Friday, January 12, 2024

भक्त के वश मे है भगवान् एक सत्य कथा

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         ━❀꧁ हरे कृष्ण ꧂❀━ 
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    *✧​”भक्त के वश में भगवान् "✧​* 
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एक गरीब बालक था जो कि अनाथ था।
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एक दिन वो बालक एक संत के आश्रम मेँ आया और बोला के बाबा आप सबका ध्यान रखते है..
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मेरा इस दुनिया मेँ कोई नहीँ हैँ तो क्या मैँ यहाँ आपके आश्रम मेँ रह सकता हूँ ?
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बालक की बात सुनकर संत बोले बेटा तेरा नाम क्या है ?
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उस बालक ने कहा मेरा कोई नाम नहीँ हैँ। तब संत ने उस बालक का नाम रामदास रखा और बोले की अब तुम यहीँ आश्रम मेँ रहना।
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रामदास वही रहने लगा और आश्रम के सारे काम भी करने लगा।
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उन संत की आयु 80 वर्ष की हो चुकी थी। एक दिन वो अपने शिष्यो से बोले की मुझे तीर्थ यात्रा पर जाना हैँ तुम मेँ से कौन कौन मेरे मेरे साथ चलेगा और कौन कौन आश्रम मेँ रुकेगा ?
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संत की बात सुनकर सारे शिष्य बोले की हम आपके साथ चलेंगे.! क्योँकि उनको पता था की यहाँ आश्रम मेँ रुकेंगे तो सारा काम करना पड़ेगा.. इसलिये सभी बोले की हम तो आपके साथ तीर्थ यात्रा पर चलेंगे।
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अब संत सोच मेँ पड़ गये की किसे साथ ले जाये और किसे नहीँ क्योँकि आश्रम पर किसी का रुकना भी जरुरी था।
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बालक रामदास संत के पास आया और बोला बाबा अगर आपको ठीक लगे तो मैँ यहीँ आश्रम पर रुक जाता हूँ।
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संत ने कहा ठीक हैँ पर तुझे काम करना पड़ेगा... आश्रम की साफ सफाई मे भले ही कमी रह जाये पर ठाकुर जी की सेवा मे कोई कमी मत रखना।
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रामदास ने संत से कहा की बाबा मुझे तो ठाकुर जी की सेवा करनी नहीँ आती आप बता दिजीये की ठाकुर जी की सेवा कैसे करनी है ? फिर मैँ कर दुंगा।
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संत रामदास को अपने साथ मंदिर ले गये वहाँ उस मंदिर मे राम दरबार की झाँकी थी।
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श्रीराम जी, सीता जी, लक्ष्मणजी और हनुमान जी थे।
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संत ने बालक रामदास को ठाकुर जी की सेवा कैसे करनी है सब सिखा दिया।
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रामदास ने गुरु जी से कहा की बाबा मेरा इनसे रिश्ता क्या होगा ये भी बता दो क्योँकि अगर रिशता पता चल जाये तो सेवा करने मेँ आनंद आयेगा।
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उन संत ने बालक रामदास कहा की तु कहता था ना की मेरा कोई नहीँ हैँ तो आज से ये रामजी और सीताजी तेरे माता-पिता हैँ।
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रामदास ने साथ मेँ खड़े लक्ष्मण जी को देखकर कहा अच्छा बाबा और ये जो पास मेँ खड़े है वो कौन है ?
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संत ने कहा ये तेरे चाचा जी है और हनुमान जी के लिये कहा की ये तेरे बड़े भैय्या है।
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रामदास सब समझ गया और फिर उनकी सेवा करने लगा। संत शिष्योँ के साथ यात्रा पर चले गये।
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आज सेवा का पहला दिन था रामदास ने सुबह उठकर स्नान किया और भिक्षा माँगकर लाया और फिर भोजन तैयार किया फिर भगवान को भोग लगाने के लिये मंदिर आया।
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रामदास ने श्रीराम सीता लक्ष्मण और हनुमान जी आगे एक-एक थाली रख दी और बोला अब पहले आप खाओ फिर मैँ भी खाऊँगा।
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रामदास को लगा की सच मेँ भगवान बैठकर खायेंगे.
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पर बहुत देर हो गई रोटी तो वैसी की वैसी थी।
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तब बालक रामदास ने सोचा नया नया रिश्ता बना हैँ तो शरमा रहेँ होँगे।
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रामदास ने पर्दा लगा दिया बाद मेँ खोलकर देखा तब भी खाना वैसे का वैसा पडा था।
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अब तो रामदास रोने लगा की मुझसे सेवा मे कोई गलती हो गई इसलिये खाना नहीँ खा रहेँ हैँ !
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और ये नहीँ खायेंगे तो मैँ भी नहीँ खाऊँगा और मैँ भुख से मर जाऊँगा..!
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इसलिये मैँ तो अब पहाड़ से कूदकर ही मर जाऊँगा।
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रामदास मरने के लिये निकल जाता है तब भगवान रामजी हनुमान जी को कहते हैँ हनुमान जाओ उस बालक को लेकर आओ और बालक से कहो की हम खाना खाने के लिये तैयार हैँ।
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हनुमान जी जाते हैँ और रामदास कूदने ही वाला होता हैँ की हनुमान जी पीछे से पकड़ लेते हैँ और बोलते हैँ क्याँ कर रहे हो ?
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रामदास कहता हैँ आप कौन ?
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हनुमान जी कहते है मैँ तेरा भैय्या हूँ इतनी जल्दी भूल गये ?
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रामदास कहता है अब आये हो इतनी देर से वहा बोल रहा था की खाना खालो तब आये नहीँ अब क्योँ आ गये ?
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तब हनुमान जी बोले पिता श्री का आदेश हैँ अब हम सब साथ बैठकर खाना खायेँगे।
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फिर रामजी, सीताजी, लक्ष्मणजी, हनुमान जी साक्षात बैठकर भोजन करते हैँ।
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इसी तरह रामदास रोज उनकी सेवा करता और भोजन करता।
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सेवा करते 15 दिन हो गये एक दिन रामदास ने सोचा की कोई भी माँ बाप हो वो घर मेँ काम तो करते ही हैँ. 
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पर मेरे माँ बाप तो कोई काम नहीँ करते सारे दिन खाते रहते हैँ. मैँ ऐसा नहीँ चलने दूँगा।
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रामदास मंदिर जाता हैँ ओर कहता हैँ पिता जी कुछ बात करनी हैँ आपसे।
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रामजी कहते हैँ बोल बेटा क्या बात हैँ ?
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रामदास कहता हैँ की अब से मैँ अकेले काम नहीँ करुंगा आप सबको भी काम करना पड़ेगा,
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आप तो बस सारा दिन खाते रहते हो और मैँ काम करता रहता हूँ अब से ऐसा नहीँ होगा।
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राम जी कहते हैँ तो फिर बताओ बेटा हमेँ क्या काम करना है ?
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रामदास ने कहा माता जी (सीताजी) अब से रसोई आपके हवाले. और चाचा जी (लक्ष्मणजी) आप सब्जी तोड़कर लाओँगे.
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और भैय्या जी (हनुमान जी) आप लकड़ियाँ लायेँगे. और पिता जी (रामजी) आप पत्तल बनाओँगे।
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सबने कहा ठीक हैँ।
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अब सभी साथ मिलकर काम करते हुऐँ एक परिवार की तरह सब साथ रहने लगेँ।
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एक दिन वो संत तीर्थ यात्रा से लौटे तो सीधा मंदिर मेँ गये और देखा की मंदिर से प्रतिमाऐँ गायब हैँ.
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संत ने सोचा कहीँ रामदास ने प्रतिमा बेच तो नहीँ दी ? 
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संत ने रामदास को बुलाया और पुछा भगवान कहा गये ?
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रामदास भी अकड़कर बोला की मुझे क्या पता रसोई मेँ कही काम कर रहेँ होंगे।
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संत बोले ये क्या बोल रहा ?
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रामदास ने कहा बाबा मैँ सच बोल रहा हूँ जबसे आप गये हैँ ये चारोँ काम मेँ लगे हुऐँ हैँ।
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वो संत भागकर रसोई मेँ गये और सिर्फ एक झलक देखी की सीता जी भोजन बना रही हैँ रामजी पत्तल बना रहे है और फिर वो गायब हो गये और मंदिर मेँ विराजमान हो गये।
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संत रामदास के पास गये और बोले आज तुमने मुझे मेरे ठाकुर का दर्शन कराया तु धन्य हैँ।
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और संत ने रो रो कर रामदास के पैर पकड़ लिये...!
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भक्त मित्रोँ कहने का अर्थ यही हैँ की ठाकुर जी तो आज भी तैयार हैँ दर्शन देने के लिये पर कोई रामदास जैसा भक्त भी तो होना चाहीये...
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राम जी हमारे बापू सीता जी मेरी मैय्या हैँ, 
लक्ष्मण जी है चाचा हमारे हनुमान जी मेरे भैय्या हैं.

   
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है राम तुम यहाँ आते ही नही ?


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         ━❀꧁ हरे कृष्ण ꧂❀━ 
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शबरी बोली - यदि रावण का अंत नहीं करना होता, तो  राम तुम यहाँ आते ही नही!

राम गंभीरता से कहा, भ्रम में न पड़ो माता
राम क्या रावण का वध करने आया है ?

अरे रावण का वध तो लक्ष्मण अपने पैर से वाण चला भी कर सकता है।

राम हजारों कोस चल कर इस गहन वन में आया है तो केवल तुमसे मिलने आया है माता, ताकि हजारों वर्षों बाद जब कोई पाखण्डी भारत के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा करे तो इतिहास चिल्ला कर उत्तर दे कि इस राष्ट्र को छत्रिय राजा राम और उसकी भीलनी माँ ने मिल कर गढ़ा था। क्योंकि किसी भी सशक्त राष्ट्र की परिकल्पना बिना समाज के हर वर्ग को जोड़े तो हो ही नही सकती। जब तक समाज का गरीब, शोषित , वंचित , वनवासी आदिवासी किसी भी  व्यक्ति की सत्ता से दूरी रहेगी, उंसकी भागीदारी नही होगी तब तक असली रामराज्य की कल्पना नही की जा सकती।

जब कोई कपटी भारत की परम्पराओं पर उँगली उठाये तो तो काल उसका गला पकड़ कर कहे कि नहीं, यह एकमात्र ऐसी सभ्यता है जहाँ एक राजपुत्र वन में प्रतीक्षा करती एक दरिद्र वनवासिनी से भेंट करके आशिर्वाद लेता  है।

राम वन में बस इसलिए आया है ताकि जब युगों का इतिहास लिखा जाय तो उसमें अंकित हो कि सत्ता जब पैदल चल कर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे तभी असली रामराज्य है।

राम वन में इसलिए आया है ताकि भविष्य स्मरण रखे कि प्रतिक्षाएँ अवश्य पूरी होती हैं, चाहे वो गरीब वृद्ध भीलनी की ही क्यों न हो। बस वहाँ विस्वाश की भावना प्रबल होनी चाहिए।

राम ने फिर कहा- राम की वन यात्रा केवल रावण युद्ध के लिए नहीं है माता
राम की यात्रा प्रारंभ हुई है भविष्य के लिए आदर्श की स्थापना के लिए
राम आया है ताकि भारत को बता सके कि अन्याय का अंत करना ही धर्म है

राम आया है ताकि युगों को सीख दे सके कि विदेश में बैठे शत्रु की समाप्ति के लिए आवश्यक है कि पहले देश में बैठी उसकी समर्थक सूर्पणखाओं की नाक काटी जाय और खर-दूषणो का घमंड तोड़ा जाये !

और राम आया है ताकि युगों को बता सके कि रावणों से युद्ध केवल राम की शक्ति से नहीं बल्कि वन में बैठी शबरी के आशीर्वाद से जीते जाते हैं

शबरी की आँखों में जल भर आया था
उसने बात बदलकर कहा - बेर खाओगे राम ?
राम मुस्कुराए, "बिना खाये जाऊंगा भी नहीं माता"

शबरी अपनी कुटिया से झपोली में बेर ले कर आई और राम के समक्ष रख दिया
राम और लक्ष्मण खाने लगे तो कहा - मीठे हैं न प्रभु ?

यहाँ आ कर मीठे और खट्टे का भेद भूल गया हूँ माता
बस इतना समझ रहा हूँ कि यही अमृत है

शबरी मुस्कुराईं, बोली - "सचमुच तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो राम"

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         ll    🌸 *श्रीहरि* 🌸    ll
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हरे ......कृष्णा....हरे.....कृष्णा...कृष्णा..
कृष्णा.....हरे ....हरे....हरे....राम..हरे.....
राम......राम.......राम.....हरे.....हरे.....
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Sunday, October 29, 2023

प्रेम रस मदिरा सबसो हित श्री राधा बाग मे चतुरासी जी 15

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कृपा भी नही मिलती । 

फिर बाबा बोले - अच्छा  सुनो ,   एक लुटेरा था श्रीवृन्दावन में ....उसका नाम था नरवाहन ।  

वो लूटता था ...जो व्यापारियों का माल श्रीवृन्दावन से होकर जाता था तो वो टैक्स लेता था ...पहले तो यमुना जी बहुत बड़ी थीं ....जल भी बहुत था ..पानी जहाज़ चलते थे ..दिल्ली आगरा प्रयाग आदि व्यापारी लोग नाव से ही सामान लेकर आते जाते थे ...तो नरवाहन उन्हें लूटता था ....इसके लोग थे  लुटेरे ...उन सबका सरदार ये नरवाहन राजा कहलाता था । 

श्रीहित सखी के अवतार  श्रीहित हरिवंश महाप्रभु  श्रीधाम वृन्दावन आये .....तो इनके साथ इनकी दो पत्नियाँ और श्रीराधा बल्लभ लाल जू थे ।   ये विवाह इन्होंने भोग वश नही किया था ...एक पण्डित जी थे ...वही अपनी दो बेटियों को इन्हें दे गये ...ये आ रहे थे श्रीवृन्दावन ।

बाबा  राधा बाग आगये...और प्रेम से बैठ गये रज में , जहां बैठते थे ...
श्रोता लोग बैठे हैं ।  पाँच बजने में अभी समय है ।   

हाँ ,  तो मैंने कह रहा था ...उन पण्डित जी के पास थे श्रीराधा बल्लभ लाल ...उन श्रीराधा बल्लभ जू को  लेने के लिए श्रीहित हरिवंश जू ने उन दोनों कन्याओं से विवाह किया ....क्यों की वो पण्डित जी बोले थे ...इनको तो मैं दहेज में ही दूँगा अपनी बेटियों के साथ ।  तो उन कन्याओं से विवाह करके श्रीराधा बल्लभ जी को लेकर  श्रीहित हरिवंश जू आगये  श्रीधाम वृन्दावन ।   उन दिनों श्रीवृन्दावन सच में ही वन था ....टीले बहुत थे ...तो मदन टेर नामक टीले में आकर श्रीहित जू ने  उनके ठाकुर श्रीराधा बल्लभ जू को विराजमान कराया ।     

पागल बाबा बोले - उन दिनों टीलों पर क़ब्ज़ा था नरवाहन का ....क्यों की यमुना में कौन सी नाव जा रही है , कौन सी आरही है ...ये उन के लुटेरे टीले पर चढ़कर ही देखते थे ...श्रीहित हरिवंश जी ही पहले थे जिन्होंने निर्भय होकर मदन टेर ही नही ..आगे आगे के टीले भी ले लिए थे ।     नरवाहन से उनके लोगों  ने कहा ....कोई ग्रहस्थ संत है  ठाकुर जी सेवा करता है ....उसने हमारे सारे टीले क़ब्ज़े कर लिए हैं .....आप कहें तो हम हटा दें । 

नरवाहन ने कुछ सोचकर कहा ...मैं देखता हूँ ।  

नरवाहन गये .....वहाँ देखा तो श्रीहित जू  दिव्य स्वरूप धारण  करके विराजे थे ...उनका गौर वर्ण ...उनकी कान्ति ....उनकी प्यारी मुस्कुराहट ...उनका वो दिव्य आभा मण्डल । उनके अंग से “राधा राधा राधा” नाम प्रकट हो रहा था । नरवाहन देखते रहे ...वो सुध बुध भूलने लगे , उस दिव्य रसपूर्ण नाम के श्रवण से ही ये नरवाहन  श्रीहित जू के चरणों में गिर गये ।   और राधा नाम महामन्त्र उन्होंने प्राप्त किया । 

बाबा बोले -  शिष्य तो श्रीहित जू के कई हैं .....ओरछा के राजगुरु  श्रीहरिराम व्यास जी भी इनके ही शिष्य थे...पर पूर्ण कृपा बरसी  ....नरवाहन के ऊपर ।    

 क्यों ?   शाश्वत ने पूछा ।

क्यों की इसकी कोई गति नही थी .....ये तो लुटेरा था ...दूर दूर तक  मुक्ति की बात छोड़ो स्वर्ग जाने की व्यवस्था भी इसके पास नही थी ...क्यों की पुण्य कुछ था नही ।  इसलिये इन सखी जू ने ....कृपा करके नरवाहन को ......ओह ! सीधे निकुँज में प्रवेश दिला दिया ...ये सखी की कृपा थी क्यों की “हित सखी” यही तो हैं ।

फिर  राधा बाग  को लोगों से भरा हुआ देखा  बाबा ने तो कहा ....श्रीहित चौरासी में  गोसाईं श्रीहित हरिवंश जी के छाप सारे पदों में है ....बस दो पद में  - एक ग्यारहवाँ और बारहवाँ ..में ही “नरवाहन प्रभु” नामकी छाप मिलती है .....जो ये नरवाहन को लेकर हित सखी पहुँच जाती हैं और निकुँज में ,  जाकर  नरवाहन जो दर्शन करते हैं ...आहा !    ये साधन साध्य थोड़े ही है ..निकुँज में प्रवेश ...इसके लिए तो सखी की कृपा चाहिये ....उसके बिना सम्भव नही है । 

इसके बाद बाबा  आज के श्रीहित चौरासी जी  का  ग्यारहवाँ पद   गाने के लिए कहते हैं ...गौरांगी मधुर स्वर से वीणा में गायन करती है ।

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और हाँ , ये सब तो सुन्दर है ही पर इन सबको भी मात दे रहे हैं  श्याम द्युति वाले श्याम सुन्दर और तप्त सुवर्ण के समान अंग वाली श्रीराधा रानी ।    दोनों विहार करते हैं ना तो  जो आनन्द बरसता है वो कह नही सकते ।  विहार करते हुये ऐसा लगता है काले बादलों में बिजली चमक रही है । 

दोनों के वस्त्र भी तो देखो एक ने पीताम्बर ओढ़ के मानों अपनी प्रिया को ही ओढ़ लिया है और जो प्रिया ने ओढ़नी ओढ़ी है  वो ऐसे चमक रही है जैसे श्याम सुन्दर अपनी प्रिया को देखकर आज चमक रहे हैं ।    अब क्या उपमा दूँ ?  अनुराग का जो कन्द है वो ये हैं ...अब इसका वर्णन कैसे हो सकता है ।  सखी ! देख ....शीतल हवा चल रही है यमुना जी का जल भी शीतल हो  गया है ...वातावरण  में शीतलता ही है ....अब जिस कमल दल में ये विराजे हैं ...सखी !  वो भी शीतल है ...पर श्याम सुन्दर को देखो ...वो अपने नयनों से प्रार्थना कर रहे हैं अपनी प्यारी की ।  क्यों ?  दूसरी ने पूछा । इसलिए की इनकी प्यारी आज मान कर रही हैं ....ये मना रहे हैं  पर वो मान नही रहीं ।     ये छू रहे हैं ....पर प्यारी ...ना ना ना  ही करती जा रही हैं ।  

अब मैं समझी !   क्या समझी तू ? 

सखी !   कामदेव को ये  श्याम सुन्दर  रोज मथते थे  ना , पर आज वो इन्हें मथ के चला गया ।  इस बात पर सब हंसी ।

हित सखी के साथ आज नरवाहन सखी भी आई है ....वो इस निकुँज रस को अपने नेत्रों से पीकर उन्मत्त हो गयी है ....वो रस केलि को देखकर उन्मादी हो चली है ....अब वो आगे आई ...और बोली ...हे प्यारी जू !  हरि से केलि करो ।   रस में डुबो दो इन्हें ....तुम तो सुरत रस की सरिता हो ...बहा ले जाओ इन्हें ।  डुबो दो प्यारी जू !  क्यों की यही रस  जग का मंगल करने वाला है ।

ये बात  नरवाहन सखी ने कही थी । 

धन्य हैं ये रसोपासना के आचार्य जिन्होंने सामान्य जीवों पर ये रस बरसाकर कितनी कृपा की .....आपकी कृपा हम पर भी हो .....जय हो जय हो ।

बाबा इतना ही बोले ...गौरांगी ने ग्यारहवें पद का फिर से गान किया ।

“मंजुल कल कुंज देस , राधा हरि विशद वेस.........

आगे की चर्चा अब कल - 
हरि शरण जी 


श्रीजी मंजरी दास (सूर श्याम प्रिया दास) 

Monday, October 2, 2023

श्री हित चतुरासी जी पद संख्या 14

अद्वितीय रसिक - “आजु नागरी किशोर” )

28, 5, 2023
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गतांक से आगे - 

इनके जैसे रसिक न हुये, न होंगे ...’मन्मथ’को ही इन्होंने इतना मथा कि वो ‘रस’ बन गया । 

कामदेव का स्थान है  निकुँज में ...काम के अनेक नाम हैं ...मदन ,  मनोज , मन्मथ ....इस संसार का लौकिक “काम” भले ही निन्दनीय हो ....पर निकुँज में ये मदन ..प्रेम का ही रूप बन जाता है ....फिर इस मदन के बिना यहाँ  रस केलि का आविर्भाव ही नही होता ।   ये काम  जब कृष्ण से जुड़ जाता है ...तब ये निन्दनीय कहाँ रहा ?  निन्दनीय तो तब है जब संसार की वासनाओं में ये उलझा रहे ....किन्तु जब यही मदन ,  गोपाल की शरण में चला जाता है ...तब ये  वन्दनीय हो जाता है....फिर निकुँज में काम का अर्थ वासना से नही किया जाता ...यहाँ तो ये प्रेम का ही एक रूप बन जाता है ...प्रेम खेल  में इसका बहुत बड़ा योगदान है ।   

अजी !  इनके ( युगल सरकार ) जैसा रसिक कौन हुआ ?   

इनके जैसा रास किसने किया ?  सम्पूर्ण सृष्टि में रस की जो किंचित ही सही  अनुभूति हो रही है ...वो कहाँ से हो रही है  ?   सृष्टि में आनन्द जो अनुभव में आरहा है  उसका मूल श्रोत कहाँ है ?   प्रेम की भावना से जीव जब भावित होता है और उसे जो तृप्ति मिलती है ...वो प्रेम कहाँ से प्रकट हो रहा है ।   अरे भई !  कहीं तो इनका समुद्र होगा  जहां से ये हमें मिल रहा है ....हाँ है ना !   श्रीवृन्दावन ।  बोलो - श्री वृन्दावन । आया ना रस ?  यहाँ प्रेम का समुद्र है ..यहीं लहराता है ये सिन्धु ...यहीं युगल क्रीड़ा करते हैं ..यहीं रस  रास का रूप लेकर  सर्वत्र रस वितरण करता है ।

यहाँ रसराज विराजमान हैं ..अद्वितीय रसिक हैं ये  , ऐसे न हुये न होंगे ।  

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आज बरसाने में वर्षा हुई है ...रिमझिम वर्षा ...बूँदे  लताओं के  पल्लवों में मोती की भाँति शोभा पा रही हैं...अवनी शीतल हुई है ...मोर अपने पंखों को समेटे हुये हैं  और कभी कभी बोल भी उठते हैं ...और कभी तो पंख फैला कर वर्षा की बूँदों को झाड़ भी रहे हैं । पक्षी अपने चोंच  में जल भर कर अपने घोंसले में जा रहे हैं ।  कोयल बोलती है कभी कभी ...तो वातावरण में और रस घुल जाता है ।  

राधा बाग  तैयार है  श्रीहित चौरासी जी के लिए ।  

आज लोग समय से पूर्व  ही आगये है ....कोई श्रीराधा नाम का जाप कर रहे हैं ....तो कोई  ध्यान कर रहा है ...कोई पदों का गान कर रहा है ...तो कोई माला आदि बनाने में गौरांगी से सेवा माँग रहा है ...तो कोई रसिकों के लिए बिछाबन  बिछा रहा है  ।     

बाबा पधारे हैं ..आज ये मोर कुटी गये थे ...वहीं से आरहे हैं ...मैंने आते ही पूछा ...मोर कुटी में ?  

तो बोले ...पाँच सौ वर्ष के एक महात्मा , जो अभी भी गुप्त रूप से वहाँ वास करते हैं ..उन्हीं के दर्शन करने गया था ....मैं आश्चर्यचकित था ये सुनकर ...किन्तु मैं कुछ नही बोला ।   

बाबा  बैठ गये हैं ....सब लोगों ने अपने अपने स्थान से ही दण्डवत प्रणाम किया बाबा को । 

कुछ देर आज श्रीराधा नाम संकीर्तन हुआ ...ये संकीर्तन अद्भुत था ...सब देह भान भूल कर  श्रीराधामय  हो गये थे ।   

आज दसवें पद का गायन होगा ...श्रीहित चौरासी जी के दसवें पद ......

गौरांगी ने  वीणा सम्भाली ...पखावज और बाँसुरी के  साथ  पद का गायन प्रारम्भ हो गया था ।

बाबा आज स्वयं उच्च स्वर से  पद का गायन कर रहे थे । 

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आजु नागरी किशोर , भाँवती विचित्र जोर , 

                            कहा कहौं अंग-अंग परम माधुरी ।

करत केलि कण्ठ मेलि ,  बाहु दंड गंड-गंड ,

                            परस सरस रास लास मंडली जुरी ।

श्याम - सुन्दरी - बिहार ,  बाँसुरी मृदंग तार , 

                              मधुर घोष नूपुरादि किंकिणी चुरी । 

देखत हरिवंश आलि ,  निर्तनी सुधंग चाल ,

                         वारि फेर देत प्राण देह सौं दुरी ।10 ।

गायन के पश्चात  वाणी जी को सबने रख दिया ।  
नेत्र सबने बन्द कर लिए हैं ....और अब ध्यान ।   इस पद का ध्यान पागल बाबा करायेंगे । 

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                                  !! ध्यान !! 

सुन्दर कुँज है ....सखीगण आज  बहुत सुंदर बन कर बैठी हैं ....सामने युगल सरकार है जो रस मत्तता के कारण  सब कुछ भूले हुए हैं ।     सखीगण गान की तैयारी कर रही हैं ...वाद्य आदि सब सामने हैं ....कोई स्वर बैठा रही है तो कोई ताल ।   सखियों की संख्या सिर्फ आठ नही है ...अनगिनत हैं ..अष्ट सखियों की सखियाँ भी आठ आठ हैं ...फिर उनकी आठ की आठ आठ ....ऐसे अनगिनत हैं ....सब सुन्दर से सुन्दर हैं....यही सखियाँ इतनी सुन्दर हैं कि महालक्ष्मी का सौन्दर्य भी इनके आगे तुच्छ है ...फिर  श्रीराधा रानी की तो बात ही छोड़ दीजिए ।

युगल सरकार के सामने एक जल का छोटा सा फुब्बार है ....उससे और शोभा बन रही है ।

तभी सामने से एक सखी आई  ये हित सखी है ....और इसने आकर युगल सरकार के सामने एक खिला हुआ कमल रख दिया ...ये कमल स्वर्ण के रंग का था इसलिए  युगल को  ये कमल  हित सखी ने भेंट किया था ।     श्याम सुन्दर का ध्यान   अब उस कमल पर ही टिक गया है ...उसकी शोभा  देख रहे हैं  स्वर्ण का कमल देखकर श्याम सुन्दर को अपनी प्रिया श्रीराधा रानी की याद आती है ....तो वो  तुरन्त अपनी प्यारी को निहारने लगते हैं ....प्रिया उनसे संकेत में पूछती हैं ...क्या हुआ ?    तब श्याम सुन्दर उस कमल को दिखाकर कहते हैं ...बिल्कुल आपकी तरह है ये कमल भी ...आपके अंग की जो शोभा है  वैसी ही इस कमल की भी है ...आपके अंग में जो सुगन्ध है वैसी ही इस कमल में भी है ।   ये सारी बातें इन की संकेत में हो रही हैं....किन्तु सखियाँ तो  हृदय की बात जानती ही हैं ...इसलिए इनकी चर्चा  में सखियों को अति आनन्द आ रहा है ।

तभी एक भ्रमर उड़ता हुआ आया और उस कमल में बैठ गया ...और कमल का मकरंद पान करने लगा .....ये देखकर श्याम सुन्दर अपनी प्रिया की ओर देखकर मुस्कुराये .....

बस इनका मुस्कुराना क्या हुआ ...हित सखी ने उस कुँज को ही बदल दिया ....वो कुँज  अब मात्र कमल दल से सज्जित था ....उस कुँज के सोलह द्वार थे   उस द्वार की बनावट में केवल कमल का ही प्रयोग था .....सामने सज्जा थी कमल दल की ....उसी में विराजे थे युगल सरकार ।   

सखियों ने वाद्य बजाने शुरू कर दिये ...मृदंग, बाँसुरी,  वीणा ...तभी सखियों ने सुना कि  मन्द मन्द ध्वनि नूपुर और करधनी की भी आरही है ।     सामने देखा कि  नागरी श्रीराधा रानी नृत्य कर रही हैं ...नृत्य अद्भुत है ...अनुपम है .....पूरा कुँज झूम रहा है .....किन्तु इतना ही नही ....दूसरी और  श्याम सुन्दर भी नृत्य करते हुये इन्हीं के पास आरहे हैं ।      ये झाँकी तो  कभी देखी नही गयी थीं...सखियाँ आनन्द में डूबी हुयी हैं ....और  इनका शतगुना आनन्द तब और बढ़  गया जब इन्होंने इस रहस्य को जाना ....कि दोनों  अब बदल गये हैं ....क्या ?   जी , श्याम,  सुन्दरी हो गये हैं और नागरी , किशोर हो गयीं हैं ....सखियाँ गान करती हैं ....

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आहा ! सखी देख तो ....

आज इन दोनों की जो जोरी है ...वो है तो बड़ी प्यारी ...किन्तु विचित्र है ....इनके अंग की थिरकन देख ...इनके अंग अंग में माधुर्य है ....माधुर्य का रस इनके अंगों से टपक रहा है ।  

पर इस सुन्दर जोरी को तू  विचित्र क्यों कह रही है ?   ललिता सखी ने हित सखी से पूछा । 

तू समझ ,     हित सखी  हंसकर बोली । 

किन्तु इन दोनों का नृत्य इतना  उन्माद पूर्ण और उन्मुक्त था कि  ललिता सखी भी समझ नही पाईं ।

तो हित सखी ने कहा .....नागरी हमारी श्रीराधा रानी  किशोर बनी हैं और  श्याम सुन्दर  सुन्दरी का भेष धारण कर उन्मुक्त नृत्य कर रहे हैं .....ये सुनते ही सब आनंदित हो  तालियाँ बजाने लगीं ....क्यों की सब पहचान गयीं थीं ।   पूरा कुँज  प्रेम के उन्माद से भर गया था । 

सखी देख - दोनों एक दूसरे के कण्ठ में बाहु डालकर ....कभी बाहु से बाहु ....कपोल से कपोल मिलाकर कैसे रास और विलास की अनुपम सृष्टि कर रहे हैं ।   हित सखी कहती हैं ...ये प्रेम की ऊँचाई का दर्शन आज ही हुआ है .....

रास में  संगीत की अपनी भूमिका होती है...पर सखी !  यहाँ तो संगीत भी इन्हीं का चल रहा है .....नूपुर की ध्वनि आहा !   करधनी की ध्वनि !  और कंक़ण की ध्वनि !  हमारे  मृदंग, बाँसुरी वीणा  ये ठीक हैं ...पर इन युगल का संगीत  तो  सृष्टि में  महारस को  प्रवाहित कर रहा है ।   

पर  तभी  नृत्य  पूरी गति से चल पड़ा था .....युगल मत्त  हो गये रस के कारण ....नाना प्रकार से नृत्य कर रहे हैं ये दोनों ....कभी तेज गति तो कभी मन्द गति ....ताल में अपने चरण पटकते हैं , कभी दोनों एक दूसरे में लिपटते हैं ...इस नृत्य गति  में कोई पहचान नही पा रहा अब कि  कौन श्रीराधा हैं और कौन श्याम सुन्दर ।   दोनों ही अब नाचते नाचते एक हो रहे हैं .....

आहा !   इस रास लास्य की  विचित्र झाँकी  देख  हितसखी कहती हैं ..सखियों ! इन युगलवर में  सब कुछ न्योछावर करो ...अपना ये देह और प्राण दोनों ही ...क्यों की ऐसी विचित्र जोरी और ऐसा विचित्र नृत्य  आज तक देखा नही था ।   सच  है सखी !  ये दोनों अद्वितीय रसिक हैं ...ऐसे रसिक न हुये न होंगे ....इतना ही कहा हित सखी  ने  और सब मौन हो गयीं । 

पागल बाबा आज अंतिम में  कहते हैं - 

चन्द्र  मिटे सूरज मिटे , मिटे त्रिगुण विस्तार ।
दृढ़ व्रत श्रीहरिवंश को ,  मिटे न नित्य विहार ।। 

सब मिट जाएगा .....किन्तु ये रस का विहार कभी भी मिटेगा ।  

गौरांगी ने  अब फिर श्रीहित चौरासी जी के इस दसवें पद का गायन किया ....

पूरा राधा बाग गा रहा था ।

“आजु नागरी किशोर , भाँवती विचित्र जोर”..........

आगे की चर्चा अब कल - 

हित चतुरासी जी पद भाव 11 "मंजुल कल कुंज देश"

हित सखी की कृपा - “ मंजुल कल कुंज देस” )

29, 5, 2023

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गतांक से आगे - 

आज आनन्द दुगुना हुआ ...क्यों की बाबा के साथ गहवर वन की परिक्रमा लगाने का भी अवसर हम सबको मिल गया ।  बरसाना में वर्षा हो रही है ...मोर नाच रहे हैं ...पक्षियों के कलरव से वातावरण और मधुर हो रहा है ।   गहवर वन में बैठ कर सब लोगों ने  श्रीहित चौरासी जी का गान किया .....गान में ही सब इतने तल्लीन हो गये कि आगे बढ़ने की कोई सोच ही नही रहा था । कुछ देर बाद  बाबा ही उठे और  आगे चल दिये ...ठीक पाँच बजे श्रीहित चौरासी जी पर कथा होगी ...इसके लिए “राधा बाग” पाँच बजे से पूर्व ही पहुँचना है ।      

“सखी जू के चरण पकड़ लो”.......बाबा  शाश्वत से बोले । 

थोड़ी तेज चाल से मैं बाबा के पास पहुँचा ...तो बाबा चलते चलते शाश्वत को उत्तर दे रहे थे ।

मैंने शाश्वत से धीरे ही पूछा .....प्रश्न क्या था तुम्हारा ?    

उसने मुझ से भी धीरे ही कहा ....”उस दिव्य निकुँज में प्रवेश कैसे हो”? 

देखो ,  अष्ट सखियाँ हैं ना , इनमें से किसी के भी चरण पकड़ लो ...
बस निकुँज में प्रवेश मिल जायेगा ।  बाबा ने फिर पीछे मुड़कर शाश्वत को कहा । 

शाश्वत कुछ कहता कि बाबा फिर बोले ...एक किसी सखी का आश्रय ले लो ..आश्रय लेने का अर्थ है  सबसे प्रथम जब प्रातः भजन ध्यान में बैठो तो उस समय उन सखी का स्मरण करो ..उनसे प्रार्थना करो कि  आप ही हमें निकुँज में प्रवेश दिला सकती हैं ।    

उसी समय गौरांगी भी मेरे पीछे आगयी थी ...वो भी बाबा की बातें सुनने लगी थी ।

सखी चाहें तो किसी को भी प्रवेश दिला सकती हैं ?  ये मैंने पूछा । 

हाँ , किसी को भी , अधम से अधम को भी ......कोई साधना नही है ...बस उसने सखी के चरण पकड़ लिए हैं ....और  बस प्रार्थना ही करता रहता है .....फिर कुछ सोच कर बोले बाबा ....ये बात मैं ऐसे ही नही कह रहा .....मुझे श्रीरंग देवि सखी जू ने प्रवेश दिलाया ।   इतना कहकर बाबा चुप हो गये ....उन्हें लगा कि ये बात नही कहनी चाहिये थी ।    

कुछ देर हम लोग  “राधा राधा राधा” नाम जाप करते हुये  आगे बढ़े ......

फिर तो  राधा बाग  आही गया ।      

सखी जू ही  गुरु रूपा हैं .....उनकी कृपा बिना  श्रीजी की कृपा भी नही मिलती । 

फिर बाबा बोले - अच्छा  सुनो ,   एक लुटेरा था श्रीवृन्दावन में ....उसका नाम था नरवाहन ।  

वो लूटता था ...जो व्यापारियों का माल श्रीवृन्दावन से होकर जाता था तो वो टैक्स लेता था ...पहले तो यमुना जी बहुत बड़ी थीं ....जल भी बहुत था ..पानी जहाज़ चलते थे ..दिल्ली आगरा प्रयाग आदि व्यापारी लोग नाव से ही सामान लेकर आते जाते थे ...तो नरवाहन उन्हें लूटता था ....इसके लोग थे  लुटेरे ...उन सबका सरदार ये नरवाहन राजा कहलाता था । 

श्रीहित सखी के अवतार  श्रीहित हरिवंश महाप्रभु  श्रीधाम वृन्दावन आये .....तो इनके साथ इनकी दो पत्नियाँ और श्रीराधा बल्लभ लाल जू थे ।   ये विवाह इन्होंने भोग वश नही किया था ...एक पण्डित जी थे ...वही अपनी दो बेटियों को इन्हें दे गये ...ये आ रहे थे श्रीवृन्दावन ।

बाबा  राधा बाग आगये...और प्रेम से बैठ गये रज में , जहां बैठते थे ...
श्रोता लोग बैठे हैं ।  पाँच बजने में अभी समय है ।   

हाँ ,  तो मैंने कह रहा था ...उन पण्डित जी के पास थे श्रीराधा बल्लभ लाल ...उन श्रीराधा बल्लभ जू को  लेने के लिए श्रीहित हरिवंश जू ने उन दोनों कन्याओं से विवाह किया ....क्यों की वो पण्डित जी बोले थे ...इनको तो मैं दहेज में ही दूँगा अपनी बेटियों के साथ ।  तो उन कन्याओं से विवाह करके श्रीराधा बल्लभ जी को लेकर  श्रीहित हरिवंश जू आगये  श्रीधाम वृन्दावन ।   उन दिनों श्रीवृन्दावन सच में ही वन था ....टीले बहुत थे ...तो मदन टेर नामक टीले में आकर श्रीहित जू ने  उनके ठाकुर श्रीराधा बल्लभ जू को विराजमान कराया ।     

पागल बाबा बोले - उन दिनों टीलों पर क़ब्ज़ा था नरवाहन का ....क्यों की यमुना में कौन सी नाव जा रही है , कौन सी आरही है ...ये उन के लुटेरे टीले पर चढ़कर ही देखते थे ...श्रीहित हरिवंश जी ही पहले थे जिन्होंने निर्भय होकर मदन टेर ही नही ..आगे आगे के टीले भी ले लिए थे ।     नरवाहन से उनके लोगों  ने कहा ....कोई ग्रहस्थ संत है  ठाकुर जी सेवा करता है ....उसने हमारे सारे टीले क़ब्ज़े कर लिए हैं .....आप कहें तो हम हटा दें । 

नरवाहन ने कुछ सोचकर कहा ...मैं देखता हूँ ।  

नरवाहन गये .....वहाँ देखा तो श्रीहित जू  दिव्य स्वरूप धारण  करके विराजे थे ...उनका गौर वर्ण ...उनकी कान्ति ....उनकी प्यारी मुस्कुराहट ...उनका वो दिव्य आभा मण्डल । उनके अंग से “राधा राधा राधा” नाम प्रकट हो रहा था । नरवाहन देखते रहे ...वो सुध बुध भूलने लगे , उस दिव्य रसपूर्ण नाम के श्रवण से ही ये नरवाहन  श्रीहित जू के चरणों में गिर गये ।   और राधा नाम महामन्त्र उन्होंने प्राप्त किया । 

बाबा बोले -  शिष्य तो श्रीहित जू के कई हैं .....ओरछा के राजगुरु  श्रीहरिराम व्यास जी भी इनके ही शिष्य थे...पर पूर्ण कृपा बरसी  ....नरवाहन के ऊपर ।    

 क्यों ?   शाश्वत ने पूछा ।

क्यों की इसकी कोई गति नही थी .....ये तो लुटेरा था ...दूर दूर तक  मुक्ति की बात छोड़ो स्वर्ग जाने की व्यवस्था भी इसके पास नही थी ...क्यों की पुण्य कुछ था नही ।  इसलिये इन सखी जू ने ....कृपा करके नरवाहन को ......ओह ! सीधे निकुँज में प्रवेश दिला दिया ...ये सखी की कृपा थी क्यों की “हित सखी” यही तो हैं ।

फिर  राधा बाग  को लोगों से भरा हुआ देखा  बाबा ने तो कहा ....श्रीहित चौरासी में  गोसाईं श्रीहित हरिवंश जी के छाप सारे पदों में है ....बस दो पद में  - एक ग्यारहवाँ और बारहवाँ ..में ही “नरवाहन प्रभु” नामकी छाप मिलती है .....जो ये नरवाहन को लेकर हित सखी पहुँच जाती हैं और निकुँज में ,  जाकर  नरवाहन जो दर्शन करते हैं ...आहा !    ये साधन साध्य थोड़े ही है ..निकुँज में प्रवेश ...इसके लिए तो सखी की कृपा चाहिये ....उसके बिना सम्भव नही है । 

इसके बाद बाबा  आज के श्रीहित चौरासी जी  का  ग्यारहवाँ पद   गाने के लिए कहते हैं ...गौरांगी मधुर स्वर से वीणा में गायन करती है ।
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             मंजुल कल कुंज देस,  राधा हरि विशद वेस। 

                         राका नभ कुमुद बन्धु ,  शरद जामिनी ।। 

                  श्यामल दुति कनक अंग ,  बिहरत मिलि एक संग ।

                        नीरद मणि नील मध्य , लसत दामिनी ।।

                  अरुण पीत नव दुकूल , अनुपम अनुराग मूल ।

                     सौरभ जुत शीत अनिल , मन्द गामिनी ।।

                    किसलय दल  रचित सैन , बोलत पिय चाटु बैन ।

                    मान सहित प्रतिपद , प्रतिकूल कामिनी ।।

                   मोहन मन मथत मार ,   परसत कुच नीवी हार ।

                      वेपथ जुत   नेति नेति ,  वदत भामिनी ।।

                 “नरवाहन प्रभु” सु केलि ,  बहु विधि भर भरत झेली ।

                  सौरत रस रूप नदी ,  जगत पावनी ।11 !

मंजुल कल कुंज देश ...............

इस पद  गायन के बाद  बाबा ने नित्य की तरह इसका भी ध्यान कराया ।   

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                                        !! ध्यान !! 

सुन्दर फूलों का कुँज है ....नील मणि के समान तमाल वृक्ष हैं....उसमें सफेद सफेद फूल लगे हैं वो चमकते हैं तो ऐसा लगता है  आकाश में अनगिनत तारे चमक रहे हैं ।  

ऋतु वसन्त है ...और अब सन्ध्या बीत गयी है  रात्रि का आगमन हो रहा है ।  आकाश में चन्द्रमा पूर्ण है ...उस की चाँदनी से  पूरा श्रीवन जगमग कर रहा है ....उस समय जो शोभा हो रही है श्रीवन की .....वो तो बस चिन्तन का ही विषय है ।    

इधर कुँज की शोभा अद्वितीय है ....कुँज पुष्पों से तैयार किया गया है ....उस कुँज में जो पच्चीकारी है वो  भी पुष्पों के कलियों की है ...एक प्रकार से  फूलों का बंगला ही है ।  

कुँज एक नही हैं ...छ कुँज हैं ...एक प्रवेश कुँज है ...वो  पीले कमल का है ...उसके आगे जो कुँज है ...ये सब भीतर ही भीतर हैं .....दूसरे लाल कमल के हैं ....सबमें अलग अलग सुगन्ध है ...जो मादकता फैला रही है ...फिर  नील कमल के ...फिर हरित कमल के ....इस तरह कुँज में कुँज ....प्रत्येक कुँज के द्वार पर परदा है , वो परदा भी कलियों का है ।  

हर कुँज में ...छोटी सी सा जल की बाबडी है ..उसमें भी कमल हैं .....संगीत भौंरे देते हैं ...मोरों को प्रवेश है कुँज में ...ये चारों ओर घूम रहे हैं ।   पक्षियों का कलरव और दिव्यता भर रहा है वातावरण में ।  

अंतिम कुँज में एक सिंहासन है ...वो सिंहासन भी फूलों का ही है ......उसमें सारे रंग के कमल लगे हैं ...कमल दल को सिंहासन में  सजाया गया है उसी में  युगल सरकार बिराजे हैं ।    

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कुँज का स्थान बड़ा ही मनोरम है ....मनोरम से भी मनोरम है ।   क्यों की इस कुँज में श्याम सुन्दर और श्रीराधा रानी विराजमान हैं .....सखी ! देखो , इनके ही ऊपर कैसे  चन्द्रमा की उजियारी फैल रही है ...सीधे चाँदनी इन्हीं के ऊपर बरस रही है ...ये कितना सुन्दर लग रहा है ना ?  

और हाँ , ये सब तो सुन्दर है ही पर इन सबको भी मात दे रहे हैं  श्याम द्युति वाले श्याम सुन्दर और तप्त सुवर्ण के समान अंग वाली श्रीराधा रानी ।    दोनों विहार करते हैं ना तो  जो आनन्द बरसता है वो कह नही सकते ।  विहार करते हुये ऐसा लगता है काले बादलों में बिजली चमक रही है । 

दोनों के वस्त्र भी तो देखो एक ने पीताम्बर ओढ़ के मानों अपनी प्रिया को ही ओढ़ लिया है और जो प्रिया ने ओढ़नी ओढ़ी है  वो ऐसे चमक रही है जैसे श्याम सुन्दर अपनी प्रिया को देखकर आज चमक रहे हैं ।    अब क्या उपमा दूँ ?  अनुराग का जो कन्द है वो ये हैं ...अब इसका वर्णन कैसे हो सकता है ।  सखी ! देख ....शीतल हवा चल रही है यमुना जी का जल भी शीतल हो  गया है ...वातावरण  में शीतलता ही है ....अब जिस कमल दल में ये विराजे हैं ...सखी !  वो भी शीतल है ...पर श्याम सुन्दर को देखो ...वो अपने नयनों से प्रार्थना कर रहे हैं अपनी प्यारी की ।  क्यों ?  दूसरी ने पूछा । इसलिए की इनकी प्यारी आज मान कर रही हैं ....ये मना रहे हैं  पर वो मान नही रहीं ।     ये छू रहे हैं ....पर प्यारी ...ना ना ना  ही करती जा रही हैं ।  

अब मैं समझी !   क्या समझी तू ? 

सखी !   कामदेव को ये  श्याम सुन्दर  रोज मथते थे  ना , पर आज वो इन्हें मथ के चला गया ।  इस बात पर सब हंसी ।

हित सखी के साथ आज नरवाहन सखी भी आई है ....वो इस निकुँज रस को अपने नेत्रों से पीकर उन्मत्त हो गयी है ....वो रस केलि को देखकर उन्मादी हो चली है ....अब वो आगे आई ...और बोली ...हे प्यारी जू !  हरि से केलि करो ।   रस में डुबो दो इन्हें ....तुम तो सुरत रस की सरिता हो ...बहा ले जाओ इन्हें ।  डुबो दो प्यारी जू !  क्यों की यही रस  जग का मंगल करने वाला है ।

ये बात  नरवाहन सखी ने कही थी । 

धन्य हैं ये रसोपासना के आचार्य जिन्होंने सामान्य जीवों पर ये रस बरसाकर कितनी कृपा की .....आपकी कृपा हम पर भी हो .....जय हो जय हो ।

बाबा इतना ही बोले ...गौरांगी ने ग्यारहवें पद का फिर से गान किया ।

“मंजुल कल कुंज देस , राधा हरि विशद वेस.........

आगे की चर्चा अब कल - 
✍️hari sharan 
हरि शरणम् गछामि
🙏श्रीजी मंजरी दास (सूर श्याम प्रिया दास) 

Sunday, August 27, 2023

श्री हित चतुरासी 13 पद संख्या 9




आज  के  विचार

!! राधा बाग में - “श्रीहित चौरासी” !! 

(  अद्भुत जोरी - “बनी श्रीराधा मोहन की जोरी”) 

27, 5, 2023

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गतांक से आगे - 

अद्भुत जोरी है ......इनका करो ध्यान ।  

रस और आनन्द की ये जोरी ...श्रीराधा  रस हैं   तो श्याम सुन्दर  आनन्द ....जब रस और आनन्द मिल जाये ...तब विचार करो ...क्या हो ?    

अजी ! क्षणिक सुख ( आनन्द नही )  के पीछे ही हम पागल हैं ..स्त्री पुरुष एक दूसरे में मर रहे हैं ..नैतिक अनैतिकता को फेंक दिया है ..परिणाम में अत्यन्त दुर्गति होगी , उसकी भी परवाह नही है ।  

फिर विचार करो .....सुख में लोगों की ये स्थिति है तो  आनन्द में क्या स्थिति होगी ?    फिर उस आनन्द में अगर रस मिल जाये तो ?    

विशुद्ध रस तत्व उस आनन्द से  मिल कर बैठा है ...सट कर बैठा है ...रस  का ही विस्तार है ..चारों ओर रस नाच रहा है ..आनन्द थिरक रहा है ...ये देखकर  सखियाँ  गदगद हैं ..वो सब भूल गयीं हैं ।       

अरे !  ये क्या है ?    रंगदेवि सखी सुदेवी के गालों को चूम रही हैं ?    

ओह ,  सुदेवी को नही चूम रही ...रंग देवि ने देखा कि सुदेवी के  अत्यन्त गोरे कपोल में युगल का  प्रतिबिम्ब पड़ रहा है ..इसलिये उसने दौड़ कर सुदेवी के कपोल को चूम लिया । 

वो युगल की झाँकी कैसी होगी !  वो जोरी कैसी होगी !  दिव्य अद्भुत प्रेमघन  के मूर्त रूप ...श्रीराधा मोहन लाल जू  आज सिंहासन में विराजे हैं .....ये रस और आनन्द का सागर  हिलोरें ले रहा है ...आप दर्शन कीजिये ....पर दर्शन करते हुये उनका जो सौन्दर्य है  वो नव नवायमान लगता है ...प्रेम सच में पुराना नही होता ...प्रेम पुराना हो जाये तो वो प्रेम ही नही है । 

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ये राधा बाग !     

अब तो यहाँ के वृक्ष-लता , पक्षी आदि भी सब मुझे पहचानने लगे हैं ...कल की घटना है ...मैं श्रीवृन्दावन से बरसाना “राधा बाग” जैसे ही पहुँचा ...बाहर मुझे देखते ही एक मोर उड़ गया ....और भीतर कुँज में पागल बाबा के पास जाकर अपने पंख हिलाने लगा ...वो मुझे देख रहा था और बाबा को बता रहा था कि - ये आगये ।

मुझे क्या चाहिए अब ?        

परसों की बात और सुन लो ..एक वृक्ष है राधा बाग में ..तमाल का ...उसे मैं  हृदय से लगाता हूँ जब मैं वहाँ जाता हूँ ।  कल मैं तमाल को हृदय से लगा रहा था कि मुझे तमाल वृक्ष की धड़कनें सुनाई दी ...मुझे लगा मेरा भ्रम होगा ...पर नही, मेरा वो भ्रम नही था । सच में उस तमाल का हृदय धड़क रहा था ।       

ये सिद्धि है रसोपासना की ।  

जब मोर आदि पक्षी  आपको देखकर आनंदित हो जायें ...वृक्ष के हृदय की आवाज आप सुन सको ।  आप  श्रीधाम के लता पत्रों से बातें करो ...और वो तुम्हारी बातें सुनें ..हरियाली देख कर तुम्हें युगल स्वरूप का स्मरण होने लगे ...अजी ! ये सिद्धि है इस रसोपासना की ।  

मैं भी आज ज़्यादा क्यों बोल रहा हूँ ...आपको तो मेरे साथ आज ध्यान करना है ...निकुँज में देखो , अखिल सौन्दर्य के निधि ये  “श्रीराधा मोहन की जोरी”  के दर्शन करो ।

गौरांगी लेकर बैठी है वीणा ...चारों ओर रसिकों की भीर जुड़ गयी है ...आज गायन है  श्रीहित चौरासी जी के  नौवें पद का ...इसमें झाँकी है ...क्या अद्भुत झाँकी है , उफ़ ।   

गौरांगी ने  प्रारम्भ किया  गायन ....उसे पूरा  राधा बाग गाने लगा था ।

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         बनी  श्रीराधा मोहन जू की जोरी ।

इन्द्र नील मनि  श्याम मनोहर ,  सात कुंभ तन गोरी ।

भाल विशाल तिलक हरि कामिनी , चिकुर चन्द्र बिच रोरी ।

गज नाइक प्रभु चाल गयन्दनि,   गति वृषभान किशोरी । 

नील निचोल जुवति  मोहन पट ,  पीत अरुण सिर खोरी ।

श्री हित हरिवंश  रसिक राधा पति , सुरत रंग में बोरी ।9।

बनी श्रीराधा मोहन जू की जोरी ...............

बाबा ने आज अपने नेत्र खोले ही नही हैं ....वो उसी रूप सुधा का पान कर रहे हैं ....उनसे आज प्रार्थना करनी पड़ी कि  आप बोलिए ...ध्यान बताइये ।   तब जाकर कुछ बहिर्मुखता आयी ...और बाबा ने बोलना शुरू किया ।    

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                                       !! ध्यान !! 

सुन्दर मान सरोवर है ...उसका जल अत्यन्त निर्मल है ..उस मान सरोवर के घाट और सीढ़ियाँ  मणियों से बनी हुई हैं ..शीतल हवा चल रही है ..हंस उस सरोवर में उन्मत्त होकर विहार कर रहे हैं ।

“अब स्नान कर लीजिये”...सखी ने आगे बढ़कर युगलसरकार से कहा । 

सखियाँ ही सब कुछ हैं ...ये जो कहें । 

चलो सखी !  श्रीश्यामा जू ने कहा ..और श्याम सुन्दर को गलबैयाँ दिये , चल दीं ।   दोनों ने स्नान किया ..वस्त्र धारण कराये सखियों ने ..फिर श्रृंगार हुआ युगल का ..अब चलीं कुँज में ।    

ये कुँज अद्भुत है ..इस कुँज में नाना प्रकार के पुष्प हैं ..इस कुँज के छ द्वार हैं ।  मध्य में एक जल कुम्भ भी है  जिसमें कमल खिले हैं ...इस कुँज के जो खम्भे और छत हैं ..सब जाली के हैं ..वो जाली  रंग बदलते रहते हैं ..कभी स्वर्ण के लगते हैं तो कभी नीलमणि के ।

मध्य में चन्द्रमणि कान्ति लिए हुये   एक दिव्य सिंहासन है ...उसकी रचना अनुपम है ..उसी में जाकर प्रिया प्रियतम विराजमान हो गये हैं ..चारों ओर सखियाँ हैं , ललिता सखी चंवर ढुरा रही हैं  तो विशाखा सखी पंखा कर रही हैं ..रंगदेवी और सुदेवी  मधुर गान कर रही हैं ।  तुंगविद्या और चित्रा सखी  वीणा और मृदंग बजा रही हैं । इन्दुलेखा सखी  और चम्पकलता  ये बीरी बनाकर रख रही हैं ।  गुलाब जल के फुब्बारे छूट रहे हैं ..जिसके कारण कुँज में शीतलता सुगन्ध और बढ़ गयी है ।

अब आगे हित सखी आती हैं ...और श्यामाश्याम के इस झाँकी का वर्णन करके बताती हैं ।

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आहा !  सखी , नज़र न लगे ...कितनी प्यारी जोरी है  श्रीराधा मोहन की ...एक सी बनी है जोरी ।  देखो तो - दृष्टि से उतरती हुयी सीधे हृदय में पहुँचती है .....

क्या उपमा दूँ !   हित सखी मुस्कुराती है ...क्यों की ये दोनों इतने सुन्दर हैं ....कि कोई उपमा देते नही बनता ।    कोई उपमा ही नही है ।     

फिर भी कुछ तो बोल ....अन्य सखियाँ कहती हैं । 

तब हित सखी कहती है ...इन्द्र नीलमणि के समान  श्याम सुन्दर का वर्ण है  और  श्रीराधा जी  गोरी हैं ...गोरी तो हैं पर कैसी गोरी ?   सखी कहती है ..सातकुंभ ...यानि सुवर्ण के समान ...सुवर्ण के समान गोरी हैं हमारी प्यारी जू ।   और सखी देखो ...हमारे श्याम सुन्दर के विशाल और सुन्दर भाल में  रोरी का तिलक लगा है  तो हमारी किशोरी जी के भी भाल मध्य में  रोरी की छोटी सी बिन्दु है ...वो कितनी सुन्दर लग रही है । 

जोरी बन गयी है  सखी !  

अब देखो ...रस राज्य के ये राजा श्याम सुन्दर जब चलते हैं तो ऐसा लगता है ...जैसे कोई मत्त गजराज चल रहा हो ....और हमारी श्रीकिशोरी जी जब चलती हैं तो ऐसा लगता है जैसे - मत्त रूप यौवन सम्पन्न कोई मन्द गति से हथिनी चल रही हो ।  चाल में भी जोरी बनी है सखी !  ये कहते हुये हंसी हित सखी ।   

अब सखियाँ अपलक नयनों से निहारती हैं अपने युगल सरकार को .....
कुछ देर के लिए सब मौन हो जाती हैं ।

सखी !  देखो ....पीताम्बर  प्यारे के अंग में  और प्यारी के अंग में नीलांबर , कितना सुन्दर लग रहा है ..और इतना ही नही ...सिर में देखो ...लाल पाग ...इसकी शोभा तो और अनुपम है ।

इस झाँकी का दर्शन करते हुये हित सखी को भाव आजाता है ...उसके नेत्रों से अश्रु बहने लगते हैं ...वो भाव विभोर है ......अरी सखियों !    ये वर्णन तो बहिरंग है इन युगल का ...बाहर से ही एक नही हैं ये ,   ये दोनों तो   आत्मा से भी एक  हैं ...बहिरंग ही जोरी नही बनी ...अंतरंग भी ये जोरी बनी है   ,  देखो तो !    

अद्भुत ! 

ये सखियाँ युगल के हृदय को भी समझती हैं ।   

  सखियों !   इनके हृदय में अभी भी प्रेम की चाह है ...दोनों के हृदय में ....अभी स्नान करके सज धज के भले ही बैठे हों  ये युगल ...किन्तु अभी भी   उसी  सुरत  रंग में रँगे हुये हैं .....एक दूसरे को छूते , देखते  इन्हें रोमांच हो रहा है ...ये अति अद्भुत झाँकी  आज ही दिखाई दी है ।   

इतना कहकर हित सखी मौन हो गयी । 

पागल बाबा भी मौन हो गये ....क्या बोलते इसके आगे ?   ये तो झाँकी थी जिसे निहारना था ..निहारना है अपने हृदय पटल में ...क्या उस अपार सौन्दर्य माधुर्य को बोला जाएगा ?  नही इस माधुर्य का तो बस पान किया जा सकता है । 

गौरांगी ने फिर  गायन किया इसी नौवें पद का ....सब झूम उठे थे ।

“बनी श्रीराधा मोहन जू की जोरी .......”

आगे की चर्चा अब कल - 

हरि शरणम् गाछामि
✍🏼श्रीजी मंजरी दास (श्याम प्रिया दास)

श्री हित चतुरासी जी पद संख्या 12




आज  के  विचार

!! राधा बाग में - “श्रीहित चौरासी” !! 

 ( जब हितसखी ने कहा -“अति ही अरुण तेरे नैंन री” ) 

26, 5, 2023

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गतांक से आगे - 

कौन है वो  जो इस “अद्वैत”को भी द्वैत बनाने में तुला है ? 

कौन है वो  जो इस आत्माराम में भी दूसरे के प्रति आकर्षण पैदा  कर रहा है ?  

कौन है वो  जो इस पूर्णानन्द को भी  अपूर्ण बनाने में लगा है ? 

जी ,  इसका एक ही उत्तर है .....”हित सखी”।  

साधकों !  परमात्मा की दो प्रकार की सृष्टि है ......एक जीवार्थ और एक आत्मार्थ । 

जीवार्थ - यानि जो जीव हैं  उनके लिए परमात्मा की सृष्टि ...और दूसरी है आत्मार्थ ......यानि अपने लिए सृष्टि ।   श्रीकृष्ण  परब्रह्म हैं ...वो अपने लिए , अपने आनन्द के लिए  सृष्टि करते हैं तो सबसे प्रथम  “श्रीवृन्दावन” को प्रकट करते हैं ...भई !  आपको रस लेना है ...उसी रस को रास बनाना है तो   स्थान तो चाहिये ...इसलिये वो प्रथम  स्थान की सृष्टि करते हैं .....फिर  उसके बाद  वो अपनी आत्मा को प्रकट करते हैं .....वो श्रीराधा के रूप में होती हैं ....दोनों मिलते हैं ...आनन्द और रस का मिलन हुआ  ,  सुख बरसा ,   पर जो सोचा था वो नही हुआ ।   प्रेम सिन्धु में जो तरंगे नित नवीन उठती रहें ....ये कैसे हो ?     

रास , ये एक में तो असम्भव ही है ....दो में मिलन हो सकता है ....किन्तु रास तो  दो में भी सम्भव नही है ...उसके लिए मण्डली  चाहिये ...तो क्या किया जाए !   तब ब्रह्म ने  अपने ही भीतर विराजमान “हित तत्व” को   आकार दिया ...उन्हें प्रकट किया । 

“हित” का अर्थ प्रेम होता है ....हित - साधारण शब्दों में “भला”  के लिए प्रयोग किया जाता है ....दूसरे  की भलाई की भावना जो है  - उसे “हित” कहते हैं । 

अब ये हिततत्व ऐसा प्रेमतत्व था ...जो सर्वभावेन  अपने प्रिय  के ही विषय में , उनके सुख में ,  उनके आनन्द की व्यवस्था में ही लगा  रहता था ।   इनके बिना सम्भव ही नही है कि वो ब्रह्म और उनकी आल्हादिनी   अपनी लीला  को प्रस्तुत कर पाते ।    इसलिये  ब्रह्म ने अपने रस को बढ़ाने के लिए  अपने से ही इस हिततत्व को प्रकट किया था ।    और यही हिततत्व “हित सखी” के रूप में प्रकट हो गयीं ।   ये ब्रह्म और आल्हादिनी की प्रेरयिता हैं ....इन  पूर्णानन्द में भी आकर्षण प्रकट करने वाली कोई हैं  तो वो हैं  - हित सखी ।  जो नाना रंगों को , जो नाना रसों को दिखाकर  प्रेरित करती हैं कि ...मिलो ,   प्रेरित करती हैं कि विलसो...प्रेरित करती हैं कि  तुम पूर्ण कहाँ हो ?    उस पूर्णानन्द को विस्मृति करा देती हैं कि तुम अपूर्ण हो ...ये हिततत्व का चमत्कार है ।  

प्रेम में अपने आपको भूलना ये भी  आवश्यक है ।  अपनी महिमा को अगर तुम समझते रहे कि मैं ये हूँ , कि मैं वो हूँ ...तो प्रेम का पूर्ण होना सम्भव नही है ...प्रेम में तो स्व माहात्म्य की विस्मृति आवश्यक है ।   ये हितसखी  दोनों को ही  दोनों के स्वरूप को भुलवा देती है ...श्याम सुन्दर भूल जाते हैं कि मैं परब्रह्म हूँ और श्रीराधा भूल जाती हैं कि मैं सर्वोच्च सत्ता की परम शक्ति हूँ ...ये विस्मृति प्रेम राज्य में आवश्यक है ...ये विस्मृति नही होगी  तो प्रेम का पुष्प खिलेगा नही ।   इसलिये इन युगल के विहार में  “हित सखी” की प्रधानता है ।   ये विलास , रास , महारास  ये सब हित सखी का ही  सुन्दर प्रबन्ध है ....चलिये  अब आनन्द लीजिये  उस प्रेमराज्य  का ...जहां श्याम सुन्दर हैं उनकी प्रिया हैं और मध्य में हित सखी है ...जो दोनों को मिलाना भी चाहती है और नही भी  । ये अद्भुत रस केलि है ।    और स्मरण रहे  - “यही सनातन है” ।

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आज पागलबाबा बहुत हंस रहे हैं ....
ये हंसते हैं तो बालकों की तरह हंसते हैं ...खिलखिलाते हुये हंसते हैं ।   इनके साथ राधा बाग भी हंस रहा है ....गौरांगी मेरी ओर देखती है ...वो भी हंस रही थी ।    

आज बड़े हंस रहे हैं बाबा ,आप तो ?    शाश्वत गम्भीर है  इसलिये ये प्रश्न भी उसी ने किया । 

बाबा के हंसते हुए अब अश्रु बहने लगे थे ...बाबा सामान्य बात या संसारी बात में हंसते नही हैं ...इनकी स्थिति बहुत ऊँची है ...पर ये अपनी स्थिति किसी को दिखाते भी तो नही है ।

“डर गये ...डर गये”.....बाबा स्वयं ही बोल उठे । 

कौन डरा ?     क्यों डरा ?      गौरांगी ने प्रश्न किया ।  

“लालन डर गये”.....बाबा की आँखें मत्त  हैं ।  

लालन क्यों डर गये ?     अब ये मेरा प्रश्न था ।  

लालन दवे पाँव आरहे थे श्रीजी  के पास  ...श्रीजी पर्यंक में लेटी थीं ....श्रीजी को डराने के लिए आरहे थे ....किन्तु जब उन्होंने श्रीराधा रानी की चोटी पर्यंक से नीचे लटकी हुई देखी ....तो साँप समझ कर डर गये ...और भाग गये ...बाहर जाकर उन्होंने दूसरी साँस ली ।      ये कहते हुए पागल  बाबा फिर हंस रहे थे । 

ओह !   तो ये लीला राज्य में थे .....और इनके सामने ये लीला आज प्रकट हुयी थी .....

हम बाबा को निहार रहे थे .....गदगद भाव से उन्हें देख रहे थे ...बाबा समझ गये  कि अब ये लोग मुझे महिमामण्डित करेंगे ...इनके मन में “मैं” आजाऊँगा ।   ये सोचकर बाबा तुरन्त गम्भीर हो गये ...बोले ...श्रीहित चौरासी जी कहाँ हैं ?  आज तो  आठवाँ पद है ...गाओ ।

शाश्वत ने कहा ....बाबा !  अभी  आधा घण्टा और है ...लोग आजाएँ ।    

बाबा बोले ...लोग आते रहेंगे ...हम तो श्रीजी को सुना रहे हैं ना ?    ले आओ वाणी जी और गान करो .....बाबा की आज्ञा , तुरन्त वाणी जी लाई गयी ....और आठवें पद का गायन गौरांगी ने जैसे ही आरम्भ किया ....रसिक जन दौड़े दौड़े आने लगे .....और राधा बाग में  श्रीहित चौरासी जी का ये पद गूंज उठा ।     आठवाँ पद । 

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                          अति ही अरुण तेरे नैंन नलिन री ! 

                     आलस जुत इतरात रँगमगे ,  भये निशि जागर मषिन मलिन री ।।

                   सिथिल पलक में उठत गोलक गति ,  विधयौ मोहन मृग सकत चलि न री ।।

                श्रीहित हरिवंश  हंस कल गामिनी ,  सम्भ्रम देत भ्रमरनि अलिन री ।8 । 

               अति ही अरुण तेरे ...............

 ( साधकों !  ये लीलाएं “कुछ समझने” के लिए नही हैं , कुछ ज्ञान, सन्देश आदि के लिए भी नही हैं ..ये सिर्फ ध्यान के लिए हैं ..चिन्तन के लिए हैं , उस लीला राज्य में आपकी गति हो इसलिए हैं ) 

अब बाबा सबको ध्यान कराते हैं ..........

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                                       ।। ध्यान ।।

सुन्दर चिद श्रीवृन्दावन है ...इसकी शोभा भी हर क्षण नवीनता को प्राप्त होती रहती है ....यमुना जी का आकार कंगन का है ...यमुना इस श्रीधाम की परिक्रमा लगाती हैं ....नवीन नवीन कुंजें हैं यहाँ ...जब जब  सखियों की इच्छा होती है जैसे कुँज की  , वैसा ही कुँज प्रकट हो जाता है ।  

लताओं की डाली पुष्पों के भार से झुकी हुई हैं ...उन लताओं के पत्ते चमकीले हैं ...उनमें चमक है ...उन्हीं लताओं में पक्षी गण बैठे रहते हैं ...ये भी मधुर मधुर गान सुना रहे हैं प्रिया प्रियतम को ।

कमल दल के दिव्य आसन में  युगल विराजे हैं ....दोनों में खूब बातें हुईं ...कलह भी हुआ ...कण्ठ में विराजित श्याम सुन्दर की मालावलि भी तोड़ दी प्रिया ने ।     

पर   अन्त में मिल गये ....श्याम सुन्दर देख रहे थे प्रिया की ओर ...तभी प्रिया ने अपने नयनों को थोड़ा ( अर्ध )मूँद लिया ...फिर मुस्कुराने लगीं ...श्याम सुन्दर प्रिया की इस छवि पर मुग्ध हो गये ...और प्रिया से फिर कहा ...एक बार और ...प्रिया फिर अपने नयनों को आधा मूँद कर मुस्कुरा दीं ....बस क्या था !  श्याम सुन्दर अपनी प्रिया की इस प्रेमपूर्ण झाँकी को देखकर  मूर्छित ही हो गये । 

प्रिया अपने प्रियतम को उठाने ही जा रही थीं कि अवसर देखकर हितसखी कुँज में चली आई । 

श्रीराधा जी अपनी सखी को देखती हैं ...वो कुछ कहतीं कि  सखी ही  श्रीराधा रानी के निकट जाकर बैठ जाती है ....नयनों के संकेत से पूछती हैं ...हितू ! क्या है ?    सखी श्रीजी  का हाथ छूती है बड़े प्रेम से ...फिर मन्द मुस्कुराती हुई कहती है ....”शिकारी ने आखिर वाण चला ही दिया ,  बेचारा मृग मूर्छित हो गया “ ये कहते  सखी हंसती है ...श्रीजी श्याम सुन्दर की ओर देख रही हैं ....फिर सखी की ओर देखती हैं  तो सखी कहती है ........

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( इस आठवें पद में सखी का श्रीजी के प्रति  शुद्ध सख्य भाव है ) 

अरी राधे !    तेरे नयन तो  अरुण नलिनी  के समान  हैं .....लालिमा लिए कमल के समान  ।  

क्यों ?     लाल क्यों हो रहे हैं तुम्हारे नेत्र ?  और अलसाये हुये से भी हैं ....काजल भी पुछ गया हैं ।

“देखो ! यहाँ फैल गया है”......अपने हाथ से काजल पोंछते हुए सखी कहती है ।  

श्रीराधा जी कुछ नही कहतीं ...वो कुछ शरमा सी गयीं हैं ।

मैं मैं  समझ गयी ......सखी आह भरते हुए कहती है ....

बोल , बोल क्या समझी ?   श्रीराधारानी पूछती हैं ।

यही कि रात भर के  जागरण ने आपके नेत्र अरुण कर दिये हैं ....और ये नेत्र तो ऐसे लग रहे हैं ....

सखी इतना बोलकर फिर चुप हो जाती है ...तो श्रीराधा जी  उससे तुरन्त पूछती हैं ....

मेरे नेत्र कैसे लग रहे हैं ? 

तो सखी हंसती है ..ताली बजाकर हंसते हुए कहती ...ऐसे लग रहे हैं जैसे रात्रि में किसी ने इन्हें रँग दिया हो.....उफ़ !  रँगे हुए हैं ये नयन ।   और हाँ प्यारी जू !   ये रंगने के कारण इतरा भी रहे हैं ।   

श्रीराधा जी कुछ नही बोलतीं और शरमाते हुए नयनों को झुका लेती हैं । 

हाँ , सच कह रही हूँ.....ये आपके नयन इतरा रहे हैं .....और इतरायें भी क्यों न ...सखी कहती है - मोहन रूपी मृग का इन्होंने शिकार किया है और देखो , मूर्छित कर दिया ।   तभी  थक गयी हैं  आपकी पलकें ..इसलिए झुकी हुयी हैं ...थकान हो गयी शिकार करते हुए.... इसलिये ये नयन लाल हो रहे हैं ...सखी गदगद होकर कहती है .....तभी कुँज के भ्रमर नाना पुष्पों को छोड़कर श्रीजी के ऊपर मँडराने  लगते हैं .....तो सखी हंसते हुये कहती है ....लो , इन भ्रमरों को भी भ्रम हो गया है की  ये नयन नही कमल ही हैं ...और प्रातः के समय का खिला कमल ।   आहा !  हे प्यारी जू !  अब उठाओ इस मृग को ....और अपने हृदय से रस पान का कराओ ..नही तो ये मृग तो गया ।

इतना कहकर खिलखिलाकर सखी हंस पड़ी ...
श्रीराधा जी उस अपनी प्यारी सखी को हृदय से लगा लेती हैं । 

इतना ही बोले पागल बाबा आज ।   इसके आगे भी बोलने वाले थे पर इनकी भी वाणी पंगु हो गयी थी ...क्यों की ये दर्शन कर रहे थे  प्रिया प्रियतम के , और बोल रहे थे ।

फिर  गौरांगी ने इसी श्रीहित चौरासी जी के आठवें पद का गायन किया ....

“अति ही अरुण तेरे नैंन नलिन री .......”

आगे की चर्चा कल - 
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राधे राधे सभी वेष्णव जन को
✍️ हरि शरण 

braj ras divas 3

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