आज के विचार
( प्रीत की यह कैसी नई रीत है.....)
!! बृज रस- भाग 3 !!
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प्रेम सीधी चाल चलता कहाँ हैं ! ....प्रेम की नदी सीधी बहती कहाँ है !
प्रेम नगरी में रोना, हँसनें को कहते हैं........और हँसना यानि रोना ।
प्रेम पन्थ में "ना" यानि "हाँ".....और हाँ का मतलब "ना" ।
प्रेम कुञ्ज में प्रगाढ़ मिलन यानि विरह, और विरह में मिलन की अनुभूति।
ये लीलाएं चल रही हैं निकुञ्ज में......निकुञ्ज यानि श्रीधाम वृन्दावन ।
वृन्दावन यानि 'युग्मतत्व" की विहार स्थली ........जहाँ सत्य और आनन्द मिल रहे हैं .........केलि चल रही है ..........
कब से ?
ये प्रश्न व्यर्थ है.........सृष्टी कब से ? इसका हिसाब फिर भी लगाया जा सकता है .........ब्रह्मा विष्णु शंकर कब से हैं ? इसका भी हिसाब शायद कोई लगा ले ........पर ये ब्रह्म और आल्हादिनी की यह प्रेम केलि कब से ?....सत्य और आनन्द की ये केलि कब से ? .......इसका कोई पता नही ....अनादि काल से चल ही रही है .........और चलती ही रहेगी ......महाप्रलय कितनें हुए ......ब्रह्मा विष्णु महेश कितनें आये और कितनें गए ......पर युगल की ये प्रेम लीला अनवरत चल ही रही है ।
नही नही ....अवतार काल में भी जब पृथ्वी में श्रीराधारानी और श्याम सुन्दर लीला करनें गये थे ........तब भी ये निकुञ्ज की लीलाएं चल ही रही थीं ......ये कभी रूकती नही हैं ।
हाँ हाँ .....एक बात तो सुनो ......"मिले रहत मानों कबहुँ मिले ना" ।
दोनों मिले हैं ......मिले ही रहते हैं .....फिर भी प्यास कम नही होती ।
अद्भुत है ये प्रेम केलि इन युगल की ।
छोड़िये इन गम्भीर चर्चा को .......चलिये - ध्यान में बैठते हैं ..........
और चलते हैं उसी नित्य निकुञ्ज में ......जहाँ बहुत कुछ चल रहा है ।
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श्रीधाम वृन्दावन प्रेम का एक कमल पुष्प है .......उस कमल में जो पीले पीले केशर हैं .......वो सखियाँ हैं .......उन केशरों में जो पराग है ....वह श्री कृष्ण हैं ........और उन पराग में जो मकरन्द है ......वो श्रीराधारानी हैं । इस तरह दिव्य ध्यान कीजिये .........आहा !
प्रातः होनें में कुछ ही समय शेष है.........दिव्य श्रीधाम वृन्दावन है ......प्रेम महल में दोनों युगलवर शयन किये हैं .......
पर ये क्या ! एकाएक श्री श्याम सुन्दर कोई सपना देख - उठे ।
आँखें उनकी मुदीं हुयी हैं ........पर जोर से जोर से पुकार रहे हैं -
हे श्रीराधे ! हे प्राणेश्वरी ! हे प्रियतमें ! आप कहाँ हो ? मुझे छोड़ कर आप कहाँ गयीं ? मेरे प्राण आप में ही बसते हैं ......ये जानते हुए भी आपनें मुझे कैसे छोड़ दिया.....हिलकियाँ छूट गयीं श्याम सुन्दर की ।
मेरे प्राण तड़फ़ रहे हैं.......आप आओ......आप आओ !
बैठ गए हैं श्याम सुन्दर .....उनके कमल नयन से अश्रु गिर रहे हैं.........
पर जैसे ही अपनें समीप में देखा........श्रीजी तो यहीं हैं ........श्रीराधा रानी को अपनें पास में देखकर उनके आनन्द की सीमा नही रही .......अरे ! मन ही मन हँसे .........अब तक जो दुःख के आँसू बह रहे थे वे आनन्दाश्रु के रूप में फिर बहनें लगे थे........".मैं भी बाबरो है गयो ...........मेरी प्यारी ....मेरी प्राण बल्लभा तो यहीं हैं" ।
अपलक देखनें लगे थे........अपनी श्रीराधा रानी को ।
पर श्याम सुन्दर के नेत्रों का ताप अत्यन्त कोमलांगी श्रीराधारानी कैसे सह लेतीं ......उनकी नींद खुल गयी ।
अरे ! प्यारे ! आप उठ गए ? क्या रात बीत गयी ? और हे श्याम सुन्दर ! आप बैठे क्यों हो ? फिर आपके नेत्रों से ये अश्रु ?
श्रीराधा रानी भी उठकर बैठ जाती हैं .....और बड़े प्रेम से कज्जल मिश्रित श्याम सुन्दर के अश्रुओं को अपनें आँचल से पोंछ देती हैं ।
हाँ ......रात्रि तो बीत गयी............बड़ी जल्दी बीत गयी रात्रि !
श्रीश्याम सुन्दर श्रीजी के कपोलों को चूमते हुए बोले थे ।
मेरी राधे ! मैनें एक सपना देखा.........बहुत बुरा सपना था ......
मैने सपना देखा - कि आप मुझ से दूर चली गई हो .......बहुत दूर ......मैं पुकारता हुआ आपके पीछे जा रहा हूँ ...........पर आप बस चली जा रही हो .....मेरी और देखती भी नही हो ..........
इतना कहते हुये फिर श्याम सुन्दर अपनी श्रीजी को हृदय से लगा लेते हैं ........पर ..........श्रीराधा रानी ये सब सुनकर हँसती हैं .........
आप हँस रही हो ? मेरे हृदय की धड़कन तो देखो !
श्रीजी का हाथ लेकर अपनें वक्ष से लगाते हैं श्याम सुन्दर ।
पर आप ऐसा सपना क्यों देखते हो !........आप और हम कोई अलग तो हैं नहीं ........जैसे - जल और तरंग अलग नही हैं ....जैसे - अग्नि और ताप अलग नही है .....जैसे - दूध और उसकी सफेदी अलग नही हैं....ऐसे ही हम दोनों भी कहाँ अलग हैं ?
अच्छा बताओ ! क्या जल और तरंग को कोई अलग कर सकता है ?
श्रीराधा जी जब पूछती हैं .....तब श्याम सुन्दर बड़े ही मासूमियत से अपना सिर "नही" में हिलाते हैं ।
पर मैं आपका मुखचन्द्र बिना देखे रह नही सकता .........मुझे लगता है ....मैं आपको देखता रहूँ .......बस देखता रहूँ ........पर हाँ, एक बात और.......ये जो पलक हैं ना ....यही विघ्न डालते हैं ..........ये जब गिरते हैं उस क्षण में मुझे ऐसा लगता है कि घनें अन्धकार नें मुझे घेर लिया है .......फिर एकाएक हिलकियों से श्याम सुन्दर रो पड़े ......मेरी आपसे बस एक प्रार्थना है ...........प्यारी ! ये मुख चन्द्र मेरे नयनों के आगे ही रहे ........बस मुझे यही चाहिये ।
पर ये क्या ! प्यारे ! ये क्या कर रहे हो आप ?
श्रीराधा जी नें हाथ पकड़ लिया श्याम सुन्दर का .........
पर ये तो रसिक शिरोमणि हैं........ऐसे कहाँ मानते ..........चरण पकड़ लिये श्री राधा रानी के ............चरणों में टप् टप् टप् आँसू गिरनें लगे ............हे मेरी प्राण बल्लभा श्रीराधा ! मेरी एक ही कामना है कि इन चरणारविन्द का मुझे दास बनाकर कभी छोड़ना नहीं ।
इस सेवक को अपना मान कर कभी त्यागना नहीं ।
इतना सुनते ही श्रीराधा रानी नें श्याम सुन्दर को अपनें हृदय से लगा लिया ....और प्रगाढ़ आलिंगन में बांध लिया ।
"पुलकि प्रिया लियें लाए हिये सों !
ढरकी जुरावनि वदन वदन की, यह छबि नित रहू लागी जिये सों !!
सिचनि सुधा भुजनि की भीचनि, निरखि नगीचनि भाव भिये सों !!
"श्रीहरिप्रिया" पोष परिपागे, अनुरागे रस दिये लिए सों !! "
शेष "रस चर्चा" कल -
आज के विचार
( सुख देना प्रेम है, सुख माँगना प्रेम नही )
!! बृज रस - भाग - 4 !!
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साधकों ! "जीवन मिला है दूसरों को सुख देनें के लिये......सुख लेनें के लिये नही".......बस इतनी सी बात अगर समझ में आजाये ....तो ये "रसोपासना" आपके समझ में आजायेगी ।
"सखीभाव" का यही सिद्धान्त है......अपनें प्रियतम को अगर आपनें अपनें सुख का साधन बना लिया है......तो प्रेम आपको प्राप्त नही होगा ........वह प्रेम मोह का रूप ले लेगा.......फिर मोह के दलदल में ऐसे फंस जाओगे कि आये दिन शिकायत और दुःख से कराहते ही रहोगे .....जो इस संसार में सर्वत्र देखनें को मिलता ही रहता है ।
क्यों प्रेम सरोवर में विहार नही करते ? क्यों मोह के कीचड़ में लथपथ रहते हो ........क्यों भिखारी की भाँति हाथ फैलाकर अपनें प्रियतम के आगे खड़े रहते हो .......बादशाह क्यों नही बनते ? मेरी बात मानों, देनें में मस्त हो जाओ .....सुख बाँटनें में मस्ती का अनुभव करो ......लेनें के पीछे मत पड़ो ......अपनें प्रियतम के हृदय पात्र में बस अपनी आत्मीयता का दान करते जाओ ........उन्हें तुमसे सुख मिल रहा है ना ? इस बात का ध्यान रखो .......स्वयं को सुख मिले इस बात को त्याग दो ....यही सच्चा प्रेम है ........नही तो मोह को ही प्रेम समझ बैठोगे तुम ।
"रसोपासना" इसी सिद्धान्त पर चलती है ........सच पूछो तो सखियों का अनुपम प्रेम ही युगल सरकार को तृप्ति देती है .....और युगल सरकार की तृप्ति और आनन्द ही सखियों का लक्ष्य है ......यही इन्हें पाना है .........स्वसुख की इच्छा सखियों के मन में उठती ही नही है .....बस ये युगलवर प्रसन्न रहें ..........इसी कामना से ये सब करती हैं ।
है ना विलक्षण उपासना ? केश काटने नही हैं ........वल्कल पहननें नही हैं ....इत्र फुलेल सब लगाना है ....वस्त्र सुन्दर लगानें हैं ......क्यों ? क्यों की युगल देखें तो उनके नेत्रों को अच्छा लगे ......ये सब अपनें लिये नही ......प्रियतम के लिये ।
उफ़ !
चलो .......ध्यान में बैठिये .......आँखें बन्द कीजिये ....और चलिये उस नित्य निकुञ्ज में .......जहाँ सखियाँ प्रातः के समय स्नान कर रही हैं .....और ध्यान से सुनिये उनकी प्रेम पूर्ण बातों को ....इन्हीं की बातों में रसोपासना के गूढ़ सिद्धान्त निहित हैं ।
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यमुना के जल में सखियाँ स्नान कर रही हैं........अपनें सुन्दर केशों में सुरभित खली लगाती हैं......और मलमल कर उन्हें धोती हैं ......अपनें स्वर्ण के समान चमकते हुये अंगों में उबटन मलती हैं .......ताकि देह और चमक उठे......यमुना के सलिल में मींड़ मींड़ के अपनें देह को धोती हैं......."श्रीराधा श्रीराधा श्रीराधा"......का नामोच्चारण करती हुयी जल से बाहर आती हैं ........और स्वच्छ वसन से अपनें अंगों को पोंछती हैं ...........श्रीराधारानी की प्रसादी इत्र फुलेल सबके पास है .......उन प्रसादी इत्र फुलेल को अपनें अंगों में लगाती हैं ........आहा ! पूरा वातावरण युगल के प्रसादी इत्र से सुगन्धित हो उठा है ।
"ये नीली साडी मुझे "श्रीजी" नें कल दी थी...........चहकती हुयी श्री रंगदेवी नें अन्य सखियों को बताया ............रंगदेवी सखी के गौर अंग में वह नीली साडी बहुत सुन्दर लग रही है ............
आप नीली साडी ही क्यों पहनती हैं ? इन्दुलेखा सखी नें पूछा था ।
क्यों की मुझे एक बार श्रीजी नें कहा .......रंगदेवी ! तुम नीली साडी में अच्छी लगती हो .....बस ......मेरी श्रीजी को अच्छी लगे तो मैं वही पहनूँगी ..........अच्छा ! इन्दु ! तू मुझे पूछ रही है ......तू बता तू लाल साडी ही क्यों पहनती है ? ये सुनकर खिलखिलाके हँसी इन्दुलेखा ।
मुझे तो युगल सरकार नें ही कहा है ......कि तुम लाल साड़ी ही पहनों ........अब उन्हें जो प्रिय है ....वही हमें प्रिय है ...........उनको जो अच्छा लगे वही करना हमारे लिये साधना है.........इन्दु नें कहा ।
मेरा जूड़ा बना दो सुदेवी ! आज बन नही रहा ............ललिता सखी नें कहा ......सुदेवी नें पीले रँग की साड़ी पहनी है .......पहन ली है ।
हाँ अभी बना देती हूँ....जूड़ा बनानें ललिता सखी के निकट आईँ सुदेवी ।
जूड़ा बनाती सुदेवी से पूछा ललिता सखी नें .....तुम्हे श्याम सुन्दर ज्यादा प्रिय हैं ....या श्रीजी ? हँसती बहुत है सुदेवी ललिता सखी का प्रश्न सुनकर.......बोलती कम हैं और हँसती ज्यादा हैं ।
ये कैसा प्रश्न है आपका ? श्याम सुन्दर हमारी प्रिया श्रीराधा रानी को प्रिय हैं ...........तो हमारी स्वामिनी को जो प्रिय हों .......वह हमें भी प्रिय हैं हीं । सुदेवी कम शब्दों में बहुत कुछ बोलती हैं ...........नही ......सुदेवी ! तुम्हे हमनें "श्याम श्याम" कहते हुये ही सुना है ना ! इसलिये पूछ रही हैं ललिता । चित्रा सखी नें ये बात कही थी ।
फिर जूड़ा बनाते हुए छोड़कर हँसनें लगीं सुदेवी ।
अच्छा ! ज्यादा मत हँसो सुदेवी ! जूड़ा जल्दी बना दो .......नही तो युगल की सेवा में बिलम्ब होजायेगा । ललिता सखी नें कहा ।
जूड़ा तो बन गया ललिता जु ! ....पर एक बात से हँसी आगयी........सुदेवी नें कहा ।
.....अब जल्दी बता भी दे ..........रँग देवी नें सुदेवी से कहा ......रंगदेवी की ये छोटी बहन हैं ।
"श्री जी" एक दिन कुञ्ज में अकेली अनमनी सी बैठी थीं.........मैं उनके पास थी .......श्याम सुन्दर से कोई बात हो गयी थी शायद ।
उदास सी बैठी थीं ..........मैं उनके चरणों को देख रही थी लाल लाल रँग के उनके चरण .......और बैठी बैठी उनके चरण चिन्हों को गिन रही थी .........बज्र , अंकुश, ध्वजा , यव, लता , स्वस्तिक ............तभी मुझे पता नही क्यों जम्हाई आगयी .......मैने मुँह में हाथ रखा और दूसरी तरफ मुड़ते, जम्हाई लेते हुये मेरे मुँह से निकल गया .......हे श्याम !
बस ये "श्याम" नाम सुनते ही .......श्रीजी का मुखमण्डल तो खिल गया .....वो प्रसन्नता से चहक उठीं .............और मुझ से बोलीं ....सुदेवी ! तू मेरे सामनें यही नाम लिया कर मुझे प्रसन्नता होती है ।
अब बताओ .......मैं अपनी प्रसन्नता देखूँ कि श्रीजी की ?
तो मेरे मन नें कहा ......नही ...........श्रीजी की प्रसन्नता में ही हम सब की प्रसन्नता है ...........सुदेवी की बात सुनकर सब सखियाँ प्रसन्न हो गयीं .........बोलीं ..........तभी तो हम सब युगल नाम का आश्रय लेती हैं .....क्यों की श्याम सुन्दर को श्रीजी का नाम प्रिय है ...और श्री जी को श्याम सुन्दर का .......इसलिये हम सब युगल नाम जपती हैं ......
राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे !
राधे श्याम राधे श्याम श्याम श्याम राधे राधे !!
सब सखियाँ फिर शुरू हो गयीं ......आहा ! गाती जा रही हैं और सजती जा रही हैं..........आँखों में अंजन लगाया है .....मोटा अंजन लगाया है ...........फिर भाल में श्रीजी की प्रसादी श्याम बिन्दु, दोनों भौहों के मध्य में लगाया ....और रोली का टीका जो श्याम सुन्दर की प्रसादी है उसे अपनें भाल पर लगाया ।
रोली श्रीजी का श्याम सुन्दर लगाते हैं .........और श्याम बिन्दु भाल पर श्रीजी लगाती हैं .............आहा !
मणि - आभूषण सखियों नें धारण किये ........मोतियों की लड़ी अपनें गले में धारण की ..........ये सब प्रसादी है युगल की ।
बस इसके बाद सब ......अपनें कुञ्ज में आईँ ...........कुञ्ज से सुवर्ण की थाल ली ..........उसमें भाँति भाँति की वस्तुएँ रखीं ......और चलीं अब युगल सरकार को जगानें..........दिव्य वृन्दावन है .......सखियों को सज धज कर जाते हुए जब देखा पक्षियों नें......तो सब कलरव करनें लगे ......मोर नाचनें लगे .....सखियाँ हँसती हैं इन सबको देखकर ।
मोहन मन्दिर चौक में , मिली सब सखी समाज !
बीन बजावहिं गावहीं, मधुर मधुर सुर साज !!
शेष "रसचर्चा" कल ......