, इसके बाद भी मेरी चकवी मेरे समीप है। विधाता के विधान के अनुसार इसे अलग हो जाना चाहिये था। विधाता को मैं सदा ही कोसता रहता हूँ कि उसने यह क्या विधान बनाया कि चकवी रातभर के लिये चकवे से अलग हो जाया करती है। प्रिय का विलग हो जाना कितना प्रपीड़ित करता है, यह वह विधाता क्या जाने? घायल ही घायल के मर्म को जान पाता है। आज विधाता के विधान में यह अपवाद कैसे हो गया?

चकवा अपने अन्तर के विस्मय को छिपा नहीं पाया। वह समीप बैठी अपनी चकवी से पूछ बैठा- आज यह कैसे सम्भव हो गया कि सूर्यास्त के बाद चकवी-चकवा का जो पारस्परिक बिलगाव हुआ करता है, वह इस समय नहीं हुआ? अब तो आधी रात होने को आयी और तुम तब से अब तक सतत मेरे पास हो। यह कैसे हो गया?

चकवी ने अनुमान लगा लिया कि इसे अभी श्रीप्रिया-प्रियतम के रसराज्य के अनोखेपन का परिज्ञान नहीं है। चकवी ने बतलाना आरम्भ किया- वह देखो, श्रीयमुनाजी के मन्थर प्रवाह की ओर। तट के समीप कितने कमल खिले हुए हैं! कमल भी अनेक रंग के हैं। क्या रात को कमल खिलते हैं? सूर्यास्त होते ही इन कमलों को सम्पुटित हो जाना चाहिये था, परन्तु रास-विहार की दिव्य लीला के अनुरूप आकर्षक वातावरण के निर्माण के लिये ये कमल तनिक भी संकुचित या सम्पुटित नहीं हुए, अपितु पूर्ण रूप से विकसित हैं। यहाँ क्या विधाता के विधान का किसी भी रूप में कोई अनुशासन है? सत्य तो यह है कि वह विधाता और उसका वह विधान ही यहाँ के अनुशासन से अनुशासित रहता है, सदा संकुचित रहता है। उस विधि-विधान का इस लीला-राज्य में प्रवेश ही नहीं। दिव्य लीला के रसोत्कर्ष में जो भी आवश्यक होगा, वह सब यहाँ होगा और देखो, जिस वृक्ष पर हम दोनों बैठे हैं, उस वृक्ष के मूलभाग की ओर देखो।

चकवी के कहने पर वह चकवा, जो श्रीयमुनाजी में विकसित कमलों को साश्चर्य देख रहा था, उस चकित चकवे ने पुनः साश्चर्य देखा कि वृक्ष के मूलभाग में एक बड़े सर्प के फैले फण पर एक मेढक बैठा है। मेढक को सर्प के फण पर बैठे हुए देखकर चकवा चकित स्वर में बोल पड़ा- मेढक तो सर्प का भोजन है। भक्ष्य मेढक से सर्प को इतना प्यार?

चकवी ने फिर समझाना आरम्भ किया- विधाता की त्रिगुणात्मक सृष्टि में मेढक सर्प का भक्ष्य हो सकता है, परन्तु श्रीप्रिया-प्रियतम के इस त्रिगुणातीत प्रेम-राज्य में वह मेढक भी सर्प के द्वारा लाल्य है। मेढक को सर्प ने अपने फण पर इसलिये बैठा रखा है कि वह ऊँचे बैठकर भली प्रकार से रास-विहार का दर्शन कर सके। तुम यह मान लो, पूर्णतः मान लो कि ब्रह्मा की जड़-चेतनात्मक, गुण-दोषमय सृष्टि के संचालन संतुलन के लिये विधि-निषेध के विविध नियम ब्राह्मी सृष्टि का नियमन नियंत्रण भले करते रहें, परन्तु श्रीप्रिया-प्रियतम का नित्य निर्विकार और नितान्त निर्मल निकुञ्ज राज्य उन विविध नियमों की नियमन परिधि से सर्वथा परे है। यहाँ निकुञ्ज-राज्य में वही होगा, जो प्रीति का पोषक हो, जो परसुख प्रदायक हो और जो श्रीप्रिया-प्रियतम की रस-रीति के उत्कर्ष में सहायक हो। तभी तो तुम मेरे पास हो, मैं तुम्हारे पास हूँ, तभी रात में भी कमल विकसित होते हैं और सर्प भी मेढक से प्रीति रखता है।

विस्मय में डूबा चकवा सिहर-सिहरकर बोल उठा श्रीप्रिया-प्रियतम के इस अनोखे रस-राज्य की जय हो, सदा जय हो, इसकी बार-बार बलिहारी

🙏🙏 राधे श्याम जी 🙏🙏
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