Saturday, July 12, 2025

गो प्रेम गौ के श्याम 1

        
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         ━❀꧁ हरे कृष्ण ꧂❀━ 
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      *"कृष्ण का गऊ प्रेम”*  
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एक दिन कान्हा नन्दभवन से निकलकर सीधा गोशाला में पहुँच गये। वहाँ पर एक गाय उन्हें अपना दूध पिलाने के लिये उनकी प्रतिक्षा कर रही थी। वात्सल्य-स्नेह से उस गाय का दूध अपने आप झरता जा रहा था। वह वात्सल्य वश व बालक श्रीकृष्ण के दर्शन के हेतु एकटक दृष्टि नन्दभवन दरवाजे पर लगाये थी कि कब कान्हा बाहर निकले और वह उन्हें अपना दूध पिलाकर अपना जीवन सार्थक कर सके। 

अब कान्हा भी उसके पवित्र प्रेम की उपेक्षा भला कैसे करते ! वह नन्द भवन से निकलकर गोशाला में सीधे उस गाय के पास पहुँचे और उसके थन में मुँह लगाकर लगे उसका दूध पीने लगे। इधर कान्हा तो दुग्धपान का आनन्द ले रहे थे।  वहाँ नन्दभवन में मईया यशोदा बालक कृष्ण को ढूंढ़ कर परेशान हो रही थी। मईया यशोदा जी कन्हा को चारों तरफ़ देख रही थीं।  वे बार-बार कान्हा-कान्हा करके कान्हा को पुकार रही थीं। 

कान्हा ! ओ कान्हा ! तू कहाँ गया, अरे जल्दी से आ भी जा ! मैं कब से तेरी प्रतीक्षा कर रही हूँ, लेकिन जब कान्हा होता तब न सुनता, वह तो अपनी गाय का दूध पी रहा था। माता यशोदा उसे पुकारती हुई सोच रही थी, पता नही कन्हैया कहाँ चला गया। उसने अभी तक सुबह से कुछ खाया भी नही है। थक हारकर उन्होंने बालक कृष्ण को बाहर ढूंढ़ना शुरु किया। उन्होंने खिड़की से बाहर झांककर देखा, तो चकित होकर देखती ही रह गयीं। कान्हा तो अपनी गोमाता के थन में मुँह लगाकर दूध पी रहा है। गाय प्रेम व वात्सल्य से कन्हैया का सिर चाट रही है।
      
यशोदा मैया ने कहा कि हे गोमाता ! तू धन्य है !  मैं तो अभी तक अपने कान्हा के कलेवा की चिन्ता कर रही थी, और तूने तो उसे दूध भी पिला दिया। मैं तुम्हें शत-शत नमन करती हूँ। यहाँ कान्हा की अदभुत गौ प्रेम की लीला का अद्भुत और विलक्षण दृश्य है।
    
भगवान श्री कृष्ण ने भी गोमाता की पूजा की थी। पूजा का मन्त्र है–’ऊँ सुरभ्यै नम:


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हरे ......कृष्णा....हरे.....कृष्णा...कृष्णा..
कृष्णा.....हरे ....हरे....हरे....राम..हरे.....
राम......राम.......राम.....हरे.....हरे.....
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     ━❀꧁𝐻𝑎𝑟𝑒 𝐾𝑟𝑖𝑠ℎ𝑛𝑎꧂❀━
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Friday, July 11, 2025

गुरु पूर्णिमा का अर्थ ओर क्यों मनाते हे सनातनी यह पर्व जानिए इतिहास (gurupurnima meaning)


         ━❀꧁ हरे कृष्ण ꧂❀━ 

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       ☺ *”व्यास–गुरु पूर्णिमा”* ☺ 
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महर्षि वेदव्यास जी अमर हैं। महान विभूति वेदव्यास का जन्म आषाढ़ पूर्णिमा को लगभग 3000 ई. पूर्व में हुआ था। महर्षि व्यास का पूरा नाम कृष्णद्वैपायन है। उन्होंने वेदों का विभाग किया, इसलिए उनको व्यास या वेदव्यास कहा जाता है। उनके पिता महर्षि पराशर तथा माता सत्यवती है। 
           
भारत भर में गुरुपूर्णिमा के दिन गुरुदेव की पूजा के साथ महर्षि व्यास की पूजा भी की जाती है। महर्षि वेदव्यास भगवान विष्णु के कालावतार माने गए हैं। द्वापर युग के अंतिम भाग में व्यासजी प्रकट हुए थे। उन्होंने अपनी सर्वज्ञ दृष्टि से समझ लिया कि कलियुग में मनुष्यों की शारीरिक शक्ति और बुद्धि शक्ति बहुत घट जाएगी। इसलिए कलियुग के मनुष्यों को सभी वेदों का अध्ययन करना और उनको समझ लेना संभव नहीं रहेगा।
           
व्यासजी ने यह जानकर वेदों के चार विभाग कर दिए। जो लोग वेदों को पढ़, समझ नहीं सकते, उनके लिए महाभारत की रचना की। महाभारत में वेदों का सभी ज्ञान आ गया है। धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र, उपासना और ज्ञान-विज्ञान की सभी बातें महाभारत में बड़े सरल ढंग से समझाई गई हैं।
           
इसके अतिरिक्त पुराणों की अधिकांश कथाओं द्वारा हमारे देश, समाज तथा धर्म का पूरा इतिहास महाभारत में आया है। महाभारत की कथाएं बड़ी रोचक और उपदेशप्रद हैं। सब प्रकार की रुचि रखने वाले लोग भगवान की उपासना में लगें और इस प्रकार सभी मनुष्यों का कल्याण हो। इसी भाव से व्यासजी ने अठारह पुराणों की रचना की। ‘श्रीजी की चरण सेवा’ की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ को फॉलो तथा लाईक करें और अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें। इन पुराणों में भगवान के सुंदर चरित्र व्यक्त किए गए हैं। भगवान के भक्त, धर्मात्मा लोगों की कथाएं पुराणों में सम्मिलित हैं। इसके साथ-साथ व्रत-उपवास को की विधि, तीर्थों का माहात्म्य आदि लाभदायक उपदेशों से पुराण परिपूर्ण है।
           
वेदांत दर्शन के रचना करने वाले महर्षि वेदव्यास ने वेदांत दर्शन को छोटे-छोटे सूत्रों में लिखा गया है, लेकिन गंभीर सूत्रों के कारण ही उनका अर्थ समझने के लिए बड़े-बड़े ग्रंथ लिखे हैं। 
           
धार्मिक मान्यता के अनुसार ही गुरुपूर्णिमा पर गुरुदेव की पूजा के साथ ही महर्षि व्यास की पूजा भी की जाती है। हिन्दू धर्म के सभी भागों को व्यासजी ने पुराणों में भली-भांति समझाया है। महर्षि व्यास सभी हिन्दुओं के परम पुरुष हैं।
                                             
                      “ॐ श्रीगुरुवे नमः”

        
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Friday, July 4, 2025

चकित चकवा मानसिक रूप-लीला चिंतन

चकित चकवा
राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा.....

श्रीयुगल रसिकों के रास-विहार के दर्शन में विमुग्ध-विलुब्ध चकवे को पता ही नहीं चला कि मध्य रात्रि की बेला हो गयी। निशान्त बेला के उपरान्त श्रीयुगल रसिकों के सहनृत्य का शुभारम्भ हुआ था। नृत्य की अद्भुत गति ने सभी को विमोहित कर रखा था। किसी को भी समयका भान नहीं था। अपने अस्तित्व को भूले हुए सभी तादात्म्यभाव में निमग्न थे।

भाव के किञ्चित् शमित होने पर चकवे ने देखा कि मैं अपनी चकवी के पास वृक्ष की शाखा पर बैठा हुआ हूँ और मेरी चकवी मेरे पार्श्व में बैठी रास-विहार को देख रही है। चकवे को विस्मय हो रहा था कि रात हो गयी है, इसके बाद भी मेरी चकवी मेरे समीप है। विधाता के विधान के अनुसार इसे अलग हो जाना चाहिये था। विधाता को मैं सदा ही कोसता रहता हूँ कि उसने यह क्या विधान बनाया कि चकवी रातभर के लिये चकवे से अलग हो जाया करती है। प्रिय का विलग हो जाना कितना प्रपीड़ित करता है, यह वह विधाता क्या जाने? घायल ही घायल के मर्म को जान पाता है। आज विधाता के विधान में यह अपवाद कैसे हो गया?

चकवा अपने अन्तर के विस्मय को छिपा नहीं पाया। वह समीप बैठी अपनी चकवी से पूछ बैठा- आज यह कैसे सम्भव हो गया कि सूर्यास्त के बाद चकवी-चकवा का जो पारस्परिक बिलगाव हुआ करता है, वह इस समय नहीं हुआ? अब तो आधी रात होने को आयी और तुम तब से अब तक सतत मेरे पास हो। यह कैसे हो गया?

चकवी ने अनुमान लगा लिया कि इसे अभी श्रीप्रिया-प्रियतम के रसराज्य के अनोखेपन का परिज्ञान नहीं है। चकवी ने बतलाना आरम्भ किया- वह देखो, श्रीयमुनाजी के मन्थर प्रवाह की ओर। तट के समीप कितने कमल खिले हुए हैं! कमल भी अनेक रंग के हैं। क्या रात को कमल खिलते हैं? सूर्यास्त होते ही इन कमलों को सम्पुटित हो जाना चाहिये था, परन्तु रास-विहार की दिव्य लीला के अनुरूप आकर्षक वातावरण के निर्माण के लिये ये कमल तनिक भी संकुचित या सम्पुटित नहीं हुए, अपितु पूर्ण रूप से विकसित हैं। यहाँ क्या विधाता के विधान का किसी भी रूप में कोई अनुशासन है? सत्य तो यह है कि वह विधाता और उसका वह विधान ही यहाँ के अनुशासन से अनुशासित रहता है, सदा संकुचित रहता है। उस विधि-विधान का इस लीला-राज्य में प्रवेश ही नहीं। दिव्य लीला के रसोत्कर्ष में जो भी आवश्यक होगा, वह सब यहाँ होगा और देखो, जिस वृक्ष पर हम दोनों बैठे हैं, उस वृक्ष के मूलभाग की ओर देखो।

चकवी के कहने पर वह चकवा, जो श्रीयमुनाजी में विकसित कमलों को साश्चर्य देख रहा था, उस चकित चकवे ने पुनः साश्चर्य देखा कि वृक्ष के मूलभाग में एक बड़े सर्प के फैले फण पर एक मेढक बैठा है। मेढक को सर्प के फण पर बैठे हुए देखकर चकवा चकित स्वर में बोल पड़ा- मेढक तो सर्प का भोजन है। भक्ष्य मेढक से सर्प को इतना प्यार?

चकवी ने फिर समझाना आरम्भ किया- विधाता की त्रिगुणात्मक सृष्टि में मेढक सर्प का भक्ष्य हो सकता है, परन्तु श्रीप्रिया-प्रियतम के इस त्रिगुणातीत प्रेम-राज्य में वह मेढक भी सर्प के द्वारा लाल्य है। मेढक को सर्प ने अपने फण पर इसलिये बैठा रखा है कि वह ऊँचे बैठकर भली प्रकार से रास-विहार का दर्शन कर सके। तुम यह मान लो, पूर्णतः मान लो कि ब्रह्मा की जड़-चेतनात्मक, गुण-दोषमय सृष्टि के संचालन संतुलन के लिये विधि-निषेध के विविध नियम ब्राह्मी सृष्टि का नियमन नियंत्रण भले करते रहें, परन्तु श्रीप्रिया-प्रियतम का नित्य निर्विकार और नितान्त निर्मल निकुञ्ज राज्य उन विविध नियमों की नियमन परिधि से सर्वथा परे है। यहाँ निकुञ्ज-राज्य में वही होगा, जो प्रीति का पोषक हो, जो परसुख प्रदायक हो और जो श्रीप्रिया-प्रियतम की रस-रीति के उत्कर्ष में सहायक हो। तभी तो तुम मेरे पास हो, मैं तुम्हारे पास हूँ, तभी रात में भी कमल विकसित होते हैं और सर्प भी मेढक से प्रीति रखता है।

विस्मय में डूबा चकवा सिहर-सिहरकर बोल उठा श्रीप्रिया-प्रियतम के इस अनोखे रस-राज्य की जय हो, सदा जय हो, इसकी बार-बार बलिहारी

🙏🙏 राधे श्याम जी 🙏🙏
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Wednesday, June 18, 2025

घन श्याम मोहन और श्याम घन मोहन मानसिक रूप-लीला चिंतन 32

घनश्याम और श्याम घन

राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा.....

सावन मास की लुभावनी रात। अभी मध्य रात्रि में पर्याप्त देर है । निकुञ्ज-भवन के बरामदे में मखमली बिछावन बिछा हुआ है। बरामदे के सामने प्रकृति का उन्मुक्त प्रांगण है। मखमली बिछावन पर श्रीप्रिया-प्रियतम विराज रहे हैं। अपने प्रियतम को रिझाने के लिये श्रीप्रियाजी आलाप कर रही हैं। आस पास बैठी हुई सखियाँ-मञ्जरियाँ-सहचरियाँ भी श्रीप्रियाजी की आलापचारी को उत्कण्ठापूर्वक सुन-सुनकर विभोर हो रही हैं। अमावास्या की तिथि होने से सर्वत्र अँधेरा है। इस अँधेरे का भी एक आकर्षण हैं। इसके कजरारेपन में भी एक सलोनापन है। श्रीप्रियाजी हैं ही श्याम-प्रेमिका। श्रीप्रियाजी की रुचि को देखकर ही अति मन्द प्रकाश का विकास करने वाले मणि-दीपक प्रज्वलित किये गये हैं।

आकाश में श्याम मेघ छाये हुए हैं। बस, वे छाये हैं, परन्तु बरस नहीं रहे हैं। सावन मास की अँधेरी रात के समय कजरारे बादलों को देखकर श्रीप्रियाजी ने मल्हार राग की रागिनी छेड़ दी। समीपस्थ श्रीललिताजी वीणा पर स्वर दे रही हैं। श्रीप्रियतम भी सुर में सुर मिलाते हुए वंशी-वादन कर रहे हैं।

सारे वातावरण में राग-रंग छाया हुआ है। राग की रागिनी से सभी का मन तरंगित है। श्रीप्रियतम का मन भी तरंगित है, परन्तु इस तरंग के साथ ही उनके मन में एक कसक भी है। श्रीप्रियतम के मन में घनी कसक है कि श्रीप्रियाजी की मुखछवि का दर्शन नहीं हो पा रहा है। एक तो सावन की अमावास्या वाली अँधियारी और फिर मणि दीपक का प्रकाश भी अति मन्द।

सभी आनन्द में निमग्न हैं, विभोर हैं। श्रीप्रियाजी उमंग में भरकर गायें और फिर आनन्द उमड़ न पड़े, यह भला कैसे हो सकता है? आनन्द का सागर उमड़ रहा है, उफन रहा है और उस सागर की लहरों पर सभी लहरा रहे हैं। बस, थोड़ी-सी कसर है। वह कसर है कसक के रूप में, जो व्याप्त हो रही है प्रियतम श्रीश्यामसुन्दर के अन्तर में।

इन घनश्याम के अन्तर की चुभती कसक संक्रमित हो गयी उन नभचारी श्यामघन के अन्तर में और तभी घने श्यामल मेघों के मध्य बिजली कौंधी। विद्युल्लता के चमकते ही प्रकाश में चमक उठी भावलतिका श्रीप्रियाजी की मुख-कान्ति। इसी मुख-शोभा के ही तो प्यासे थे श्रीश्यामसुन्दर के कजरारे नयन। श्रीप्रियतम के नयनों में छा गयी उल्लाससनी आनन्द की रेखाएँ। उल्लसित-आनन्दित श्रीश्यामल प्रियतम के अन्तर का आह्लाद भी संक्रमित हो उठा उन नभचारी बादलों के अन्तर में और आहलादातिरेक में वे भी मन्द मन्द गर्जन करने लगे। मन्द मन्द गर्जन भी सोद्देश्य है। तीव्र गर्जन से तो श्रीप्रियाजी की राग-रागिनी के उल्लास में व्यवधान उपस्थित हो जाता। इस मन्द गर्जन ने भी उद्दीपन का ही कार्य किया। पावस ऋतु के इस लुभावने-सुहावने रंगभरे वातावरण ने श्रीप्रियाजी के अन्तर में अधिकाधिक उमंग उद्दीप्त कर दी। निकुञ्ज के बरामदे में अद्भुत समाँ बँध गया।

नभ के श्यामल मेघ रह-रह करके श्रीप्रियाजी के उमंग की और श्रीप्रियतम के आह्लाद की जयकार मना रहे हैं और विद्युल्लता रह-रह करके बलिहार जा रही है इन युगल रसिकों के उमंग पर, आह्लाद पर।

राधे राधे 
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Monday, June 9, 2025

नेत्रहीन संत

*🌹🌹!! नेत्रहीन संत !!🌹🌹*

*एक बार एक राजा अपने सहचरों के साथ शिकार खेलने जंगल में गया था। वहाँ शिकार के चक्कर में एक दूसरे से बिछड़ गये और एक दूसरे को खोजते हुये राजा एक नेत्रहीन संत की कुटिया में पहुँच कर अपने बिछड़े हुये साथियों के बारे में पूछा।*

*नेत्र हीन संत ने कहा महाराज सबसे पहले आपके सिपाही गये हैं, बाद में आपके मंत्री गये, अब आप स्वयं पधारे हैं। इसी रास्ते से आप आगे जायें तो मुलाकात हो जायगी। संत के बताये हुये रास्ते में राजा ने घोड़ा दौड़ाया और जल्दी ही अपने सहयोगियों से जा मिला और नेत्रहीन संत के कथनानुसार ही एक दूसरे से आगे पीछे पहुंचे थे।*

*यह बात राजा के दिमाग में घर कर गयी कि नेत्रहीन संत को कैसे पता चला कि कौन किस ओहदे वाला जा रहा है। लौटते समय राजा अपने अनुचरों को साथ लेकर संत की कुटिया में पहुंच कर संत से प्रश्न किया कि आप नेत्रविहीन होते हुये कैसे जान गये कि कौन जा रहा है, कौन आ रहा है ?*

*राजा की बात सुन कर नेत्रहीन संत ने कहा महाराज आदमी की हैसियत का ज्ञान नेत्रों से नहीं उसकी बातचीत से होती है। सबसे पहले जब आपके सिपाही मेरे पास से गुजरे तब उन्होंने मुझसे पूछा कि ऐ अंधे इधर से किसी के जाते हुये की आहट सुनाई दी क्या ? तो मैं समझ गया कि यह संस्कार विहीन व्यक्ति छोटी पदवी वाले सिपाही ही होंगे।*

*जब आपके मंत्री जी आये तब उन्होंने पूछा बाबा जी इधर से किसी को जाते हुये..... तो मैं समझ गया कि यह किसी उच्च ओहदे वाला है, क्योंकि बिना संस्कारित व्यक्ति किसी बड़े पद पर आसीन नहीं होता। इसलिये मैंने आपसे कहा कि सिपाहियों के पीछे मंत्री जी गये हैं।*
*जब आप स्वयं आये तो आपने कहा सूरदास जी महाराज आपको इधर से निकल कर जाने वालों की आहट तो नहीं मिली तो मैं समझ गया कि आप राजा ही हो सकते हैं। क्योंकि आपकी वाणी में आदर सूचक शब्दों का समावेश था और दूसरे का आदर वही कर सकता है जिसे दूसरों से आदर प्राप्त होता है। क्योंकि जिसे कभी कोई चीज नहीं मिलती तो वह उस वस्तु के गुणों को कैसे जान सकता है!*

*दूसरी बात यह संसार एक वृक्ष स्वरूप है- जैसे वृक्ष में डालियाँ तो बहुत होती हैं पर जिस डाली में ज्यादा फल लगते हैं वही झुकती है। इसी अनुभव के आधार में मैं नेत्रहीन होते हुये भी सिपाहियों, मंत्री और आपके पद का पता बताया अगर गलती हुई हो महाराज तो क्षमा करें।*

*राजा संत के अनुभव से प्रसन्न हो कर संत की जीवन व्रत्ति का प्रबंन्ध राजकोष से करने का मंत्री जी को आदेशित कर वापस राजमहल आया।*

शिक्षा:-

*आजकल हमारा मध्यमवर्ग परिवार संस्कार विहीन होता जा रहा है। थोड़ा सा पद, पैसा व प्रतिष्ठा पाते ही दूसरे की उपेक्षा करते हैं, जो उचित नहीं है। मधुर भाषा बोलने में किसी प्रकार का आर्थिक नुकसान नहीं होता है। अतः मीठा बोलने में कंजूसी नहीं करनी चाहिये।*

🙏🙏

Wednesday, April 2, 2025

श्री कृष्ण-उद्धव संवाद 3

आज के विचार

!! उद्धव प्रसंग !!

{ "कृष्ण का प्रेम वैचित्र अवस्था" - उद्धव प्रसंग }

भाग-3

गच्छोद्धव ब्रजम् सौम्य...   (श्रीमद्भागवत)

मेरे गुरु बृहस्पति जी ने मुझ से कहा था... कृष्ण पूर्णब्रह्म हैं ।

इसीलिए तो मेरा उस देवलोक में भी इतना सम्मान हुआ... 

मैं ही तो था उस देवलोक में विद्याध्यन के लिए पहुँचा एक मानव ।

पर मेरा कितना सम्मान किया... समस्त देवों ने ।

और तो और... स्वयं मेरे गुरुदेव बृहस्पति ने... अपने आसन से उठकर मुझे हृदय से लगा लिया था ।

कई दिनों के बाद एकान्त पाकर मैंने अपने गुरु बृहस्पति से जब इसके बारे में पूछा... तो उनका उत्तर यही था... परब्रह्म श्री कृष्ण तुम्हारे मित्र हैं... और उद्धव ! मेरा भी यह परमसौभाग्य है कि पूर्णपुरुषोत्तम श्री कृष्ण के प्रिय मित्र का गुरु... मैं बन रहा हूँ ।

मेरे गुरु बृहस्पति ने मुझ से ये सब कहा था... और मेरे गुरुदेव की वाणी मिथ्या कैसे हो सकती है ।

पर पूर्णब्रह्म आज बिलख रहा है !...पुरुषोत्तम आज नयनों से अविरल अश्रु बहा रहा है !

और वो भी गवाँर गोपियों के लिये ?

उद्धव कृष्ण के चरणों में बैठे हैं... रात्रि हो गयी है ।

यमुना से कृष्ण का हाथ पकड़ कर... सम्भालते हुए लेकर आये हैं उद्धव ।

पर आते ही बिना कुछ भोजन किये कृष्ण सो गए थे ।

कुछ देर तक तो उद्धव चरण दबाते रहे... पर नींद में खलल न पड़े... ऐसा सोचकर... चादर ओढ़ा कर वहीं बैठे रहे थे उद्धव ।

मुखारविन्द देखते रहे कृष्ण का... उद्धव ।

आत्माराम आप्तकाम परब्रह्म पूर्णपुरुषोत्तम...श्री कृष्ण इतने विह्वल !

गोपियों के लिये... गवाँर गोपियों के लिए ? 

नही... कल सन्ध्या में यमुना के किनारे मैंने गोपियों के लिए "गवाँर" शब्द का प्रयोग किया... तो कृष्ण रुष्ट हो गए थे ।

अनपढ़ कह सकते हो उद्धव !... पर गवाँर मत कहो... 

कितनी आत्मीयता से कहा था कृष्ण ने... कितनी आत्मीयता है उन गोपियों के प्रति कृष्ण की ।

क्या है ऐसा उन गोपियों में ? 

उद्धव यही सोचते हुये... चरणों में बैठे हैं... अर्धरात्रि हो गयी है ।

मैया ! 

यही पुकारा था... एकाएक नींद में ही कृष्ण ने यही पुकार लगाई थी ।

कोई स्वप्न देख लिया शायद कृष्ण ने... उद्धव ने मुखारविन्द पोंछा कृष्ण का... पसीने जो आगये थे... उन नीलमणी कृष्ण के ।

मैया ! 

 इस बार हँसे थे... कृष्ण ।

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कन्हैया ! 

 अर्ध रात्रि में चिल्ला उठी थी वृन्दावन में मैया यशोदा ।

अपने अगल बगल टटोला था... हाथों से... पर नही है बगल में कृष्ण तो... उठीं मैया...... कहाँ गया कन्हैया ? 

दीया जलाया... अर्धरात्रि में यशोदा ने ।

अरे ! यहाँ तो नही है... 

फिर थोड़ी सहज हुयीं... अच्छा ! रात में अपने पिता नन्द के पास जाकर सो जाता है ना !... हाँ... वहीं गया होगा ।

यशोदा गयीं नन्द महाराज के पास ।

अरे ! यहाँ भी नही है कन्हैया तो । नन्द महाराज के पास में जब देखा... नही है वहाँ भी कृष्ण... तो घबड़ा गयीं ।

क्या खोज रही हो यशोदा ? 

नन्द बाबा को भी कहाँ नींद है !

अपना कन्हैया कहा गया ?

मेरे पास भी नही है... और आपके पास भी नही है... वैसे इतनी रात्रि को तो वो कहीं जाएगा नही ।

घबड़ा रही हैं यशोदा ।

कहीं कंस के राक्षस तो ? भयभीत है यशोदा ।

अपने आँसुओं को पोंछते हुए... उठकर बैठ गए महाराज नन्द ।

यशोदा बैठो यहाँ... अपने पास बैठाया यशोदा को नन्दराय ने ।

 !...वो अभी उठ कर अपनी छोटी गौ के पास गया होगा । यशोदा ने कहा । 

यशोदा वह तो मथुरा के महल में है।.... नन्द राय ने कहा ।

ओह !...यशोदा हँसी... पर हँसी के साथ साथ... उसके नयनों के पनारे भी खुल गए थे ।

हाँ... मैं भी पागल हूँ... मुझे अभी भी इसी जगह वह दिखाई देता है... मेरे कानों में अभी भी... उसकी वही किलकारियाँ गूँजती रहती हैं ।

सुनो ! नन्द जी !...वो आएगा ना ? 

बताओ ना ? मेरा कन्हैया फिर आएगा ना ? 

इस वृन्दावन में आएगा ना ? 

अपनी इस बूढ़ी मैया को देखने आएगा ना ?

उसने कहा था... वो आएगा...वो आएगा... वो आएगा ।

यशोदा मूर्छित हो गयीं थीं ये कहते हुए ।

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मैया ! 

नींद में जोर से बोलते हुए कृष्ण एकाएक उठ गए ।

अपने अगल बगल में देखा... मैया ! पर यहाँ तो कोई मैया नही है... आँखों को मलते हुए... कृष्ण ने जब ध्यान से सामने देखा तो उद्धव थे ।

कौन ? मनसुख ? 

नही... मैं उद्धव ।

ओह ! मैं मथुरा में हूँ... कृष्ण के आँसू फिर बह चले थे ।

कुछ देर कृष्ण ऐसे ही बैठे रहे... 

फिर बोले - उद्धव ! तुम जाओ ना... मेरे वृन्दावन जाओ ना !

बोलो... जाओगे ना ? 

हाँ...नाथ ! आपकी हर आज्ञा शिरोधार्य है ।

उद्धव ने कहा ।

सुनो ! तुम जाकर मेरे माता पिता को समझाना... उनको कहना क्यों याद करते हो ! 

और मेरी गोपियों को भी समझाना... उनको समझाना ।

और उद्धव ! अपने दोनों हाथों से उद्धव का बायां हाथ पकड़ कर कृष्ण ने दबाया था । समझाना… कहना - वो क्यों मुझे याद करती हैं... ? कहना - उनका कन्हैया तो उनको बिलकुल याद नही करता... कृष्ण ने जैसे ही ये कहा... उद्धव ने कृष्ण की आँखों में देखा... नजरें झुका ली थी कृष्ण ने ।

क्या सच में आप याद नही करते वृन्दावन को... और वहाँ के वासियों को ?

कृष्ण उद्धव के गले लग गए... और हिलकियों से रो पड़े... नही करता मैं उन्हें याद... बिलकुल नही करता ।

फिर ये सब क्या है भगवन् ? 

उद्धव ने गम्भीर होकर पूछा ।

आप रो रहे हैं ? 

आपके नेत्रों में अश्रु ? 

नाथ ! ये सब तो झूठ है... मिथ्या है... मिलन वियोग सब मिथ्या है ।

फिर ये सब आँसू क्यों बहाना ? उद्धव ने पूछा कृष्ण से ।

हाँ... हाँ... बहुत बढ़िया उद्धव ! बस... यही बात उनको जाकर समझाओ... कृष्ण ने उद्धव के कन्धे में हाथ रखते हुए कहा ।

तुम बहुत अच्छा बोलते हो... उद्धव ! तुम तो बृहस्पति के शिष्य हो ना... ज्ञानियों में सर्वश्रेष्ठ है मेरा उद्धव... तुम जो जो मुझे कह रहे हो ना... ये सब उनको जाकर समझाना... उन वृन्दावन के लोगों को ।

कृष्ण बोले जा रहे हैं... ।

मेरी "राधा" को भी कहना... 

पर इतना कहते हुए कृष्ण रुक गए... ।

क्या कहोगे मेरी राधा से ? 

उसे तो कोई गिलाशिकवा ही नही है मुझ से ।

मैं जब वृन्दावन से चला था ना... तो मैंने उससे कहा... मुझे जाना पड़ेगा राधे ! मथुरा ।

कुछ नही बोली थी वो... उद्धव ! मैंने उसे झकझोरा... उसे कहा मैंने... राधे ! कुछ तो बोलो ।

तब बड़ी मुश्किल से इतना ही बोली थी... प्यारे ! तुम्हारी ख़ुशी में ही मेरी ख़ुशी है... मेरी चिन्ता मत करो... जाओ ! ।

तुम आओगी मथुरा ? 

मैंने राधा से पूछा था उद्धव ।

तब राधा ने कहा था... नही आऊँगी मैं मथुरा ।

क्यों ? कृष्ण ने आश्चर्य से पूछा ।

मेरे लिए मेरा तुम्हारा प्रेम ही सब कुछ है... मथुरा में तुम्हारा राजसी भेष रहेगा… तुम्हारी राजवी व्यवस्था देखकर... और हम लोग तो वन में रहने वाले हैं... हमारा प्रेम तो इसी वृन्दावन में ही पल्लवित और पुष्पित हुआ है... और यहीं होगा ।

हमारे मथुरा जाने से... रस में कमी आ जायेगी... प्रेम का अभाव खटकेगा । 

नही... बाँसुरी तुम्हारी मथुरा में नही बज सकती... वो तो यहीं वृन्दावन में ही बजेगी प्यारे ! 

तुम जाओ... हमारा प्रेम स्वार्थ का नही है... निस्वार्थ है ।

तुम जिसमें खुश हो... हम भी उसी में खुश हैं ।

"राधा"

कहते हुये... फिर कृष्ण उद्धव के अंक में गिर पड़े थे ।

*******************************************************

उद्धव ! तुम जाओ ना ! 

जब कुछ होश आया कृष्ण को... तब कृष्ण ने उद्धव से फिर कहा ।

उपदेश करना वृन्दावन के लोगों को... तुम तो सब जानते हो ना !

उनको समझाना... उद्धव ! मैं इतना बिलख रहा हूँ... तो इसका कारण ही ये है कि... वो लोग तो दिन रात मेरी याद में तड़फ़ रहे होंगे... उनको अगर मेरी याद नही आती… तो मुझे भी नही आती उद्धव ।

मेरी आज ये जो स्थिति है... इससे कहीं ज्यादा प्रेमावेश की स्थिति उन वृन्दावन के लोगों की होगी ।

वो एक क्षण का वियोग भी नही सह पाते थे... एक क्षण के लिए भी मैं उनकी आँखों से ओझल हो जाता... तो वो लोग तड़फ़ उठते थे ।

अरे ! उद्धव ! वो गोपियाँ... वो बाबरी गोपियाँ ।

जब मुझे देखती थीं... और देखते देखते उनके पलक गिरते थे ।

तो वो बाबरी गोपियाँ अपने पलकों को काटने के लिए तैयार हो जातीं ।

इतना विलक्षण प्रेम है उनका ।

उद्धव ! तुम जाओ । कृष्ण ने उद्धव से फिर कहा ।

पर मेरा वैदुष्यपूर्ण सम्वाद वो समझ पाएंगी ? 

उद्धव का अहंकार थोड़ा दिखाई दिया... इस वक्तव्य में ।

विद्वान उसे कहते हैं... जो अनपढ़ को भी अपनी बातें समझा दे ।

तुम समझा सकते हो... उद्धव ! मेरी वो गोपियाँ भी बहुत समझदार हैं... वो सब समझती हैं ।

तुम जाओ... उद्धव ! तुम जाओ ।

कृष्ण ये कहते हुये उद्धव से लिपट गए थे ।

शेष चर्चा कल... 

कहा श्री कृष्ण ने उद्धव से, वृन्दावन जरा जाना,
वहाँ की गोपियों को ज्ञान का कुछ तत्व समझाना...
विरह की वेदना में वो सदा बेचैन रहती हैं 
तड़फ़ कर आह भरकर के सदा वो यों ही कहती हैं।
हा कृष्ण..... हा कृष्ण.... हरे कृष्ण ... हरे कृष्ण...

Monday, March 31, 2025

श्री कृष्ण-उद्धव संवाद २

आज के विचार

!! उद्धव प्रसंग !!


{ "कृष्ण के आँसू और आह" - उद्धव प्रसंग }
भाग-2

ता मन्मनस्का मत्प्राणा मदर्थे त्यक्तदैहिकाः..
(श्रीमद्भागवत)

आँसू और आह !... 

श्री कृष्ण ज़रा सम्भल तो ले ... 

पर ... ये आँसू मानेंगे नही... स्वयं बहेंगे और बचा कुचा जो भी है... उसको भी हृदय से ले बहेंगे ।

पाप ही नही... पुण्य भी... अच्छा बुरा सब... वहाँ तो अब विरह का राज्य होने वाला है... और विरह के आगे सब बौने हैं... ।

प्रेम का विरह अग्नि के समान है... आपको पता है ना ? 

उसमें ये रुई जैसे संस्कार जलकर भस्म हो जाते हैं ।

क्यों कि प्रेमी के साँसों की हवा उस आग को और भी प्रज्वलित कर रही है... पर ये शरीर जल नही पाता... कैसे जले... ये स्वार्थी नयन जल बरसाते रहते हैं... उफ़ !... न पूरी तरह जल सके... न पूरी तरह बुझ ही सकें । सुलगते रहे... सुलगते रहे ।

कृष्ण की यही दशा हो रही है... आज मथुरा में ।

आ तो गए कृष्ण अपनी प्रेम भूमि वृन्दावन को छोड़कर... मथुरा ।

पर रह रहकर... यादों में वृन्दावन आरहा है कृष्ण के ।

ये विरह आपके पाप ताप को मिटा देगा... सच मानिये ।

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उद्धव ! शाम हो गयी है... चलें यमुना किनारे !

उद्धव का हाथ अपने हाथों में लेकर कृष्ण व्याकुल स्वर में बोल उठे थे ।

हाँ... चलिये... पर उद्धव भी समझ नही पा रहे... कि कृष्ण को हुआ क्या ?... इतनी व्याकुलता क्यों ? 

ये जीवन है... इसमें संयोग वियोग तो चलता ही रहता है ना ! 

किसी से संयोग होता है... और किसी से वियोग... यहाँ लोग मिलते ही इसलिये हैं कि कल बिछुड़ना पड़ेगा... ।

यही जीवन का सत्य है... मुझे पता है… पर मेरे सर्वेश्वर श्री कृष्ण ये आज क्या कह रहे हैं ?

उद्धव समझ ही नही पा रहे ।

उद्धव चलो !... पीताम्बरी अपने कन्धे में डाल कर... महल से निकल पड़े थे कृष्ण ।

कृष्ण के अंग रक्षक साथ में चलने लगे तो कृष्ण ने उद्धव से कहा- 

उद्धव ! इनको कह दो... मुझे इनकी जरूरत नही है ।

पर आपको ले जाना पड़ेगा इन अंगरक्षकों को… क्यों कि हमारे पास गुप्तचरों से ये सूचना मिली है कि... युवराज कंस की विधवा पत्नियां अपने पिता जरासन्ध के यहाँ हैं... और जरासन्ध बड़े युद्ध की तैयारी में लगा है ।

अक्रूर ने आकर ये सारी बातें कृष्ण को कहीं... ।

कृष्ण कुछ नही बोले... और उद्धव का हाथ पकड़े यमुना की ओर चल पड़े थे ।

मार्ग में जो भी मिलता था... मथुराधीश श्री कृष्ण चन्द्र महाराज की जय !

यही बोलता था ।

यहाँ कोई "कन्हैया" नही कहता... भावुक हृदय से कृष्ण ने सोचा ।

जयजयकार है... पर वृन्दावन जैसा प्रेम नही है ।

माँ देवकी और रोहिणी माँ ने मेरी सेवा के लिए दास दासियाँ लगा दिए हैं... 

पर यशोदा मैया कहाँ है ?

पकवान रख दिए जाते हैं... मेरे सामने... पर खिलाने वाले वो यशोदा के हाथ तो नही हैं ना !...वो हाथ, जो मुँह में खिलाते खिलाते... जब मैं मना करता था... "पेट भर गया मैया"... तो वही हाथ मेरे पेट को दबाते थे ।

अभी कहाँ पेट भरा कन्हैया ?

कितना खाली है पेट ।

और खा… इतने से क्या होगा ? 

सब है मथुरा में… पर वो प्रेम नही है ।

यमुना के किनारे आगये थे कृष्ण... ये सब सोचते हुये ।


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उद्धव ! यही है वो यमुना... इसी के किनारे हम लोग शाम को बैठते थे... गोपियाँ आती थीं... 

ये कहते हुए कृष्ण के नेत्र फिर बह चले थे ।

उद्धव ! देखो... वो दीया... एक दीया बहता हुआ आगया था यमुना में...... कृष्ण उस दीया को देखते ही दौड़ पड़े... ।

उद्धव ! ये दीया मेरी उस गोपी ओर मेरी राधा ने जला कर भेजा है... कृष्ण व्याकुल हो उठे ।

अभी भी बैठे होंगे... वृन्दावन के सब लोग यमुना के किनारे... पर मेरे बिना वो लोग कैसे होंगे ?

मैं कृष्ण, स्वयं उनके विरह में इस तरह से तड़फ़ रहा हूँ... तो उन लोगों की क्या दशा होगी ?

उद्धव ! वो लोग मुझसे बहुत प्रेम करते हैं... उद्धव ! मेरे बिना वो लोग कैसे जीते होंगे ना ? 

और मेरी वो बृज गोपियाँ... मुझे बिना देखे उन्हें चैन नही आता था ।

वो किसी न किसी बहाने से मेरे घर में आजाती थीं... और मैया यशोदा से शिकायत करतीं... मैया उनकी शिकायत पर जब मुझे पीटने लगतीं... तो वो हाथ जोड़कर कहतीं - मारो मत ! 

बस समझाओ । 

...उद्धव ! मेरे साथी... मेरे मित्र लोग... 

और मेरी वो राधा !... ये कहते हुए कृष्ण ने आह भरी थी ।

कृष्ण के अविरल अश्रु बहते जा रहे हैं ।

पर आपको चाहने वाले मथुरा में भी बहुत हैं... यहाँ किसी वस्तु की कमी तो नही है ना ? 

उद्धव ने इतना अवश्य कहा ।

ना ! कोई कमी नही है... एक इशारे में मेरे लिए सब सेवक दौड़ पड़ते हैं... चारों ओर से "मथुराधीश श्री कृष्ण चन्द्र महाराज की जय"... बस यही सुनाई देता है ।

पर वहाँ का जैसा प्रेम यहाँ नही है ।

वहाँ की आत्मीयता कहाँ है यहाँ ? 

हजारों दास दासियों के होते हुए भी मेरी मैया यशोदा अपने हाथों से मेरे लिए माखन निकालती थीं । ब्रजेश्वरी थीं मेरी मैया यशोदा...बृज की महारानी कही जाती थी... और बृज के राजा थे.. मेरे बाबा नन्द... और मैं उनका लाडला कन्हैया ।

मेरा काम कभी सेवक और सेविकाओं से नही करवाया मेरी मैया ने ।

पर यहाँ... उद्धव ! कोई तुलना ही नही है मित्र ! मथुरा और वृन्दावन की... मथुरा में ऐश्वर्य है... भरपूर ऐश्वर्य है... पर वृन्दावन में माधुर्य है... मिठास है... मधुरता है ।

उद्धव ! मुझे वृन्दावन भुलाये नही भूल रहा... मैं क्या करूँ ? 

कृष्ण ने ये कहते हुए... अपना सिर उद्धव के काँधे पर रख दिया था ।

************************************************

यमुना के किनारे जल भरने सब गोपियाँ आज आई हैं ।

पर कोई किसी से कुछ नही बोलती... क्या बोले ? 

सबकी आँखें सूजी हुयी हैं... रात भर रोती रहेंगी तो यही होगा ।

मटकी लेकर बैठ गयीं यमुना के किनारे ।

बैठी रहीं... अपलक नेत्रों से यमुना को देखती रहीं ।

हाँ... एक सखी ने कहना शुरू किया... 

यही यमुना मथुरा गयी है ना... और हो सकता है... यमुना के किनारे खड़े होकर वो भी हमें याद कर रहा होगा ।

हाथ जोड़कर यमुना के सामने खड़ी हो गयी... वो सखी ।

हे यमुने ! कृष्ण से पूछना... कब आओगे ? 

जल्दी आओ… नही तो मुझ यमुना की बाढ़ में समूचा बृजमण्डल डूब जायेगा… ऐसा कहना ।

मेरे हृदय की पीर कहना… पर ये आँसू कितने बहते हैं... ये मत कहना ।

हे यमुने ! ये कहना - तुम्हारी गोपियाँ रोज दीया जलाती हैं... और पहले की तरह इसी यमुना में छोड़ भी देती हैं... पर अब दीया ही नही जलता... ये दिल भी जलता है... पर यमुने ! इस दिल की बात मत बताना ।

हे यमुने ! कहना उस मथुराधीश से... कुब्जा हमसे सुंदर है क्या ?

वहाँ के लोग हमसे ज्यादा प्रेम करते हैं क्या ?... ।

सब कहना... हे यमुने ! कृष्ण से... पर रोते रोते हमारे कपड़े कितने भींग जाते हैं ये मत कहना ।

हम सबके रोने से… यमुना का जल खारा हो गया है… ये भी मत कहना ।

विष ही भेज दो... प्यारे ! उसी को खा कर हम मर जायेंगी।

*****************************************************

उद्धव ! वो रो रही हैं... यमुना की जल धारा से उनके रोने की आवाज आरही है... ।

कृष्ण विलख उठे इधर यमुना के किनारे ।

उद्धव ! गोपियाँ मेरी प्राण हैं... उन्हें छोड़ कर जो मैं मथुरा में बैठा हूँ ना... वह पीड़ा मात्र मैं ही जानता हूँ ।

किसी भी कार्य में मुझे तनिक भी उत्साह या आनन्द नही है ।

जैसे सांस लेना और छोड़ने की तरह ही मैं यहाँ अपने कर्तव्य कर्म को बस कर रहा हूँ... ।

पर ऐसा क्यों नाथ ! 

उद्धव ने जानना चाहा ।

ऐसा क्या है उन गोपियों में... जो यहाँ मथुरा के भक्तों में नही है !

क्यों कि उन गोपियों ने अपना सर्वस्व मुझ में अर्पण कर दिया है ।

लौकिक कर्म... अपना अच्छा बुरा... पाप पुण्य... धर्म अधर्म सब कुछ मुझ में लगा दिया है... ।

मेरे सिवा उन्हें मुक्ति की भी कामना नही है... और मैं अगर उन्हें नर्क में मिलूं... तो वो हँसते हँसते... नर्क की यात्रा भी कर लेंगी ।

उद्धव ! उन्हें स्वर्ग नर्क ..मुक्ति ..योग ..ज्ञान... किसी से कोई मतलब नही है... उन्हें मतलब है... बस मुझ से... सिर्फ मुझ से ।

जो इस तरह से मुझ में समर्पित हैं... मुझे क्यों न उनकी याद आएं !

और उद्धव ! तुम्हें तो पता ही है... मेरी प्रतिज्ञा है... "ये यथा मां प्रपद्यन्ते तां तथैव भजाम्यहम् " अर्थात... जो मेरा जिस तरह से भजन करता है... मैं भी उसे उसी तरह से भजता हूँ ।

इतना कहकर यमुना की ओर फिर देखने लगे थे कृष्ण ।

*******************************************************

चलो ! शाम हो गयी... घर चलो !

एक गोपी ने अपने आँसू पोंछते हुए कहा... ।

हाँ... चलो ! सबने अपनी अपनी मटकी उठाई... और चल पड़ीं ।

हवा भी चले तो गोपी तुरन्त मुड़कर पीछे देखती है... कहीं कृष्ण तो नही आया !

पत्ता भी हिलता है... तो गोपी रुक जाती है... कहीं कृष्ण तो नही आरहा... दबे पाँव ।

गोपी बारम्बार अपनी मटकी को सम्भालती है... कहीं उसकी मटकी कृष्ण ने फोड़ तो नही दी ।

घर आगयीं सब सखियाँ... अपने अपने घर ।

बहू जल भर कर ले आई ? सास ने पूछा ।

कुछ बिना बोले... घर की रसोई में जाकर जल का वह पात्र रख दिया ।

बहू ! आज 10 दिन हो गए... तू बोलती क्यों नही है ?

कृष्ण को इतना याद मत कर ।

सासू माँ के गले लगकर रो पड़ी वो बहू ।

माँ ! उन दिनों रोज मेरी मटकी फूटती थी... वो नटखट रोज मेरी मटकी फोड़ देता था... पर मुझे आनन्द आता था... मुझे प्रसन्नता होती थी... तुम डाँटती थीं... पर मेरा हृदय आनन्द की हिलोरें ले रहा होता था... मुझे बहुत खुशी होती कि... कृष्ण ने मेरी मटकी फोड़ी... मेरी छाती चौड़ी हो जाती ।

पर माँ ! आज मेरी मटकी फोड़ने वाला कोई नही है... आज मेरी मटकी साबूत आगयी... पर मुझे आज बहुत दुःख हो रहा है... 

मुझे रोना आरहा है... माँ ! काश ! वो फिर आजाता... और मेरी मटकी फिर फोड़ देता ।

पर अब वो नही आएगा... हम लोगों ने उसे बहुत सताया है ना... इसलिये अब नही आएगा ।

माँ ! आज मेरे पैरों में काँटा गढ़ गया... 

मैं बैठ गयी... 

उन दिनों मेरे पैर में जब काँटा लग जाता था ना... तो कृष्ण ही आकर अपने हाथों से निकाल देता था ।

पर... आज काँटा निकालने वाला कोई नही था माँ !

मैं वहीँ बैठी बैठी रोती रही... ।

इतना ही बोला गया इस सखी से... फिर तो बेहोश ही हो गयी थी ।

******************************************************

उद्धव ! ये बृज गोपियां मेरी प्राण हैं... मुझ कृष्ण की ही आत्मा हैं ।

वे गोपियाँ मेरे सिवा किसी को नही जानतीं... और मैं भी उनके सिवा किसी को नही जानता ।

पर मैं अपने वचन में दृढ़ नही रह सका... उद्धव !

रो पड़े फिर कृष्ण ।

किस वचन में आप दृढ़ न रह सके नाथ !

उद्धव ने पूछा ।

गोपियां मेरी अनन्य हैं... पूर्ण अनन्य ।

पर मेरा व्रत था... कि जो मुझे जैसा भजेगा... मैं भी उसे वैसा ही भजूँगा... पर गोपियों ने मुझे अनुत्तीर्ण कर दिया... ।

वो अनन्य हैं... पर मैं अनन्य कहाँ हूँ ?

ओह ! वो तो मेरे सिवा किसी को न मानती हैं... न जानती ही हैं ।

जो भी है... उनका मैं ही हूँ... बस मैं ।

ना मैं देखूँ और को, ना तोहे देखन देउँ...।

उद्धव को गले से लगा कर कृष्ण खूब रोये... खूब रोये ।

🙏🙏🌹राधे श्याम 🌷 🙏🙏

शेष चर्चा कल... 

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