Monday, September 29, 2025

निकुंज लीला 1

निकुञ्ज का एकान्त कक्ष। श्रीप्रियाजी मखमली सिंहासन पर अकेली बैठी हैं। उन्होंने धीरे से पुकारा- चित्रा!

अपना नाम सुनते ही श्रीचित्रा उपस्थित हो गयी। नयनों की भाषा में चित्रा पूछ रही थी कि क्या आदेश है? 

श्रीचित्रा पर दृष्टि जमाये श्रीप्रियाजी ने कहा- क्या तुम मेरा एक काम कर दोगी?

श्रीचित्रा ने विनम्र स्वर में कहा- मैंने कब किसी कार्य के लिये ना कहा है?

श्रीप्रियाजी- यह तो मैं जानती हूँ, पर आज जो कहूँगी, उसके लिये तुम आनाकानी तो नहीं करोगी?

श्रीचित्रा- तुम कहो तो सही। मैं न ना कहूँगी और न आनाकानी करूँगी।

श्रीचित्रा का कथन आदेश पालन की भावना से भरपूर था।श्रीप्रियाजी- मैं जो कहूँगी, उसके बीच में कोई प्रश्न मत करना और न इसकी चर्चा कहीं अन्यत्र करना। मैं जो कहूँ, वैसा कर देना। श्रीप्रियाजी ने जो कहा, उनके शब्द-शब्द से अपार प्यार झर रहा था। श्रीचित्रा की चित्तवृत्ति अत्युत्सुक थी कि श्रीप्रियाजी आज क्या अनोखी बात कहने वाली हैं। 

सुनने के लिये अति तत्परा चित्तवाली श्रीचित्रा से श्रीप्रियाजी ने कहा- तुम एक चित्र बना दो। सुन्दर चित्र, एक ललिता का, एक विशाखा का एक तुम अपना।

श्रीचित्राजी बीच में ही बोल पड़ीं- मेरा और मेरी बहिनों का चित्र क्यों बनवा रही हो?

श्रीप्रियाजी- देखो, देखो, तुम बीच में ही बोल पड़ी न? मैंने कहा था न कि बीच में कुछ प्रश्न मत करना।

श्रीचित्रा- ठीक है। उत्सुकतावशात् प्रमाद हो गया। अब मैं नहीं  पूछूंगी। श्रीचित्रा ने विश्वास दिलाया।

श्रीप्रियाजी- तुम ललिता, विशाखा, अपना, इन्दुलेखा, चम्पकलता, रंगदेवी, तुंगविद्या और सुदेवी इन सभी का एक-एक सुन्दर चित्र बना दो।

श्रीचित्रा ने कहा- जैसी आज्ञा। श्रीचित्रा ने एक-दो दिन में आठों बहिनों के आठ चित्र बनाकर दे दिये। श्रीप्रियाजी ने उन आठों चित्रों को चन्दन की मञ्जूषा में सहेजकर और सँभाल कर रख लिया। श्रीचित्रा के मन में बड़ी जिज्ञासा थी कि इन चित्रों को बनवाने का प्रयोजन क्या है? पूछने पर श्रीप्रियाजी बतलायेंगी नहीं और प्रयोजन जानने की उत्सुकता उत्तरोत्तर बढ़ती ही जा रही थी।

एक रात श्रीचित्राजी के उकसाये जाने पर मैंने बात को टटोलने का प्रयास किया। प्रयास सफल भी हो गया। निकुञ्ज के छिद्र-रन्ध्र से चुपचाप झाँककर मैंने जो देखा, उसे देखकर अपार विस्मय हुआ।

श्रीप्रियाजी ने चन्दन की मञ्जूषा से श्रीललिताजी का चित्र निकाला। उस चित्र को श्रीप्रियाजी ने प्रणाम किया, उसे छाती से लगाया, कपोलों से चिपकाया और फिर उसे निहारते हुए वे कहने लगीं- ललिते! जैसी तेरी सेवापरायणता है, उसके कणांश का भी उद्भव मेरे जीवन में कभी होगा क्या? मेरी बहिनि! तुम कितनी महान् हो, जो हम दोनों के लिये सतत और सर्वथा सर्वार्पण किये रहती हो। मैं तेरे चित्र को प्रणाम करती हूँ। शायद इसी से तेरा यह महान् सद्गुण प्रियसुख-संवर्धनशीलता मेरे अन्तर में भी संक्रमित हो जाय।

जिस प्रकार श्रीललिताजी के चित्र के प्रति वन्दन-निवेदन आदि श्रीप्रियाजी ने किया, वैसा ही अन्य बहिनों के चित्रों के प्रति भी किया।

मैं मन-ही-मन पुकार उठी- इस भाव-गरिमा की जय हो! जय हो!! मैं बलि-बलि जाऊँ।

Saturday, July 12, 2025

गो प्रेम गौ के श्याम 1

        
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         ━❀꧁ हरे कृष्ण ꧂❀━ 
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      *"कृष्ण का गऊ प्रेम”*  
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एक दिन कान्हा नन्दभवन से निकलकर सीधा गोशाला में पहुँच गये। वहाँ पर एक गाय उन्हें अपना दूध पिलाने के लिये उनकी प्रतिक्षा कर रही थी। वात्सल्य-स्नेह से उस गाय का दूध अपने आप झरता जा रहा था। वह वात्सल्य वश व बालक श्रीकृष्ण के दर्शन के हेतु एकटक दृष्टि नन्दभवन दरवाजे पर लगाये थी कि कब कान्हा बाहर निकले और वह उन्हें अपना दूध पिलाकर अपना जीवन सार्थक कर सके। 

अब कान्हा भी उसके पवित्र प्रेम की उपेक्षा भला कैसे करते ! वह नन्द भवन से निकलकर गोशाला में सीधे उस गाय के पास पहुँचे और उसके थन में मुँह लगाकर लगे उसका दूध पीने लगे। इधर कान्हा तो दुग्धपान का आनन्द ले रहे थे।  वहाँ नन्दभवन में मईया यशोदा बालक कृष्ण को ढूंढ़ कर परेशान हो रही थी। मईया यशोदा जी कन्हा को चारों तरफ़ देख रही थीं।  वे बार-बार कान्हा-कान्हा करके कान्हा को पुकार रही थीं। 

कान्हा ! ओ कान्हा ! तू कहाँ गया, अरे जल्दी से आ भी जा ! मैं कब से तेरी प्रतीक्षा कर रही हूँ, लेकिन जब कान्हा होता तब न सुनता, वह तो अपनी गाय का दूध पी रहा था। माता यशोदा उसे पुकारती हुई सोच रही थी, पता नही कन्हैया कहाँ चला गया। उसने अभी तक सुबह से कुछ खाया भी नही है। थक हारकर उन्होंने बालक कृष्ण को बाहर ढूंढ़ना शुरु किया। उन्होंने खिड़की से बाहर झांककर देखा, तो चकित होकर देखती ही रह गयीं। कान्हा तो अपनी गोमाता के थन में मुँह लगाकर दूध पी रहा है। गाय प्रेम व वात्सल्य से कन्हैया का सिर चाट रही है।
      
यशोदा मैया ने कहा कि हे गोमाता ! तू धन्य है !  मैं तो अभी तक अपने कान्हा के कलेवा की चिन्ता कर रही थी, और तूने तो उसे दूध भी पिला दिया। मैं तुम्हें शत-शत नमन करती हूँ। यहाँ कान्हा की अदभुत गौ प्रेम की लीला का अद्भुत और विलक्षण दृश्य है।
    
भगवान श्री कृष्ण ने भी गोमाता की पूजा की थी। पूजा का मन्त्र है–’ऊँ सुरभ्यै नम:


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हरे ......कृष्णा....हरे.....कृष्णा...कृष्णा..
कृष्णा.....हरे ....हरे....हरे....राम..हरे.....
राम......राम.......राम.....हरे.....हरे.....
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     ━❀꧁𝐻𝑎𝑟𝑒 𝐾𝑟𝑖𝑠ℎ𝑛𝑎꧂❀━
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Friday, July 11, 2025

गुरु पूर्णिमा का अर्थ ओर क्यों मनाते हे सनातनी यह पर्व जानिए इतिहास (gurupurnima meaning)


         ━❀꧁ हरे कृष्ण ꧂❀━ 

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       ☺ *”व्यास–गुरु पूर्णिमा”* ☺ 
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महर्षि वेदव्यास जी अमर हैं। महान विभूति वेदव्यास का जन्म आषाढ़ पूर्णिमा को लगभग 3000 ई. पूर्व में हुआ था। महर्षि व्यास का पूरा नाम कृष्णद्वैपायन है। उन्होंने वेदों का विभाग किया, इसलिए उनको व्यास या वेदव्यास कहा जाता है। उनके पिता महर्षि पराशर तथा माता सत्यवती है। 
           
भारत भर में गुरुपूर्णिमा के दिन गुरुदेव की पूजा के साथ महर्षि व्यास की पूजा भी की जाती है। महर्षि वेदव्यास भगवान विष्णु के कालावतार माने गए हैं। द्वापर युग के अंतिम भाग में व्यासजी प्रकट हुए थे। उन्होंने अपनी सर्वज्ञ दृष्टि से समझ लिया कि कलियुग में मनुष्यों की शारीरिक शक्ति और बुद्धि शक्ति बहुत घट जाएगी। इसलिए कलियुग के मनुष्यों को सभी वेदों का अध्ययन करना और उनको समझ लेना संभव नहीं रहेगा।
           
व्यासजी ने यह जानकर वेदों के चार विभाग कर दिए। जो लोग वेदों को पढ़, समझ नहीं सकते, उनके लिए महाभारत की रचना की। महाभारत में वेदों का सभी ज्ञान आ गया है। धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र, उपासना और ज्ञान-विज्ञान की सभी बातें महाभारत में बड़े सरल ढंग से समझाई गई हैं।
           
इसके अतिरिक्त पुराणों की अधिकांश कथाओं द्वारा हमारे देश, समाज तथा धर्म का पूरा इतिहास महाभारत में आया है। महाभारत की कथाएं बड़ी रोचक और उपदेशप्रद हैं। सब प्रकार की रुचि रखने वाले लोग भगवान की उपासना में लगें और इस प्रकार सभी मनुष्यों का कल्याण हो। इसी भाव से व्यासजी ने अठारह पुराणों की रचना की। ‘श्रीजी की चरण सेवा’ की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ को फॉलो तथा लाईक करें और अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें। इन पुराणों में भगवान के सुंदर चरित्र व्यक्त किए गए हैं। भगवान के भक्त, धर्मात्मा लोगों की कथाएं पुराणों में सम्मिलित हैं। इसके साथ-साथ व्रत-उपवास को की विधि, तीर्थों का माहात्म्य आदि लाभदायक उपदेशों से पुराण परिपूर्ण है।
           
वेदांत दर्शन के रचना करने वाले महर्षि वेदव्यास ने वेदांत दर्शन को छोटे-छोटे सूत्रों में लिखा गया है, लेकिन गंभीर सूत्रों के कारण ही उनका अर्थ समझने के लिए बड़े-बड़े ग्रंथ लिखे हैं। 
           
धार्मिक मान्यता के अनुसार ही गुरुपूर्णिमा पर गुरुदेव की पूजा के साथ ही महर्षि व्यास की पूजा भी की जाती है। हिन्दू धर्म के सभी भागों को व्यासजी ने पुराणों में भली-भांति समझाया है। महर्षि व्यास सभी हिन्दुओं के परम पुरुष हैं।
                                             
                      “ॐ श्रीगुरुवे नमः”

        
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Friday, July 4, 2025

चकित चकवा मानसिक रूप-लीला चिंतन

चकित चकवा
राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा.....

श्रीयुगल रसिकों के रास-विहार के दर्शन में विमुग्ध-विलुब्ध चकवे को पता ही नहीं चला कि मध्य रात्रि की बेला हो गयी। निशान्त बेला के उपरान्त श्रीयुगल रसिकों के सहनृत्य का शुभारम्भ हुआ था। नृत्य की अद्भुत गति ने सभी को विमोहित कर रखा था। किसी को भी समयका भान नहीं था। अपने अस्तित्व को भूले हुए सभी तादात्म्यभाव में निमग्न थे।

भाव के किञ्चित् शमित होने पर चकवे ने देखा कि मैं अपनी चकवी के पास वृक्ष की शाखा पर बैठा हुआ हूँ और मेरी चकवी मेरे पार्श्व में बैठी रास-विहार को देख रही है। चकवे को विस्मय हो रहा था कि रात हो गयी है, इसके बाद भी मेरी चकवी मेरे समीप है। विधाता के विधान के अनुसार इसे अलग हो जाना चाहिये था। विधाता को मैं सदा ही कोसता रहता हूँ कि उसने यह क्या विधान बनाया कि चकवी रातभर के लिये चकवे से अलग हो जाया करती है। प्रिय का विलग हो जाना कितना प्रपीड़ित करता है, यह वह विधाता क्या जाने? घायल ही घायल के मर्म को जान पाता है। आज विधाता के विधान में यह अपवाद कैसे हो गया?

चकवा अपने अन्तर के विस्मय को छिपा नहीं पाया। वह समीप बैठी अपनी चकवी से पूछ बैठा- आज यह कैसे सम्भव हो गया कि सूर्यास्त के बाद चकवी-चकवा का जो पारस्परिक बिलगाव हुआ करता है, वह इस समय नहीं हुआ? अब तो आधी रात होने को आयी और तुम तब से अब तक सतत मेरे पास हो। यह कैसे हो गया?

चकवी ने अनुमान लगा लिया कि इसे अभी श्रीप्रिया-प्रियतम के रसराज्य के अनोखेपन का परिज्ञान नहीं है। चकवी ने बतलाना आरम्भ किया- वह देखो, श्रीयमुनाजी के मन्थर प्रवाह की ओर। तट के समीप कितने कमल खिले हुए हैं! कमल भी अनेक रंग के हैं। क्या रात को कमल खिलते हैं? सूर्यास्त होते ही इन कमलों को सम्पुटित हो जाना चाहिये था, परन्तु रास-विहार की दिव्य लीला के अनुरूप आकर्षक वातावरण के निर्माण के लिये ये कमल तनिक भी संकुचित या सम्पुटित नहीं हुए, अपितु पूर्ण रूप से विकसित हैं। यहाँ क्या विधाता के विधान का किसी भी रूप में कोई अनुशासन है? सत्य तो यह है कि वह विधाता और उसका वह विधान ही यहाँ के अनुशासन से अनुशासित रहता है, सदा संकुचित रहता है। उस विधि-विधान का इस लीला-राज्य में प्रवेश ही नहीं। दिव्य लीला के रसोत्कर्ष में जो भी आवश्यक होगा, वह सब यहाँ होगा और देखो, जिस वृक्ष पर हम दोनों बैठे हैं, उस वृक्ष के मूलभाग की ओर देखो।

चकवी के कहने पर वह चकवा, जो श्रीयमुनाजी में विकसित कमलों को साश्चर्य देख रहा था, उस चकित चकवे ने पुनः साश्चर्य देखा कि वृक्ष के मूलभाग में एक बड़े सर्प के फैले फण पर एक मेढक बैठा है। मेढक को सर्प के फण पर बैठे हुए देखकर चकवा चकित स्वर में बोल पड़ा- मेढक तो सर्प का भोजन है। भक्ष्य मेढक से सर्प को इतना प्यार?

चकवी ने फिर समझाना आरम्भ किया- विधाता की त्रिगुणात्मक सृष्टि में मेढक सर्प का भक्ष्य हो सकता है, परन्तु श्रीप्रिया-प्रियतम के इस त्रिगुणातीत प्रेम-राज्य में वह मेढक भी सर्प के द्वारा लाल्य है। मेढक को सर्प ने अपने फण पर इसलिये बैठा रखा है कि वह ऊँचे बैठकर भली प्रकार से रास-विहार का दर्शन कर सके। तुम यह मान लो, पूर्णतः मान लो कि ब्रह्मा की जड़-चेतनात्मक, गुण-दोषमय सृष्टि के संचालन संतुलन के लिये विधि-निषेध के विविध नियम ब्राह्मी सृष्टि का नियमन नियंत्रण भले करते रहें, परन्तु श्रीप्रिया-प्रियतम का नित्य निर्विकार और नितान्त निर्मल निकुञ्ज राज्य उन विविध नियमों की नियमन परिधि से सर्वथा परे है। यहाँ निकुञ्ज-राज्य में वही होगा, जो प्रीति का पोषक हो, जो परसुख प्रदायक हो और जो श्रीप्रिया-प्रियतम की रस-रीति के उत्कर्ष में सहायक हो। तभी तो तुम मेरे पास हो, मैं तुम्हारे पास हूँ, तभी रात में भी कमल विकसित होते हैं और सर्प भी मेढक से प्रीति रखता है।

विस्मय में डूबा चकवा सिहर-सिहरकर बोल उठा श्रीप्रिया-प्रियतम के इस अनोखे रस-राज्य की जय हो, सदा जय हो, इसकी बार-बार बलिहारी

🙏🙏 राधे श्याम जी 🙏🙏
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Wednesday, June 18, 2025

घन श्याम मोहन और श्याम घन मोहन मानसिक रूप-लीला चिंतन 32

घनश्याम और श्याम घन

राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा.....

सावन मास की लुभावनी रात। अभी मध्य रात्रि में पर्याप्त देर है । निकुञ्ज-भवन के बरामदे में मखमली बिछावन बिछा हुआ है। बरामदे के सामने प्रकृति का उन्मुक्त प्रांगण है। मखमली बिछावन पर श्रीप्रिया-प्रियतम विराज रहे हैं। अपने प्रियतम को रिझाने के लिये श्रीप्रियाजी आलाप कर रही हैं। आस पास बैठी हुई सखियाँ-मञ्जरियाँ-सहचरियाँ भी श्रीप्रियाजी की आलापचारी को उत्कण्ठापूर्वक सुन-सुनकर विभोर हो रही हैं। अमावास्या की तिथि होने से सर्वत्र अँधेरा है। इस अँधेरे का भी एक आकर्षण हैं। इसके कजरारेपन में भी एक सलोनापन है। श्रीप्रियाजी हैं ही श्याम-प्रेमिका। श्रीप्रियाजी की रुचि को देखकर ही अति मन्द प्रकाश का विकास करने वाले मणि-दीपक प्रज्वलित किये गये हैं।

आकाश में श्याम मेघ छाये हुए हैं। बस, वे छाये हैं, परन्तु बरस नहीं रहे हैं। सावन मास की अँधेरी रात के समय कजरारे बादलों को देखकर श्रीप्रियाजी ने मल्हार राग की रागिनी छेड़ दी। समीपस्थ श्रीललिताजी वीणा पर स्वर दे रही हैं। श्रीप्रियतम भी सुर में सुर मिलाते हुए वंशी-वादन कर रहे हैं।

सारे वातावरण में राग-रंग छाया हुआ है। राग की रागिनी से सभी का मन तरंगित है। श्रीप्रियतम का मन भी तरंगित है, परन्तु इस तरंग के साथ ही उनके मन में एक कसक भी है। श्रीप्रियतम के मन में घनी कसक है कि श्रीप्रियाजी की मुखछवि का दर्शन नहीं हो पा रहा है। एक तो सावन की अमावास्या वाली अँधियारी और फिर मणि दीपक का प्रकाश भी अति मन्द।

सभी आनन्द में निमग्न हैं, विभोर हैं। श्रीप्रियाजी उमंग में भरकर गायें और फिर आनन्द उमड़ न पड़े, यह भला कैसे हो सकता है? आनन्द का सागर उमड़ रहा है, उफन रहा है और उस सागर की लहरों पर सभी लहरा रहे हैं। बस, थोड़ी-सी कसर है। वह कसर है कसक के रूप में, जो व्याप्त हो रही है प्रियतम श्रीश्यामसुन्दर के अन्तर में।

इन घनश्याम के अन्तर की चुभती कसक संक्रमित हो गयी उन नभचारी श्यामघन के अन्तर में और तभी घने श्यामल मेघों के मध्य बिजली कौंधी। विद्युल्लता के चमकते ही प्रकाश में चमक उठी भावलतिका श्रीप्रियाजी की मुख-कान्ति। इसी मुख-शोभा के ही तो प्यासे थे श्रीश्यामसुन्दर के कजरारे नयन। श्रीप्रियतम के नयनों में छा गयी उल्लाससनी आनन्द की रेखाएँ। उल्लसित-आनन्दित श्रीश्यामल प्रियतम के अन्तर का आह्लाद भी संक्रमित हो उठा उन नभचारी बादलों के अन्तर में और आहलादातिरेक में वे भी मन्द मन्द गर्जन करने लगे। मन्द मन्द गर्जन भी सोद्देश्य है। तीव्र गर्जन से तो श्रीप्रियाजी की राग-रागिनी के उल्लास में व्यवधान उपस्थित हो जाता। इस मन्द गर्जन ने भी उद्दीपन का ही कार्य किया। पावस ऋतु के इस लुभावने-सुहावने रंगभरे वातावरण ने श्रीप्रियाजी के अन्तर में अधिकाधिक उमंग उद्दीप्त कर दी। निकुञ्ज के बरामदे में अद्भुत समाँ बँध गया।

नभ के श्यामल मेघ रह-रह करके श्रीप्रियाजी के उमंग की और श्रीप्रियतम के आह्लाद की जयकार मना रहे हैं और विद्युल्लता रह-रह करके बलिहार जा रही है इन युगल रसिकों के उमंग पर, आह्लाद पर।

राधे राधे 
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Monday, June 9, 2025

नेत्रहीन संत

*🌹🌹!! नेत्रहीन संत !!🌹🌹*

*एक बार एक राजा अपने सहचरों के साथ शिकार खेलने जंगल में गया था। वहाँ शिकार के चक्कर में एक दूसरे से बिछड़ गये और एक दूसरे को खोजते हुये राजा एक नेत्रहीन संत की कुटिया में पहुँच कर अपने बिछड़े हुये साथियों के बारे में पूछा।*

*नेत्र हीन संत ने कहा महाराज सबसे पहले आपके सिपाही गये हैं, बाद में आपके मंत्री गये, अब आप स्वयं पधारे हैं। इसी रास्ते से आप आगे जायें तो मुलाकात हो जायगी। संत के बताये हुये रास्ते में राजा ने घोड़ा दौड़ाया और जल्दी ही अपने सहयोगियों से जा मिला और नेत्रहीन संत के कथनानुसार ही एक दूसरे से आगे पीछे पहुंचे थे।*

*यह बात राजा के दिमाग में घर कर गयी कि नेत्रहीन संत को कैसे पता चला कि कौन किस ओहदे वाला जा रहा है। लौटते समय राजा अपने अनुचरों को साथ लेकर संत की कुटिया में पहुंच कर संत से प्रश्न किया कि आप नेत्रविहीन होते हुये कैसे जान गये कि कौन जा रहा है, कौन आ रहा है ?*

*राजा की बात सुन कर नेत्रहीन संत ने कहा महाराज आदमी की हैसियत का ज्ञान नेत्रों से नहीं उसकी बातचीत से होती है। सबसे पहले जब आपके सिपाही मेरे पास से गुजरे तब उन्होंने मुझसे पूछा कि ऐ अंधे इधर से किसी के जाते हुये की आहट सुनाई दी क्या ? तो मैं समझ गया कि यह संस्कार विहीन व्यक्ति छोटी पदवी वाले सिपाही ही होंगे।*

*जब आपके मंत्री जी आये तब उन्होंने पूछा बाबा जी इधर से किसी को जाते हुये..... तो मैं समझ गया कि यह किसी उच्च ओहदे वाला है, क्योंकि बिना संस्कारित व्यक्ति किसी बड़े पद पर आसीन नहीं होता। इसलिये मैंने आपसे कहा कि सिपाहियों के पीछे मंत्री जी गये हैं।*
*जब आप स्वयं आये तो आपने कहा सूरदास जी महाराज आपको इधर से निकल कर जाने वालों की आहट तो नहीं मिली तो मैं समझ गया कि आप राजा ही हो सकते हैं। क्योंकि आपकी वाणी में आदर सूचक शब्दों का समावेश था और दूसरे का आदर वही कर सकता है जिसे दूसरों से आदर प्राप्त होता है। क्योंकि जिसे कभी कोई चीज नहीं मिलती तो वह उस वस्तु के गुणों को कैसे जान सकता है!*

*दूसरी बात यह संसार एक वृक्ष स्वरूप है- जैसे वृक्ष में डालियाँ तो बहुत होती हैं पर जिस डाली में ज्यादा फल लगते हैं वही झुकती है। इसी अनुभव के आधार में मैं नेत्रहीन होते हुये भी सिपाहियों, मंत्री और आपके पद का पता बताया अगर गलती हुई हो महाराज तो क्षमा करें।*

*राजा संत के अनुभव से प्रसन्न हो कर संत की जीवन व्रत्ति का प्रबंन्ध राजकोष से करने का मंत्री जी को आदेशित कर वापस राजमहल आया।*

शिक्षा:-

*आजकल हमारा मध्यमवर्ग परिवार संस्कार विहीन होता जा रहा है। थोड़ा सा पद, पैसा व प्रतिष्ठा पाते ही दूसरे की उपेक्षा करते हैं, जो उचित नहीं है। मधुर भाषा बोलने में किसी प्रकार का आर्थिक नुकसान नहीं होता है। अतः मीठा बोलने में कंजूसी नहीं करनी चाहिये।*

🙏🙏

Wednesday, April 2, 2025

श्री कृष्ण-उद्धव संवाद 3

आज के विचार

!! उद्धव प्रसंग !!

{ "कृष्ण का प्रेम वैचित्र अवस्था" - उद्धव प्रसंग }

भाग-3

गच्छोद्धव ब्रजम् सौम्य...   (श्रीमद्भागवत)

मेरे गुरु बृहस्पति जी ने मुझ से कहा था... कृष्ण पूर्णब्रह्म हैं ।

इसीलिए तो मेरा उस देवलोक में भी इतना सम्मान हुआ... 

मैं ही तो था उस देवलोक में विद्याध्यन के लिए पहुँचा एक मानव ।

पर मेरा कितना सम्मान किया... समस्त देवों ने ।

और तो और... स्वयं मेरे गुरुदेव बृहस्पति ने... अपने आसन से उठकर मुझे हृदय से लगा लिया था ।

कई दिनों के बाद एकान्त पाकर मैंने अपने गुरु बृहस्पति से जब इसके बारे में पूछा... तो उनका उत्तर यही था... परब्रह्म श्री कृष्ण तुम्हारे मित्र हैं... और उद्धव ! मेरा भी यह परमसौभाग्य है कि पूर्णपुरुषोत्तम श्री कृष्ण के प्रिय मित्र का गुरु... मैं बन रहा हूँ ।

मेरे गुरु बृहस्पति ने मुझ से ये सब कहा था... और मेरे गुरुदेव की वाणी मिथ्या कैसे हो सकती है ।

पर पूर्णब्रह्म आज बिलख रहा है !...पुरुषोत्तम आज नयनों से अविरल अश्रु बहा रहा है !

और वो भी गवाँर गोपियों के लिये ?

उद्धव कृष्ण के चरणों में बैठे हैं... रात्रि हो गयी है ।

यमुना से कृष्ण का हाथ पकड़ कर... सम्भालते हुए लेकर आये हैं उद्धव ।

पर आते ही बिना कुछ भोजन किये कृष्ण सो गए थे ।

कुछ देर तक तो उद्धव चरण दबाते रहे... पर नींद में खलल न पड़े... ऐसा सोचकर... चादर ओढ़ा कर वहीं बैठे रहे थे उद्धव ।

मुखारविन्द देखते रहे कृष्ण का... उद्धव ।

आत्माराम आप्तकाम परब्रह्म पूर्णपुरुषोत्तम...श्री कृष्ण इतने विह्वल !

गोपियों के लिये... गवाँर गोपियों के लिए ? 

नही... कल सन्ध्या में यमुना के किनारे मैंने गोपियों के लिए "गवाँर" शब्द का प्रयोग किया... तो कृष्ण रुष्ट हो गए थे ।

अनपढ़ कह सकते हो उद्धव !... पर गवाँर मत कहो... 

कितनी आत्मीयता से कहा था कृष्ण ने... कितनी आत्मीयता है उन गोपियों के प्रति कृष्ण की ।

क्या है ऐसा उन गोपियों में ? 

उद्धव यही सोचते हुये... चरणों में बैठे हैं... अर्धरात्रि हो गयी है ।

मैया ! 

यही पुकारा था... एकाएक नींद में ही कृष्ण ने यही पुकार लगाई थी ।

कोई स्वप्न देख लिया शायद कृष्ण ने... उद्धव ने मुखारविन्द पोंछा कृष्ण का... पसीने जो आगये थे... उन नीलमणी कृष्ण के ।

मैया ! 

 इस बार हँसे थे... कृष्ण ।

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कन्हैया ! 

 अर्ध रात्रि में चिल्ला उठी थी वृन्दावन में मैया यशोदा ।

अपने अगल बगल टटोला था... हाथों से... पर नही है बगल में कृष्ण तो... उठीं मैया...... कहाँ गया कन्हैया ? 

दीया जलाया... अर्धरात्रि में यशोदा ने ।

अरे ! यहाँ तो नही है... 

फिर थोड़ी सहज हुयीं... अच्छा ! रात में अपने पिता नन्द के पास जाकर सो जाता है ना !... हाँ... वहीं गया होगा ।

यशोदा गयीं नन्द महाराज के पास ।

अरे ! यहाँ भी नही है कन्हैया तो । नन्द महाराज के पास में जब देखा... नही है वहाँ भी कृष्ण... तो घबड़ा गयीं ।

क्या खोज रही हो यशोदा ? 

नन्द बाबा को भी कहाँ नींद है !

अपना कन्हैया कहा गया ?

मेरे पास भी नही है... और आपके पास भी नही है... वैसे इतनी रात्रि को तो वो कहीं जाएगा नही ।

घबड़ा रही हैं यशोदा ।

कहीं कंस के राक्षस तो ? भयभीत है यशोदा ।

अपने आँसुओं को पोंछते हुए... उठकर बैठ गए महाराज नन्द ।

यशोदा बैठो यहाँ... अपने पास बैठाया यशोदा को नन्दराय ने ।

 !...वो अभी उठ कर अपनी छोटी गौ के पास गया होगा । यशोदा ने कहा । 

यशोदा वह तो मथुरा के महल में है।.... नन्द राय ने कहा ।

ओह !...यशोदा हँसी... पर हँसी के साथ साथ... उसके नयनों के पनारे भी खुल गए थे ।

हाँ... मैं भी पागल हूँ... मुझे अभी भी इसी जगह वह दिखाई देता है... मेरे कानों में अभी भी... उसकी वही किलकारियाँ गूँजती रहती हैं ।

सुनो ! नन्द जी !...वो आएगा ना ? 

बताओ ना ? मेरा कन्हैया फिर आएगा ना ? 

इस वृन्दावन में आएगा ना ? 

अपनी इस बूढ़ी मैया को देखने आएगा ना ?

उसने कहा था... वो आएगा...वो आएगा... वो आएगा ।

यशोदा मूर्छित हो गयीं थीं ये कहते हुए ।

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मैया ! 

नींद में जोर से बोलते हुए कृष्ण एकाएक उठ गए ।

अपने अगल बगल में देखा... मैया ! पर यहाँ तो कोई मैया नही है... आँखों को मलते हुए... कृष्ण ने जब ध्यान से सामने देखा तो उद्धव थे ।

कौन ? मनसुख ? 

नही... मैं उद्धव ।

ओह ! मैं मथुरा में हूँ... कृष्ण के आँसू फिर बह चले थे ।

कुछ देर कृष्ण ऐसे ही बैठे रहे... 

फिर बोले - उद्धव ! तुम जाओ ना... मेरे वृन्दावन जाओ ना !

बोलो... जाओगे ना ? 

हाँ...नाथ ! आपकी हर आज्ञा शिरोधार्य है ।

उद्धव ने कहा ।

सुनो ! तुम जाकर मेरे माता पिता को समझाना... उनको कहना क्यों याद करते हो ! 

और मेरी गोपियों को भी समझाना... उनको समझाना ।

और उद्धव ! अपने दोनों हाथों से उद्धव का बायां हाथ पकड़ कर कृष्ण ने दबाया था । समझाना… कहना - वो क्यों मुझे याद करती हैं... ? कहना - उनका कन्हैया तो उनको बिलकुल याद नही करता... कृष्ण ने जैसे ही ये कहा... उद्धव ने कृष्ण की आँखों में देखा... नजरें झुका ली थी कृष्ण ने ।

क्या सच में आप याद नही करते वृन्दावन को... और वहाँ के वासियों को ?

कृष्ण उद्धव के गले लग गए... और हिलकियों से रो पड़े... नही करता मैं उन्हें याद... बिलकुल नही करता ।

फिर ये सब क्या है भगवन् ? 

उद्धव ने गम्भीर होकर पूछा ।

आप रो रहे हैं ? 

आपके नेत्रों में अश्रु ? 

नाथ ! ये सब तो झूठ है... मिथ्या है... मिलन वियोग सब मिथ्या है ।

फिर ये सब आँसू क्यों बहाना ? उद्धव ने पूछा कृष्ण से ।

हाँ... हाँ... बहुत बढ़िया उद्धव ! बस... यही बात उनको जाकर समझाओ... कृष्ण ने उद्धव के कन्धे में हाथ रखते हुए कहा ।

तुम बहुत अच्छा बोलते हो... उद्धव ! तुम तो बृहस्पति के शिष्य हो ना... ज्ञानियों में सर्वश्रेष्ठ है मेरा उद्धव... तुम जो जो मुझे कह रहे हो ना... ये सब उनको जाकर समझाना... उन वृन्दावन के लोगों को ।

कृष्ण बोले जा रहे हैं... ।

मेरी "राधा" को भी कहना... 

पर इतना कहते हुए कृष्ण रुक गए... ।

क्या कहोगे मेरी राधा से ? 

उसे तो कोई गिलाशिकवा ही नही है मुझ से ।

मैं जब वृन्दावन से चला था ना... तो मैंने उससे कहा... मुझे जाना पड़ेगा राधे ! मथुरा ।

कुछ नही बोली थी वो... उद्धव ! मैंने उसे झकझोरा... उसे कहा मैंने... राधे ! कुछ तो बोलो ।

तब बड़ी मुश्किल से इतना ही बोली थी... प्यारे ! तुम्हारी ख़ुशी में ही मेरी ख़ुशी है... मेरी चिन्ता मत करो... जाओ ! ।

तुम आओगी मथुरा ? 

मैंने राधा से पूछा था उद्धव ।

तब राधा ने कहा था... नही आऊँगी मैं मथुरा ।

क्यों ? कृष्ण ने आश्चर्य से पूछा ।

मेरे लिए मेरा तुम्हारा प्रेम ही सब कुछ है... मथुरा में तुम्हारा राजसी भेष रहेगा… तुम्हारी राजवी व्यवस्था देखकर... और हम लोग तो वन में रहने वाले हैं... हमारा प्रेम तो इसी वृन्दावन में ही पल्लवित और पुष्पित हुआ है... और यहीं होगा ।

हमारे मथुरा जाने से... रस में कमी आ जायेगी... प्रेम का अभाव खटकेगा । 

नही... बाँसुरी तुम्हारी मथुरा में नही बज सकती... वो तो यहीं वृन्दावन में ही बजेगी प्यारे ! 

तुम जाओ... हमारा प्रेम स्वार्थ का नही है... निस्वार्थ है ।

तुम जिसमें खुश हो... हम भी उसी में खुश हैं ।

"राधा"

कहते हुये... फिर कृष्ण उद्धव के अंक में गिर पड़े थे ।

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उद्धव ! तुम जाओ ना ! 

जब कुछ होश आया कृष्ण को... तब कृष्ण ने उद्धव से फिर कहा ।

उपदेश करना वृन्दावन के लोगों को... तुम तो सब जानते हो ना !

उनको समझाना... उद्धव ! मैं इतना बिलख रहा हूँ... तो इसका कारण ही ये है कि... वो लोग तो दिन रात मेरी याद में तड़फ़ रहे होंगे... उनको अगर मेरी याद नही आती… तो मुझे भी नही आती उद्धव ।

मेरी आज ये जो स्थिति है... इससे कहीं ज्यादा प्रेमावेश की स्थिति उन वृन्दावन के लोगों की होगी ।

वो एक क्षण का वियोग भी नही सह पाते थे... एक क्षण के लिए भी मैं उनकी आँखों से ओझल हो जाता... तो वो लोग तड़फ़ उठते थे ।

अरे ! उद्धव ! वो गोपियाँ... वो बाबरी गोपियाँ ।

जब मुझे देखती थीं... और देखते देखते उनके पलक गिरते थे ।

तो वो बाबरी गोपियाँ अपने पलकों को काटने के लिए तैयार हो जातीं ।

इतना विलक्षण प्रेम है उनका ।

उद्धव ! तुम जाओ । कृष्ण ने उद्धव से फिर कहा ।

पर मेरा वैदुष्यपूर्ण सम्वाद वो समझ पाएंगी ? 

उद्धव का अहंकार थोड़ा दिखाई दिया... इस वक्तव्य में ।

विद्वान उसे कहते हैं... जो अनपढ़ को भी अपनी बातें समझा दे ।

तुम समझा सकते हो... उद्धव ! मेरी वो गोपियाँ भी बहुत समझदार हैं... वो सब समझती हैं ।

तुम जाओ... उद्धव ! तुम जाओ ।

कृष्ण ये कहते हुये उद्धव से लिपट गए थे ।

शेष चर्चा कल... 

कहा श्री कृष्ण ने उद्धव से, वृन्दावन जरा जाना,
वहाँ की गोपियों को ज्ञान का कुछ तत्व समझाना...
विरह की वेदना में वो सदा बेचैन रहती हैं 
तड़फ़ कर आह भरकर के सदा वो यों ही कहती हैं।
हा कृष्ण..... हा कृष्ण.... हरे कृष्ण ... हरे कृष्ण...

braj ras divas 3

आज  के  विचार ( प्रीत  की यह कैसी नई रीत है.....) !! बृज रस- भाग 3 !! ************************* प्रेम सीधी चाल चलता कहाँ हैं ! ....प्रेम की ...